सूरह 57

अल-हदीद

الحَدِيدِ

Al-Hadid · मदनी · 29 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ

    Sabbaha lillaahi maa fissamaawaati wal ardi wa Huwal 'Azeezul Hakeem

    अल्लाह की पवित्रता का गान किया हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है और वही सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।

  2. 2

    لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ

    Lahoo mulkus samaawaati wal ardi yuhyee wa yumeetu wa Huwa 'alaa kulli shai'in Qadeer

    उसी के लिए आकाशों तथा धरती का राज्य है। वह जीवन प्रदान करता और मौत देता है। तथा वह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।

  3. 3

    هُوَ ٱلْأَوَّلُ وَٱلْءَاخِرُ وَٱلظَّٰهِرُ وَٱلْبَاطِنُ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌ

    Huwal Awwalu wal'Aakhiru waz Zaahiru wal Baatinu wa huwa bikulli shai'in Aleem

    वही सबसे पहले है और सबसे आख़िर है और ज़ाहिर (दृश्यमान) है और पोशीदा (अदृश्य) है और वह हर चीज़ को भली-भाँति जानने वाला है।

  4. 4

    هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۚ يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنزِلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا ۖ وَهُوَ مَعَكُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ

    Huwal lazee khalaqas samaawaati wal arda fee sittati ayyaamin summas tawaa 'alal 'Arsh; ya'lamu maa yaliju filardi wa maa yakhruju minhaa wa maa yanzilu minas samaaa'i wa maa ya'ruju feeha wa Huwa ma'akum ayna maa kuntum; wallaahu bimaa ta'maloona Baseer

    उसी ने आकाशों तथा धरती को छह दिनों में पैदा किया, फिर वह अर्श पर बुलंद हुआ। वह जानता है जो कुछ धरती में प्रवेश करता है और जो कुछ उससे निकलता है और जो कुछ आकाश से उतरता है और जो कुछ उसमें चढ़ता है और वह तुम्हारे साथ[1] है, तुम जहाँ कहीं भी हो। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे ख़ूब देखने वाला है।

    [1] अर्थात अपने सामर्थ्य तथा ज्ञान द्वारा। आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह सदा से है और सदा रहेगा। प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व उसके अस्तित्व के पश्चात् है। वही नित्य है, विश्व की प्रत्येक वस्तु उसके होने को बता रही है, फिर भी वह ऐसा गुप्त है कि दिखाई नहीं देता।

  5. 5

    لَّهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ

    Lahoo mulkus samaawaati wal ard; wa ilal laahi turja'ul umoor

    आकाशों और धरती का राज्य उसी का है और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते हैं।

  6. 6

    يُولِجُ ٱلَّيْلَ فِى ٱلنَّهَارِ وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِى ٱلَّيْلِ ۚ وَهُوَ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ

    Yoolijul laila fin nahaari wa yoolijun nahaara fil lail; wa Huwa 'Aleemum bizaatis sudoor

    वह रात्रि को दिन में दाखिल करता है और दिन को रात्रि में दाखिल करता है तथा वह सीनों की बातों को ख़ूब जानने वाला है।

  7. 7

    ءَامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَأَنفِقُوا۟ مِمَّا جَعَلَكُم مُّسْتَخْلَفِينَ فِيهِ ۖ فَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنكُمْ وَأَنفَقُوا۟ لَهُمْ أَجْرٌۭ كَبِيرٌۭ

    Aaaminoo billaahi wa Rasoolihee wa anfiqoo mimmaa ja'alakum mustakh lafeena feehi fallazeena aamanoo minkum wa anfaqoo lahum ajrun kabeer

    अल्लाह तथा उसके रसूल पर ईमान लाओ और उसमें से खर्च करो जिसमें उसने तुम्हें उत्तराधिकारी बनाया है। फिर तुममें से जो लोग ईमान लाए और उन्होंने ख़र्च किए, उनके लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है।

  8. 8

    وَمَا لَكُمْ لَا تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ ۙ وَٱلرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ لِتُؤْمِنُوا۟ بِرَبِّكُمْ وَقَدْ أَخَذَ مِيثَٰقَكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

    Wa maa lakum laa tu'minoona billaahi war Rasoolu yad'ookum lituu'minoo bi Rabbikum wa qad akhaza meesaaqakum in kuntum mu'mineen

    और तुम्हें क्या हो गया है कि अल्लाह पर ईमान नहीं लाते, जबकि रसूल[2] तुम्हें बुला रहा है कि अपने पालनहार पर ईमान लाओ, और निश्चय वह (अल्लाह) तुमसे दृढ़ वचन[3] ले चुका है, यदि तुम ईमान वाले हो।

    [2] अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)।

    [3] (देखिए : सूरतुल-आराफ़, आयत : 172)। इब्ने कसीर ने इससे अभिप्राय वह वचन लिया है जिसका वर्णन सूरतुल-माइदा, आयत : 7 में है। जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के द्वारा सह़ाबा से लिया गया कि वे आपकी बातें सुनेंगे तथा सुख-दुःख में अनुपालन करेंगे। और प्रिय और अप्रिय में सच बोलेंगे। तथा किसी की निंदा से नहीं डरेंगे। (बुख़ारी : 7199, मुस्लिम :1709)

  9. 9

    هُوَ ٱلَّذِى يُنَزِّلُ عَلَىٰ عَبْدِهِۦٓ ءَايَٰتٍۭ بَيِّنَٰتٍۢ لِّيُخْرِجَكُم مِّنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ بِكُمْ لَرَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ

    Huwal lazee yunazzilu 'alaa 'abdiheee Aayaatim baiyinaatil liyukhrijakum minaz zulumaati ilan noor; wa innal laaha bikum la Ra'oofur Raheem

    वही है, जो अपने बंदे पर स्पष्ट निशानियाँ उतारता है, ताकि तुम्हें अँधेरों से प्रकाश की ओर निकाले। तथा निःसंदेह अल्लाह तुमपर निश्चय ही बड़ा करुणामय, अत्यंत दयावान् है।

  10. 10

    وَمَا لَكُمْ أَلَّا تُنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلِلَّهِ مِيرَٰثُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ لَا يَسْتَوِى مِنكُم مَّنْ أَنفَقَ مِن قَبْلِ ٱلْفَتْحِ وَقَٰتَلَ ۚ أُو۟لَٰٓئِكَ أَعْظَمُ دَرَجَةًۭ مِّنَ ٱلَّذِينَ أَنفَقُوا۟ مِنۢ بَعْدُ وَقَٰتَلُوا۟ ۚ وَكُلًّۭا وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلْحُسْنَىٰ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ

    Wa maa lakum allaa tunfiqoo fee sabeelil laahi wa lillaahi meeraasus samaawaati wal-ard; laa yastawee minkum man anfaqa min qablil fat-hi wa qaatal; ulaaaika a'zamu darajatam minal lazeena anfaqoo mim ba'du wa qaataloo; wa kullanw wa'adallaahul husnaa; wallaahu bimaa ta'maloona Khabeer

    और तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते, जबकि आसमानों और ज़मीन की मीरास अल्लाह ही के लिए है। तुममें से जिसने (मक्का की) विजय से पहले ख़र्च किया और लड़ाई की वह (बाद में ऐसा करने वालों के) बराबर नहीं है। ये लोग पद में उन लोगों से बड़े हैं, जिन्होंने बाद में[4] ख़र्च किया और युद्ध किया। जबकि अल्लाह ने प्रत्येक से अच्छा बदला देने का वादा किया है तथा तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे भली-भाँति सूचित है।

    [4] ह़दीस में है कि यदि कोई व्यक्ति उह़ुद (पर्वत) के बराबर भी सोना दान कर दे, तो मेरे सह़ाबा के आधा अथवा चौथाई किलो के बराबर भी नहीं होगा। (सह़ीह़ बुख़ारी : 3673, सह़ीह़ मुस्लिम : 2541)

  11. 11

    مَّن ذَا ٱلَّذِى يُقْرِضُ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًۭا فَيُضَٰعِفَهُۥ لَهُۥ وَلَهُۥٓ أَجْرٌۭ كَرِيمٌۭ

    man zal lazee yuqridul laaha qardan hasanan fa yudaa'ifahoo lahoo wa lahooo ajrun kareem

    कौन है जो अल्लाह को अच्छा क़र्ज़[5] दे, फिर वह उसे उसके लिए कई गुना कर दे और उसके लिए अच्छा (सम्मानजनक) बदला है?

    [5] क़र्ज़ से अभिप्राय अल्लाह की राह में धन दान करना है।

  12. 12

    يَوْمَ تَرَى ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَٰتِ يَسْعَىٰ نُورُهُم بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَبِأَيْمَٰنِهِم بُشْرَىٰكُمُ ٱلْيَوْمَ جَنَّٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ

    Yawma taral mu'mineena walmu'minaati yas'aa nooruhum baina aydeehim wa biaymaanihim bushraakumul yawma jannaatun tajree min tahtihal anhaaru khaalideena feeha; zaalika huwal fawzul 'azeem

    जिस दिन तुम ईमान वाले पुरुषों तथा ईमान वाली स्त्रियों को देखोगे कि उनका प्रकाश उनके आगे तथा उनके दाहिनी ओर दौड़ रहा होगा।[6] आज तुम्हें ऐसे बागों की शुभ-सूचना है, जिनके नीचे से नहरें बहती हैं, जिनमें तुम हमेशा रहोगे। यही तो बहुत बड़ी सफलता है।

    [6] यह प्रलय के दिन होगा जब वे अपने ईमान के प्रकाश में स्वर्ग तक पहुँचेंगे।

  13. 13

    يَوْمَ يَقُولُ ٱلْمُنَٰفِقُونَ وَٱلْمُنَٰفِقَٰتُ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱنظُرُونَا نَقْتَبِسْ مِن نُّورِكُمْ قِيلَ ٱرْجِعُوا۟ وَرَآءَكُمْ فَٱلْتَمِسُوا۟ نُورًۭا فَضُرِبَ بَيْنَهُم بِسُورٍۢ لَّهُۥ بَابٌۢ بَاطِنُهُۥ فِيهِ ٱلرَّحْمَةُ وَظَٰهِرُهُۥ مِن قِبَلِهِ ٱلْعَذَابُ

    Yawma yaqoolul munaa fiqoona walmunaafiqaatu lillazeena aamanun zuroonaa naqtabis min noorikum qeelarji'oo waraaa'akum faltamisoo nooran faduriba bainahum bisooril lahoo baab, baatinuhoo feehir rahmatu wa zaahiruhoo min qibalihi-'azaab

    जिस दिन मुनाफ़िक़ पुरुष तथा मुनाफ़िक़ स्त्रियाँ ईमान वालों से कहेंगे कि हमारी प्रतीक्षा करो कि हम तुम्हारे प्रकाश में से कुछ प्रकाश प्राप्त कर लें। कहा जाएगा : अपने पीछे लौट जाओ, फिर कोई प्रकाश तलाश करो।[7] फिर उनके बीच एक दीवार बना दी जाएगी, जिसमें एक द्वार होगा। उसके भीतरी भाग में दया होगी तथा उसके बाहरी भाग की ओर यातना होगी।

    [7] अर्थात संसार में जाकर ईमान तथा सत्कर्म के प्रकाश की खोज करो, किंतु यह असंभव होगा।

  14. 14

    يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَٱرْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ ٱلْأَمَانِىُّ حَتَّىٰ جَآءَ أَمْرُ ٱللَّهِ وَغَرَّكُم بِٱللَّهِ ٱلْغَرُورُ

    Yunaadoonahum alam nakum ma'akum qaaloo balaa wa laakinnakum fatantum anfusakum wa tarabbastum wartabtum wa gharratkumul amaaniyyu hatta jaaa'a amrul laahi wa gharrakum billaahil gharoor

    वे उन्हें पुकारकर कहेंगे : क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे? वे कहेंगे : क्यों नहीं, परंतु तुमने अपने आपको फ़ितने (परीक्षा) में डाला, और तुम प्रतीक्षा[8] करते रहे तथा तुमने संदेह किया और (झूठी) इच्छाओं ने तुम्हें धोखा दिया, यहाँ तक कि अल्लाह का आदेश आ गया, और इस धोखेबाज़ ने तुम्हें अल्लाह के बारे में धोखा दिया।

    [8] कि मुसलमानों पर कोई आपदा आए।

  15. 15

    فَٱلْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌۭ وَلَا مِنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۚ مَأْوَىٰكُمُ ٱلنَّارُ ۖ هِىَ مَوْلَىٰكُمْ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ

    Fal Yawma laa yu'khazu minkum fidyatunw wa laa minal lazeena kafaroo; maawaakumun Naaru hiya maw laakum wa bi'sal maseer

    तो आज न तुमसे कोई छुड़ौती ली जाएगी और न उन लोगों से जिन्होंने कुफ़्र किया। तुम्हारा ठिकाना जहन्नम है। वही तुम्हारी दोस्त है और वह बुरा ठिकाना है।

  16. 16

    ۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ ٱللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ ٱلْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَٰبَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ ٱلْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌۭ مِّنْهُمْ فَٰسِقُونَ

    Alam yaani laillzeena aamanooo an takhsha'a quloo buhum lizikril laahi wa maa nazala minal haqqi wa laa yakoonoo kallazeena ootul Kitaaba min qablu fataala 'alaihimul amadu faqasat quloobuhum wa kaseerum minhum faasiqoon

    क्या उन लोगों के लिए जो ईमान लाए, वह समय नहीं आया कि उनके दिल अल्लाह की याद के लिए और उस सत्य के लिए झुक जाएँ जो उतरा है, और वे उन लोगों की तरह न हो जाएँ, जिन्हें इससे पहले पुस्तक प्रदान की गई थी, फिर उनपर लंबा समय गुज़र गया, तो उनके दिल कठोर हो गए[9] और उनमें बहुत-से लोग अवज्ञाकारी हैं?

    [9] (देखिए : सूरतुल-मायदा, आयत : 13)

  17. 17

    ٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يُحْىِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ ٱلْءَايَٰتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ

    I'lamooo annal laaha yuhyil arda ba'da mawtihaa; qad baiyannaa lakumul Aayaati la'allakum ta'qiloon

    जान लो कि निःसंदेह अल्लाह धरती को उसके मरने के पश्चात जीवित करता है। निःसंदेह हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं, ताकि तुम समझो।

  18. 18

    إِنَّ ٱلْمُصَّدِّقِينَ وَٱلْمُصَّدِّقَٰتِ وَأَقْرَضُوا۟ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًۭا يُضَٰعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌۭ كَرِيمٌۭ

    Innal mussaddiqeena wal mussaddiqaati wa aqradul laaha qardan hassanany yudaa'afu lahum wa lahum ajrun kareem

    निःसंदेह दान करने वाले पुरुष तथा दान करने वाली स्त्रियाँ और जिन्होंने अल्लाह को अच्छा ऋण[10] दिया, उन्हें कई गुना दिया जाएगा और उनके लिए सम्मानित प्रतिफल है।

    [10] ह़दीस में है कि जो पवित्र कमाई से एक खजूर के बराबर भी दान करता है, तो अल्लाह उसे पोसता है जैसे कोई घोड़े के बच्चे को पोसता है यहाँ तक कि वह पर्वत के समान हो जाता है। (सह़ीह़ बुख़ारीः 1410)

  19. 19

    وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦٓ أُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلصِّدِّيقُونَ ۖ وَٱلشُّهَدَآءُ عِندَ رَبِّهِمْ لَهُمْ أَجْرُهُمْ وَنُورُهُمْ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَآ أُو۟لَٰٓئِكَ أَصْحَٰبُ ٱلْجَحِيمِ

    Wallazeena aamanoo billaahi wa Rusuliheee ulaaa'ika humus siddeeqoona wash shuhadaaa'u 'inda Rabbihim lahum ajruhum wa nooruhum wallazeena kafaroo wa kazzaboo bi aayaatinaaa ulaaaika As haabul jaheem

    तथा जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों[11] पर ईमान लाए, वही अपने रब के निकट सिद्दीक़ तथा शहीद[12] (गवाही देने वाले) हैं, उन्हीं के लिए उनका प्रतिफल तथा उनका प्रकाश है। और वे लोग जिन्होंने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वे भड़कती आग में रहने वाले हैं।

    [11] अर्थात बिना अंतर और भेद-भाव किए सभी रसूलों पर ईमान लाए।

    [12] सिद्दीक़ का अर्थ है बड़ा सच्चा। और शहीद का अर्थ गवाह है। (देखिए : सूरतुल-बक़रह, आयत : 143, और सूरतुल-ह़ज्ज, आयत : 78)। शहीद का अर्थ अल्लाह की राह में मारा गया व्यक्ति भी है।

  20. 20

    ٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا لَعِبٌۭ وَلَهْوٌۭ وَزِينَةٌۭ وَتَفَاخُرٌۢ بَيْنَكُمْ وَتَكَاثُرٌۭ فِى ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَوْلَٰدِ ۖ كَمَثَلِ غَيْثٍ أَعْجَبَ ٱلْكُفَّارَ نَبَاتُهُۥ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَىٰهُ مُصْفَرًّۭا ثُمَّ يَكُونُ حُطَٰمًۭا ۖ وَفِى ٱلْءَاخِرَةِ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۭ وَمَغْفِرَةٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنٌۭ ۚ وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا مَتَٰعُ ٱلْغُرُورِ

    I'lamooo annamal hayaa tud dunyaa la'ibunw wa lahwunw wa zeenatunw wa takaasurun bainakum wa takaasurn fil amwaali wal awlaad, kamasali ghaisin a'jabal kuffaara nabaatuhoo summa yaheeju fataraahu musfaaran summa yakoonu hutaamaa; wa fil aakhirati 'azaabun shadeedunw wa magh firatum minal laahi wa ridwaan; wa mal haiyaa tuddun yaaa illaa mataa'ul ghuroor

    जान लो कि वास्तव में संसार का जीवन केवल एक खेल है और मनोरंजन है और शोभा[13] है, तथा तुम्हारा आपस में एक-दूसरे पर बड़ाई जताना है और धन एवं संतान में एक-दूसरे से बढ़ जाने की कोशिश करना है। उस वर्षा के समान जिससे उगने वाली खेती ने किसानों को प्रसन्न कर दिया, फिर वह पक जाती है, फिर तुम उसे देखते हो कि वह पीली हो गई, फिर वह चूरा हो जाती है। और आख़िरत में कड़ी यातना है और अल्लाह की ओर से बड़ी क्षमा और प्रसन्नता है, और संसार का जीवन धोखे के सामान के सिवा और कुछ नहीं।

    [13] इसमें सांसारिक जीवन की शोभा की उपमा वर्षा की उपज की शोभा से दी गई है। जो कुछ ही दिन रहती है, फिर चूर-चूर हो जाती है।

  21. 21

    سَابِقُوٓا۟ إِلَىٰ مَغْفِرَةٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ وَجَنَّةٍ عَرْضُهَا كَعَرْضِ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ أُعِدَّتْ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ ۚ ذَٰلِكَ فَضْلُ ٱللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ

    Saabiqooo ilaa maghfiratim mir Rabbikum wa jannatin 'arduhaa ka-'ardis samaaa'i wal ardi u'iddat lillazeena aamanoo billaahi wa Rusulih; zaalika fadlul laahi yu'teehi many yashaaa'; wal laahu zul fadlil 'azeem

    अपने पालनहार की क्षमा तथा उस जन्नत की ओर एक-दूसरे से आगे बढ़ो, जिसका विस्तार आकाश तथा धरती के विस्तार के समान है, वह उन लोगों के लिए तैयार की गई है, जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए। यह अल्लाह का अनुग्रह है। वह इसे उसको देता है जिसे चाहता है और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है।

  22. 22

    مَآ أَصَابَ مِن مُّصِيبَةٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ إِلَّا فِى كِتَٰبٍۢ مِّن قَبْلِ أَن نَّبْرَأَهَآ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٌۭ

    Maaa asaaba mim musee batin fil ardi wa laa feee anfusikum illaa fee kitaabim min qabli an nabra ahaa; innaa zaalika 'alal laahi yaseer

    धरती में तथा तुम्हारे प्राणों पर जो भी विपदा आती है, वह एक किताब में अंकित है, इससे पहले कि हम उसे पैदा करें।[14] निश्चय यह अल्लाह के लिए बहुत आसान है।

    [14] अर्थात इस संसार और मनुष्य के अस्तित्व से पूर्व ही अल्लाह ने अपने ज्ञान अनुसार 'लौह़े मह़फ़ूज़' (सुरक्षित पट्टिका) में लिख रखा है। ह़दीस में है कि अल्लाह ने पूरी सृष्टि का भाग्य आकाशों तथा धरती की रचना से पचास हज़ार वर्ष पहले लिख दिया, जबकि उसका अर्श पानी पर था। (सह़ीह़ मुस्लिम : 2653)

  23. 23

    لِّكَيْلَا تَأْسَوْا۟ عَلَىٰ مَا فَاتَكُمْ وَلَا تَفْرَحُوا۟ بِمَآ ءَاتَىٰكُمْ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ مُخْتَالٍۢ فَخُورٍ

    Likailaa taasaw 'alaa maa faatakum wa laa tafrahoo bimaaa aataakum; wallaahu laa yuhibbu kulla mukhtaalin fakhoor

    ताकि तुम उसपर शोक न करो, जो तुमसे छूट जाए और उसपर फूल न जाओ, जो वह तुम्हें प्रदान करे। और अल्लाह किसी अहंकार करने वाले, बहुत गर्व करने वाले से प्रेम नहीं करता।

  24. 24

    ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبُخْلِ ۗ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ٱلْحَمِيدُ

    Allazeeena yabkhaloona wa yaamuroonan naasa bil bukhl; wa many yatawalla fa innal laaha Huwal Ghaniyyul Hameed

    वे लोग जो कंजूसी करते हैं और लोगों को कंजूसी करने का आदेश देते हैं। तथा जो मुँह फेर ले, तो निश्चय अल्लाह ही है जो बड़ा बेनियाज़, बहुत प्रशंसनीय है।

  25. 25

    لَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِٱلْبَيِّنَٰتِ وَأَنزَلْنَا مَعَهُمُ ٱلْكِتَٰبَ وَٱلْمِيزَانَ لِيَقُومَ ٱلنَّاسُ بِٱلْقِسْطِ ۖ وَأَنزَلْنَا ٱلْحَدِيدَ فِيهِ بَأْسٌۭ شَدِيدٌۭ وَمَنَٰفِعُ لِلنَّاسِ وَلِيَعْلَمَ ٱللَّهُ مَن يَنصُرُهُۥ وَرُسُلَهُۥ بِٱلْغَيْبِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ قَوِىٌّ عَزِيزٌۭ

    Laqad arsalnaa Rusulanaa bilbaiyinaati wa anzalnaa ma'ahumul Kitaaba wal Meezaana liyaqooman naasu bilqist, wa anzalnal hadeeda feehi baasun shadeedunw wa manaafi'u linnaasi wa liya'lamal laahu many yansuruhoo wa Rusulahoo bilghaib; innal laaha Qawiyyn 'Azeez

    निःसंदेह हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा तथा उनके साथ पुस्तक और तराज़ू उतारा, ताकि लोग न्याय पर क़ायम रहें। तथा हमने लोहा उतारा, जिसमें बहुत शक्ति[15] है और लोगों के लिए बहुत-से लाभ हैं, और ताकि अल्लाह जान ले कि कौन उसकी तथा उसके रसूलों की बिना देखे सहायता करता है। निश्चय ही अल्लाह अति शक्तिशाली, सब पर प्रभुत्वशाली है।

    [15] उससे अस्त्र-शस्त्र बनाए जाते हैं।

  26. 26

    وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًۭا وَإِبْرَٰهِيمَ وَجَعَلْنَا فِى ذُرِّيَّتِهِمَا ٱلنُّبُوَّةَ وَٱلْكِتَٰبَ ۖ فَمِنْهُم مُّهْتَدٍۢ ۖ وَكَثِيرٌۭ مِّنْهُمْ فَٰسِقُونَ

    Wa laqad arsalnaa Noohanw wa Ibraaheema wa ja'alnaa fee zurriyyatihiman nubuwwata wal Kitaaba faminhum muhtad; wa kaseerum minhum faasiqoon

    और निःसंदेह हमने नूह़ और इबराहीम को (रसूल बनाकर) भेजा, और उन दोनों की संतान में नुबुव्वत तथा पुस्तक रख दी। फिर उनमें से कुछ सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं और उनमें से बहुत-से लोग अवज्ञाकारी हैं।

  27. 27

    ثُمَّ قَفَّيْنَا عَلَىٰٓ ءَاثَٰرِهِم بِرُسُلِنَا وَقَفَّيْنَا بِعِيسَى ٱبْنِ مَرْيَمَ وَءَاتَيْنَٰهُ ٱلْإِنجِيلَ وَجَعَلْنَا فِى قُلُوبِ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ رَأْفَةًۭ وَرَحْمَةًۭ وَرَهْبَانِيَّةً ٱبْتَدَعُوهَا مَا كَتَبْنَٰهَا عَلَيْهِمْ إِلَّا ٱبْتِغَآءَ رِضْوَٰنِ ٱللَّهِ فَمَا رَعَوْهَا حَقَّ رِعَايَتِهَا ۖ فَـَٔاتَيْنَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنْهُمْ أَجْرَهُمْ ۖ وَكَثِيرٌۭ مِّنْهُمْ فَٰسِقُونَ

    Summa qaffainaa 'alaa aasaarihim bi Rusulinaa wa qaffainaa be 'Eesab ni Maryama wa aatainaahul Injeela wa ja'alnaa fee quloobil lazeenat taba' oohu raafatanw wa rahmatanw wa rahbaaniyyatanib tada' oohaa maa katanaahaa 'alaihim illab tighaaa'a ridwaanil laahi famaa ra'awhaa haqqa ri'aayatihaa fa aatainal lazeena aamanoo minhum ajrahum wa kaseerum minhum faasiqoon

    फिर हमने उनके पद्चिह्नों पर निरंतर अपने रसूल भेजे। और उनके पीछे मरयम के पुत्र ईसा को भेजा, और उसे इंजील प्रदान किया, और हमने उन लोगों के दिलों में जिन्होंने उसका अनुसरण किया नर्मी और मेहरबानी रख दी। रहा संन्यास, तो उन्होंने खुद इसका आविष्कार किया, हमने उसे उनके ऊपर अनिवार्य नहीं किया[16] था, परंतु अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए (उन्होंने ऐसा किया)। फिर उन्होंने उसका पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। फिर हमने उनमें से जो लोग ईमान लाए उन्हें उनका बदला प्रदान कर दिया और उनमें से बहुत-से लोग अवज्ञाकारी हैं।

    [16] संसार त्याग अर्थात संन्यास के विषय में यह बताया गया है कि अल्लाह ने उन्हें इसका आदेश नहीं दिया। उन्होंने अल्लाह की प्रसन्नता के लिए स्वयं इसे अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया। फिर भी इसे निभा नहीं सके। इसमें यह संकेत है कि योग तथा संन्यास का धर्म में कभी कोई आदेश नहीं दिया गया है। इस्लाम में भी शरीअत के स्थान पर तरीक़त बनाकर नई बातें बनाई गईं। और सत्धर्म का रूप बदल दिया गया। ह़दीस में है कि कोई हमारे धर्म में नई बात निकाले जो उसमें नहीं है, तो वह मान्य नहीं। (सह़ीह़ बुख़ारी : 2697, सह़ीह़ मुस्लिम : 1718)

  28. 28

    يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَءَامِنُوا۟ بِرَسُولِهِۦ يُؤْتِكُمْ كِفْلَيْنِ مِن رَّحْمَتِهِۦ وَيَجْعَل لَّكُمْ نُورًۭا تَمْشُونَ بِهِۦ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ

    Yaaa ayyuhal lazeena aamaanut taqullaaha wa aaminoo bi Rasoolihee yu'tikum kiflaini mir rahmatihee wa yaj'al lakum nooran tamshoona bihee wa yaghfir lakum; wallaahu Ghafoorur Raheem

    ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह से डरो और उसके रसूल पर ईमान लाओ, वह तुम्हें अपनी दया का दोहरा हिस्सा[17] प्रदान करेगा। और तुम्हें ऐसा प्रकाश देगा, जिसमें तुम चलोगे। तथा तुम्हें क्षमा कर देगा। और अल्लाह अति क्षमाशील, अत्यंत दयावान् है।

    [17] ह़दीस में है कि तीन व्यक्ति ऐसे हैं जिनको दोहरा प्रतिफल मिलेगा। इन में एक अह्ले किताब में से वह वयक्ति है जो अपने नबी पर ईमान लाया था फिर मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर भी ईमान लाया। (सह़ीह़ बुख़ारी : 97, 2544, सह़ीह़ मुस्लिम : 154)

  29. 29

    لِّئَلَّا يَعْلَمَ أَهْلُ ٱلْكِتَٰبِ أَلَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَىْءٍۢ مِّن فَضْلِ ٱللَّهِ ۙ وَأَنَّ ٱلْفَضْلَ بِيَدِ ٱللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ

    Li'alla ya'lama Ahlul kitaabi allaa yaqdiroona 'alaa shai'im min fadlil laahi wa annal fadla bi Yadil laahi u'teehi many yashaaa'; wallaahu Zul fadilil 'azeem

    ताकि अह्ले किताब[18] जान लें कि वे अल्लाह के अनुग्रह में से किसी चीज़ पर अधिकार नहीं रखते और यह कि सारा अनुग्रह अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता है, प्रदान करता है और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है।

    [18] अह्ले किताब से अभिप्राय यहूदी तथा ईसाई हैं।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com