सूरह 89

अल-फ़ज्र

الفَجۡرِ

Al-Fajr · मक्की · 30 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    وَٱلْفَجْرِ

    Wal-Fajr

    क़सम है फ़ज्र (उषाकाल) की!

  2. 2

    وَلَيَالٍ عَشْرٍۢ

    Wa layaalin 'ashr

    तथा दस रातों की!

  3. 3

    وَٱلشَّفْعِ وَٱلْوَتْرِ

    Wash shaf'i wal watr

    और सम (जोड़े) और विषम (अकेले) की!

  4. 4

    وَٱلَّيْلِ إِذَا يَسْرِ

    Wallaili izaa yasr

    और रात की, जब वह चलती है!

  5. 5

    هَلْ فِى ذَٰلِكَ قَسَمٌۭ لِّذِى حِجْرٍ

    Hal fee zaalika qasamul lizee hijr

    निश्चय इसमें बुद्धिमान के लिए बड़ी क़सम है?[1]

    [1] (1-5) इन आयतों में सबसे पहले चार चीजों की क़सम खाई गई है, जिन्हें परलोक में कर्मों के फल के सबूत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिस का अर्थ यह है कि कर्मों का फल सत्य है। जिस व्यवस्था से यह दिन-रात चल रहा है उससे सिद्ध होता है कि अल्लाह ही इसे चला रहा है। "दस रात्रियों" से अभिप्राय "ज़ुल ह़िज्जा" मास की प्रारंभिक दस रातें हैं। सह़ीह़ ह़दीसों में इनकी बड़ी प्रधानता बताई गई है।

  6. 6

    أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ

    Alam tara kaifa fa'ala rabbuka bi'aad

    क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने "आद" के साथ किस तरह किया?

  7. 7

    إِرَمَ ذَاتِ ٱلْعِمَادِ

    Iramaa zaatil 'imaad

    (वे आद) जो स्तंभों वाले 'इरम' (गोत्र के लोग) थे।

  8. 8

    ٱلَّتِى لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِى ٱلْبِلَٰدِ

    Allatee lam yukhlaq misluhaa fil bilaad

    जिनके समान (दुनिया के) शहरों में कोई पैदा नहीं किया गया।

  9. 9

    وَثَمُودَ ٱلَّذِينَ جَابُوا۟ ٱلصَّخْرَ بِٱلْوَادِ

    Wa samoodal lazeena jaabus sakhra bil waad

    तथा 'समूद' के साथ (किस तरह किया) जिन्होंने वादी में चट्टानों को तराशा।

  10. 10

    وَفِرْعَوْنَ ذِى ٱلْأَوْتَادِ

    Wa fir'awna zil awtaad

    और मेखों वाले फ़िरऔन के साथ (किस तरह किया)।

  11. 11

    ٱلَّذِينَ طَغَوْا۟ فِى ٱلْبِلَٰدِ

    Allazeena taghaw fil bilaad

    वे लोग, जो नगरों में हद से बढ़ गए।

  12. 12

    فَأَكْثَرُوا۟ فِيهَا ٱلْفَسَادَ

    Fa aksaroo feehal fasaad

    और उनमें बहुत अधिक उपद्रव फैलाया।

  13. 13

    فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ

    Fasabba 'alaihim Rabbuka sawta 'azaab

    तो तेरे पालनहार ने उनपर यातना का कोड़ा बरसाया।

  14. 14

    إِنَّ رَبَّكَ لَبِٱلْمِرْصَادِ

    Inna Rabbaka labil mirsaad

    निःसंदेह तेरा पालनहार निश्चय घात में है।[2]

    [2] (6-14) इन आयतों में उन जातियों की चर्चा की गई है, जिन्होंने माया मोह में पड़कर परलोक और प्रतिफल का इनकार किया, और अपने नैतिक पतन के कारण धरती में उग्रवाद किया। "आद, इरम" से अभिप्रेत वह पुरानी जाति है जिसे क़ुरआन तथा अरब में "आदे ऊला" (प्रथम आद) कहा गया है। यह वह प्राचीन जाति है जिसके पास हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा गया। और इनको "आदे इरम" इस लिए कहा गया है कि यह शामी वंशक्रम की उस शाखा से संबंधित थे जो इरम बिन शाम बिन नूह़ से चली आती थी। आयत संख्या 11 में इसका संकेत है कि उग्रवाद का उद्गम भौतिकवाद एवं सत्य विश्वास का इनकार है, जिसे वर्तमान युग में भी प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।

  15. 15

    فَأَمَّا ٱلْإِنسَٰنُ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكْرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَكْرَمَنِ

    Fa ammal insaanu izaa mab talaahu Rabbuhoo fa akramahoo wa na' 'amahoo fa yaqoolu Rabbeee akraman

    लेकिन मनुष्य (का हाल यह है कि) जब उसका पालनहार उसका परीक्षण करे, फिर उसे सम्मानित करे और नेमत प्रदान करे, तो कहता है कि मेरे पालनहार ने मुझे सम्मानित किया।

  16. 16

    وَأَمَّآ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَهَٰنَنِ

    Wa ammaaa izaa mabtalaahu faqadara 'alaihi rizqahoo fa yaqoolu Rabbeee ahaanan

    लेकिन जब वह उसका परीक्षण करे, फिर उसपर उसकी रोज़ी तंग कर दे, तो कहता कि मेरे पालनहार ने मुझे अपमानित किया।

  17. 17

    كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ ٱلْيَتِيمَ

    Kalla bal laa tukrimooo nal yateem

    हरगिज़ ऐसा नहीं, बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते।

  18. 18

    وَلَا تَحَٰٓضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ

    Wa laa tahaaaddoona 'alaata'aamil miskeen

    तथा तुम एक-दूसरे को ग़रीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हो।

  19. 19

    وَتَأْكُلُونَ ٱلتُّرَاثَ أَكْلًۭا لَّمًّۭا

    Wa taakuloonat turaasa aklal lammaa

    और तुम मीरास का सारा धन समेटकर खा जाते हो।

  20. 20

    وَتُحِبُّونَ ٱلْمَالَ حُبًّۭا جَمًّۭا

    Wa tuhibboonal maala hubban jammaa

    और तुम धन से बहुत अधिक प्रेम करते हो।[3]

    [3] (15-20) इन आयतों में समाज की साधारण नैतिक स्थिति का सर्वेक्षण किया गया है, और भौतिकवादी विचार की आलोचना की गई है, जो मात्र सांसारिक धन और मान मर्यादा को सम्मान तथा अपमान का पैमाना समझता है और यह भूल गया है कि न धनी होना कोई पुरस्कार है और न निर्धन होना कोई दंड है। अल्लाह दोनों स्थितियों में मानवजाति की परीक्षा ले रहा है। फिर यह बात किसी के बस में हो तो दूसरे का धन भी हड़प कर जाए, क्या ऐसा करना कुकर्म नहीं जिसका ह़िसाब लिया जाना चाहिए?

  21. 21

    كَلَّآ إِذَا دُكَّتِ ٱلْأَرْضُ دَكًّۭا دَكًّۭا

    Kallaaa izaaa dukkatil ardu dakkan dakka

    हरगिज़ नहीं! जब धरती कूट-कूटकर चूर्ण-विचूर्ण कर दी जाएगी।

  22. 22

    وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلْمَلَكُ صَفًّۭا صَفًّۭا

    Wa jaaa'a Rabbuka wal malaku saffan saffaa

    और तेरा पालनहार आएगा और फ़रिश्ते जो पंक्तियों में होंगे।

  23. 23

    وَجِا۟ىٓءَ يَوْمَئِذٍۭ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍۢ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكْرَىٰ

    Wa jeee'a yawma'izim bi jahannnam; Yawma 'iziny yatazakkarul insaanu wa annaa lahuz zikraa

    और उस दिन नरक लाई जाएगी। उस दिन इनसान याद करेगा। लेकिन उस दिन याद करना उसे कहाँ से लाभ देगा।

  24. 24

    يَقُولُ يَٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى

    Yaqoolu yaa laitanee qaddamtu lihayaatee

    वह कहेगा : ऐ काश! मैंने अपने (इस) जीवन के लिए कुछ आगे भेजा होता।

  25. 25

    فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌۭ

    Fa Yawma izil laa yu'azzibu 'azaabahooo ahad

    चुनाँचे उस दिन उस (अल्लाह) के दंड जैसा दंड कोई नहीं देगा।

  26. 26

    وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌۭ

    Wa laa yoosiqu wasaaqa hooo ahad

    और न उसके बाँधने जैसा कोई बाँधेगा।[4]

    [4] (21-26) इन आयतों मे बताया गया है कि धन पूजने और उससे परलोक न बनाने का दुष्परिणाम नरक की घोर यातना के रूप में सामने आएगा, तब भौतिकवादी कुकर्मियों की समझ में आएगा कि क़ुरआन को न मानकर बड़ी भूल हुई और हाथ मलेंगे।

  27. 27

    يَٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ

    Yaaa ayyatuhan nafsul mutma 'innah

    ऐ संतुष्ट आत्मा!

  28. 28

    ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةًۭ مَّرْضِيَّةًۭ

    Irji'eee ilaa Rabbiki raadiyatam mardiyyah

    अपने पालनहार की ओर लौट चल, इस हाल में कि तू उससे प्रसन्न है, उसके निकट पसंदीदा है।

  29. 29

    فَٱدْخُلِى فِى عِبَٰدِى

    Fadkhulee fee 'ibaadee

    अतः तू मेरे बंदों में प्रवेश कर जा।

  30. 30

    وَٱدْخُلِى جَنَّتِى

    Wadkhulee jannatee

    और मेरी जन्नत में प्रवेश कर जा।[5]

    [5] (27-30) इन आयतों में उनके सुख और सफलता का वर्णन किया गया है, जो क़ुरआन की शिक्षा का अनुपालन करते हुए आत्मा की शांति के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com