सूरह 90
अल-बलद
البَلَدِ
Al-Balad · मक्की · 20 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
لَآ أُقْسِمُ بِهَٰذَا ٱلْبَلَدِ
Laaa uqsimu bihaazal balad
मैं इस नगर (मक्का) की क़सम खाता हूँ!
- 2
وَأَنتَ حِلٌّۢ بِهَٰذَا ٱلْبَلَدِ
Wa anta hillum bihaazal balad
तथा तुम्हारे लिए इस नगर में लड़ाई हलाल होने वाली है।
- 3
وَوَالِدٍۢ وَمَا وَلَدَ
Wa waalidinw wa maa walad
तथा क़सम है पिता तथा उसकी संतान की!
- 4
لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ فِى كَبَدٍ
Laqad khalaqnal insaana fee kabad
निःसंदेह हमने मनुष्य को बड़ी कठिनाई में पैदा किया है।
- 5
أَيَحْسَبُ أَن لَّن يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌۭ
Ayahsabu al-lai yaqdira 'alaihi ahad
क्या वह समझता है कि उसपर कभी किसी का वश नहीं चलेगा?[1]
[1] (1-5) इन आयतों में सर्व प्रथम मक्का नगर में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर जो घटनाएँ घट रही थीं, और आप तथा आपके अनुयायियों को सताया जा रहा था, उसको साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है कि इनसान की पैदाइश (रचना) संसार का स्वाद लेने के लिए नहीं हुई है। संसार परिश्रम तथा पीड़ाएँ झेलने का स्थान है। कोई इनसान इस स्थिति से गुज़रे बिना नहीं रह सकता। "पिता" से अभिप्राय आदम अलैहिस्सलमा और "संतान" से अभिप्राय समस्त मानवजाति (इनसान) हैं। फिर इनसान के इस भ्रम को दूर किया है कि उसके ऊपर कोई शक्ति नहीं है, जो उसके कर्मों को देख रही है, और समय आने पर उसकी पकड़ करेगी।
- 6
يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًۭا لُّبَدًا
Yaqoolu ahlaktu maalal lubadaa
वह कहता है कि मैंने ढेर सारा धन ख़र्च कर दिया।
- 7
أَيَحْسَبُ أَن لَّمْ يَرَهُۥٓ أَحَدٌ
Ayahsabu al lam yarahooo ahad
क्या वह समझता है कि उसे किसी ने नहीं देखा?[2]
[2] (1-5) इनमें यह बताया गया है कि संसार में बड़ाई तथा प्रधानता के ग़लत पैमाने बना लिए गए हैं, और जो दिखावे के लिए धन व्यय (ख़र्च) करता है उसकी प्रशंसा की जाती है, जबकि उसके ऊपर एक शक्ति है जो यह देख रही है कि उसने किन राहों में और किस लिए धन ख़र्च किया है।
- 8
أَلَمْ نَجْعَل لَّهُۥ عَيْنَيْنِ
Alam naj'al lahoo 'aynayn
क्या हमने उसके लिए दो आँखें नहीं बनाईं?
- 9
وَلِسَانًۭا وَشَفَتَيْنِ
Wa lisaananw wa shafatayn
तथा एक ज़बान और दो होंठ (नहीं बनाए)?
- 10
وَهَدَيْنَٰهُ ٱلنَّجْدَيْنِ
Wa hadaynaahun najdayn
और हमने उसे दोनों मार्ग दिखा दिए?!
- 11
فَلَا ٱقْتَحَمَ ٱلْعَقَبَةَ
Falaq tahamal-'aqabah
परंतु उसने दुर्लभ घाटी में प्रवेश ही नहीं किया।
- 12
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْعَقَبَةُ
Wa maaa adraaka mal'aqabah
और तुम्हें किस चीज़ ने ज्ञात कराया कि वह दुर्लभ 'घाटी' क्या है?
- 13
فَكُّ رَقَبَةٍ
Fakku raqabah
(वह) गर्दन छुड़ाना है।
- 14
أَوْ إِطْعَٰمٌۭ فِى يَوْمٍۢ ذِى مَسْغَبَةٍۢ
Aw it'aamun fee yawmin zee masghabah
या किसी भूख वाले दिन में खाना खिलाना है।
- 15
يَتِيمًۭا ذَا مَقْرَبَةٍ
Yateeman zaa maqrabah
किसी रिश्तेदार अनाथ को।
- 16
أَوْ مِسْكِينًۭا ذَا مَتْرَبَةٍۢ
Aw miskeenan zaa matrabah
या मिट्टी में लथड़े हुए निर्धन को।[3]
[3] (8-16) इन आयतों में फरमाया गया है कि इनसान को ज्ञान और चिंतन के साधन और योग्यताएँ देकर हमने उसके सामने भलाई तथा बुराई के दोनों मार्ग खोल दिए हैं, एक नैतिक पतन की ओर ले जाता है और उसमें मन को अति स्वाद मिलता है। दूसरा नैतिक ऊँचाईयों की राह जिस में कठिनाईयाँ हैं। और उसी को घाटी कहा गया है। जिसमें प्रवेश करने वालों के कर्तव्य में है कि दासों को मुक्त करें, निर्धनों को भोजन कराएँ इत्यादि, वही लोग स्वर्गवासी हैं। और वे जिन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया, वे नरकवासी हैं। आयत संख्या 17 का अर्थ यह है कि सत्य विश्वास (ईमान) के बिना कोई सत्कर्म मान्य नहीं है। इसमें सुखी समाज की विशेषता भी बताई गई है कि दूसरे को सहनशीलता तथा दया का उपदेश दिया जाए और अल्लाह पर सत्य विश्वास रखा जाए।
- 17
ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْمَرْحَمَةِ
Summa kaana minal lazeena aamanoo wa tawaasaw bissabri wa tawaasaw bilmarhamah
फिर वह उन लोगों में से हो, जो ईमान लाए और एक-दूसरे को धैर्य रखने की सलाह दी और एक-दूसरे को दया करने की सलाह दी।
- 18
أُو۟لَٰٓئِكَ أَصْحَٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ
Ulaaa'ika As-haabul maimanah
यही लोग दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली) हैं।
- 19
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَا هُمْ أَصْحَٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ
Wallazeena kafaroo bi aayaatinaa hum as-haabul Mash'amah
और जिन लोगों ने हमारी आयतों का इनकार किया, वही लोग बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली) हैं।
- 20
عَلَيْهِمْ نَارٌۭ مُّؤْصَدَةٌۢ
Alaihim naarum mu'sadah
उनपर (हर ओर से) बंद की हुई आग होगी।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
