सूरह 78
अन-नबा
النَّبَإِ
An-Naba · मक्की · 40 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
عَمَّ يَتَسَآءَلُونَ
'Amma Yatasaa-aloon
वे आपस में किस चीज़ के विषय में प्रश्न कर रहे हैं?
- 2
عَنِ ٱلنَّبَإِ ٱلْعَظِيمِ
'Anin-nabaa-il 'azeem
बहुत बड़ी सूचना के विषय में।
- 3
ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ
Allazi hum feehi mukh talifoon
जिसमें वे मतभेद करने वाले हैं।
- 4
كَلَّا سَيَعْلَمُونَ
Kallaa sa y'alamoon
हरगिज़ नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।
- 5
ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ
Thumma kallaa sa y'alamoon
फिर हरगिज़ नहीं, शीघ्र ही वे जान लेंगे।[1]
[1] (1-5) इन आयतों में उनको धिक्कारा गया है, जो प्रलय की हँसी उड़ाते हैं। जैसे उनके लिए प्रलय की सूचना किसी गंभीर चिंता के योग्य नहीं। परंतु वह दिन दूर नहीं जब प्रलय उनके आगे आ जाएगी और वे विश्व विधाता के सामने उत्तरदायित्व के लिए उपस्थित होंगे।
- 6
أَلَمْ نَجْعَلِ ٱلْأَرْضَ مِهَٰدًۭا
Alam naj'alil arda mihaa da
क्या हमने धरती को बिछौना नहीं बनाया?
- 7
وَٱلْجِبَالَ أَوْتَادًۭا
Wal jibaala au taada
और पर्वतों को मेखें?
- 8
وَخَلَقْنَٰكُمْ أَزْوَٰجًۭا
Wa khalaq naakum azwaaja
तथा हमने तुम्हें जोड़े-जोड़े पैदा किया।
- 9
وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًۭا
Waja'alnan naumakum subata
तथा हमने तुम्हारी नींद को आराम (का साधन) बनाया।
- 10
وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا
Waja'alnal laila libasa
और हमने रात को आवरण बनाया।
- 11
وَجَعَلْنَا ٱلنَّهَارَ مَعَاشًۭا
Waja'alnan nahara ma 'aasha
और हमने दिन को कमाने के लिए बनाया।
- 12
وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًۭا شِدَادًۭا
Wa banaina fauqakum sab 'an shi daada
तथा हमने तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आकाश) बनाए।
- 13
وَجَعَلْنَا سِرَاجًۭا وَهَّاجًۭا
Waja'alna siraajaw wah haaja
और हमने एक प्रकाशमान् तप्त दीप (सूर्य) बनाया।
- 14
وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلْمُعْصِرَٰتِ مَآءًۭ ثَجَّاجًۭا
Wa anzalna minal m'usiraati maa-an saj-jaaja
और हमने बदलियों से मूसलाधार पानी उतारा।
- 15
لِّنُخْرِجَ بِهِۦ حَبًّۭا وَنَبَاتًۭا
Linukh rija bihee habbaw wana baata
ताकि हम उसके द्वारा अन्न और वनस्पति उगाएँ।
- 16
وَجَنَّٰتٍ أَلْفَافًا
Wa jan naatin alfafa
और घने-घने बाग़।[2]
[2] (6-16) इन आयतों में अल्लाह की शक्ति और प्रतिपालन (रूबूबिय्यत) के लक्षण दर्शाए गए हैं, जो यह साक्ष्य देते हैं कि प्रतिकार (बदले) का दिन आवश्यक है, क्योंकि जिसके लिए इतनी बड़ी व्यवस्था की गई हो और उसे कर्मों के अधिकार भी दिए गए हों, तो उसके कर्मों का पुरस्कार या दंड तो मिलना ही चाहिए।
- 17
إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ كَانَ مِيقَٰتًۭا
Inna yaumal-fasli kana miqaata
निःसंदेह निर्णय (फ़ैसले) का दिन एक नियत समय है।
- 18
يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًۭا
Yauma yun fakhu fis-soori fataa toona afwaaja
जिस दिन सूर में फूँक मारी जाएगी, तो तुम दल के दल चले आओगे।
- 19
وَفُتِحَتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ أَبْوَٰبًۭا
Wa futiha tis samaa-u fakaanat abwaaba
और आकाश खोल दिया जाएगा, तो उसमें द्वार ही द्वार हो जाएँगे।
- 20
وَسُيِّرَتِ ٱلْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا
Wa suyyi raatil jibaalu fa kaanat saraaba
और पर्वत चलाए जाएँगे, तो वे मरीचिका बन जाएँगे।[3]
[3] (17-20) इन आयतों में बताया जा रहा है कि निर्णय का दिन अपने निश्चित समय पर आकर रहेगा, उस दिन आकाश तथा धरती में एक बड़ी उथल-पुथल होगी। इसके लिए सूर में एक फूँक मारने की देर है। फिर जिसकी सूचना दी जा रही है तुम्हारे सामने आ जाएगी। तुम्हारे मानने या न मानने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। और सब अपना ह़िसाब देने के लिए अल्लाह के न्यायालय की ओर चल पड़ेंगे।
- 21
إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًۭا
Inna jahan nama kaanat mirsaada
निःसंदेह जहन्नम घात में है।
- 22
لِّلطَّٰغِينَ مَـَٔابًۭا
Lit taa gheena ma aaba
सरकशों का ठिकाना है।
- 23
لَّٰبِثِينَ فِيهَآ أَحْقَابًۭا
Laa bitheena feehaa ahqaaba
जिसमें वे अनगिनत वर्षों तक रहेंगे।
- 24
لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًۭا وَلَا شَرَابًا
Laa ya zooqoona feeha bar daw walaa sharaaba
वे उसमें न कोई ठंड चखेंगे और न पीने की चीज़।
- 25
إِلَّا حَمِيمًۭا وَغَسَّاقًۭا
Illa hamee maw-wa ghas saaqa
सिवाय अत्यंत गर्म पानी और बहती पीप के।
- 26
جَزَآءًۭ وِفَاقًا
Jazaa-aw wi faaqa
यह पूरा-पूरा बदला है।
- 27
إِنَّهُمْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ حِسَابًۭا
Innahum kaanu laa yarjoona hisaaba
निःसंदेह वे हिसाब से नहीं डरते थे।
- 28
وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَا كِذَّابًۭا
Wa kazzabu bi aayaa tina kizzaba
तथा उन्होंने हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया।
- 29
وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَٰهُ كِتَٰبًۭا
Wa kulla shai-in ahsai naahu kitaa ba
और हमने हर चीज़ को लिखकर संरक्षित कर रखा है।
- 30
فَذُوقُوا۟ فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا
Fa zooqoo falan-nazee dakum ill-laa azaaba
तो चखो, हम तुम्हारे लिए यातना ही अधिक करते रहेंगे।[4]
[4] (21-30) इन आयतों में बताया गया है कि जो ह़िसाब की आशा नहीं रखते और हमारी आयतों को नहीं मानते हमने उनकी एक-एक करतूत को गिनकर अपने यहाँ लिख रखा है। और उनकी ख़बर लेने के लिए नरक घात लगाए तैयार है, जहाँ उनके कुकर्मों का भरपूर बदला दिया जाएगा।
- 31
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا
Inna lil mutta qeena mafaaza
निःसंदेह (अल्लाह से) डरने वालों के लिए सफलता है।
- 32
حَدَآئِقَ وَأَعْنَٰبًۭا
Hadaa-iqa wa a'anaa ba
बाग़ तथा अंगूर।
- 33
وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًۭا
Wa kaawa 'iba at raaba
और समान उम्र वाली नवयुवतियाँ।
- 34
وَكَأْسًۭا دِهَاقًۭا
Wa ka'san di haaqa
और छलकते हुए प्याले।
- 35
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا كِذَّٰبًۭا
Laa yasma'oona fiha lagh waw walaa kizzaba
वे उसमें न तो कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न (एक दूसरे को) झुठलाना।
- 36
جَزَآءًۭ مِّن رَّبِّكَ عَطَآءً حِسَابًۭا
Jazaa-am mir-rabbika ataa-an hisaaba
यह तुम्हारे पालनहार की ओर से बदले में ऐसा प्रदान है जो पर्याप्त होगा।
- 37
رَّبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلرَّحْمَٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًۭا
Rabbis samaa waati wal ardi wa maa baina humar rahmaani laa yam likoona minhu khi taaba
जो आकाशों और धरती तथा उनके बीच की हर चीज़ का पालनहार है, अत्यंत दयावान् है। उससे बात करने का उन्हें अधिकार नहीं होगा।
- 38
يَوْمَ يَقُومُ ٱلرُّوحُ وَٱلْمَلَٰٓئِكَةُ صَفًّۭا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَٰنُ وَقَالَ صَوَابًۭا
Yauma yaqoo mur roohu wal malaa-ikatu saf-fal laa yata kalla moona illa man azina lahur rahmaanu wa qaala sawaaba
जिस दिन रूह़ (जिबरील) तथा फ़रिश्ते पंक्तियों में खड़े होंगे, उससे केवल वही बात कर सकेगा जिसे रहमान (अल्लाह) आज्ञा देगा और वह ठीक बात कहेगा।
- 39
ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ مَـَٔابًا
Zaalikal yaumul haqqu faman shaa-at ta khaaza ill-laa rabbihi ma-aaba
यही (वह) दिन है जो सत्य है। अतः जो चाहे अपने पालनहार की ओर लौटने की जगह (ठिकाना) बना ले।[5]
[5] (37-39) इन आयतों में अल्लाह के न्यायालय में उपस्थिति (ह़ाज़िरी) का चित्र दिखाया गया है। और जो इस भ्रम में पड़े हैं कि उनके देवी-देवता आदि अभिस्ताव करेंगे उनको सावधान किया गया है कि उस दिन कोई बिना उस की आज्ञा के मुँह नहीं खोलेगा और अल्लाह की आज्ञा से अभिस्ताव भी करेगा तो उसी के लिए जो संसार में सत्य वचन "ला इलाहा इल्लल्लाह" को मानता हो। अल्लाह के द्रोही और सत्य के विरोधी किसी अभिस्ताव के योग्य नगीं होंगे।
- 40
إِنَّآ أَنذَرْنَٰكُمْ عَذَابًۭا قَرِيبًۭا يَوْمَ يَنظُرُ ٱلْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ ٱلْكَافِرُ يَٰلَيْتَنِى كُنتُ تُرَٰبًۢا
In naa anzar naakum azaaban qareebaiy-yauma yan zurul marr-u maa qaddamat yadaahu wa ya qoolul-kaafiru yaa lai tanee kuntu turaaba
निःसंदेह हमने तुम्हें एक निकट ही आने वाली यातना से डरा दिया है, जिस दिन मनुष्य देख लेगा, जो कुछ उसके दोनों हाथों ने आगे भेजा है, और काफिर कहेगा : ऐ काश कि मैं मिट्टी होता![6]
[6] (40) बात को इस चेतावनी पर समाप्त किया गया है कि जिस दिन के आने की सूचना दी जा रही है, उस का आना सत्य है, उसे दूर न समझो। अब जिसका दिल चाहे इसे मानकर अपने पालनहार की ओर मार्ग बना ले। परंतु इस चेतावनी के होते जो इनकार करेगा, उसका किया-धरा सामने आएगा, तो पछता-पछता कर यह कामना करेगा कि मैं संसार में पैदा ही न होता। उस समय इस संसार के बारे में उसका यह विचार होगा जिसके प्रेम में आज वह परलोक से अंधा बना हुआ है।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
