सूरह 15
अल-हिज्र
الحِجۡرِ
Al-Hijr · मक्की · 99 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
الٓر ۚ تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱلْكِتَٰبِ وَقُرْءَانٍۢ مُّبِينٍۢ
Alif-Laaam-Raa; tilka Aayaatul Kitaabi wa Qur-aa-nim Mubeen
अलिफ़, लाम, रा। ये किताब और स्पष्ट क़ुरआन की आयतें हैं।
- 2
رُّبَمَا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْ كَانُوا۟ مُسْلِمِينَ
Rubamaa yawaddul lazeena kafaroo law kaanoo muslimeen
(एक समय आएगा कि) काफ़िर चाहेंगे कि काश वे (दुनिया में) मुसलमान होते![1]
[1] ऐसा उस समय होगा जब फ़रिश्ते उनकी आत्मा निकालने आएँगे, और उनको उनका नरक का स्थान दिखा देंगे। और क़ियामत के दिन तो ऐसी दुर्दशा होगी कि धूल हो जाने की कामना करेंगे। (देखिए : सूरतुन-नबा, आयत : 40)
- 3
ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا۟ وَيَتَمَتَّعُوا۟ وَيُلْهِهِمُ ٱلْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
Zarhum yaakuloo wa tatamatta'oo wa yulhihimul amalu fasawfa ya'lamoon
(ऐ नबी!) आप उन्हें छोड़ दें। वे खाएँ और लाभ उठाएँ, तथा (लंबी) आशा उन्हें ग़ाफ़िल रखे, फिर शीघ्र ही जान लेंगे।[2]
[2] अपने दुष्परिणाम को।
- 4
وَمَآ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌۭ مَّعْلُومٌۭ
Wa maaa ahlaknaa min qaryatin illaa wa lahaa kitaabum ma'loom
और हमने जिस बस्ती को भी नष्ट किया, उसका एक निर्धारित समय था।
- 5
مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَـْٔخِرُونَ
Maa tasbiqu min ummatin ajalahaa wa maa yastaakhiroon
कोई जाति अपने नियत समय से न आगे बढ़ती है और न वे पीछे रहते हैं।
- 6
وَقَالُوا۟ يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِى نُزِّلَ عَلَيْهِ ٱلذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌۭ
Wa qaaloo yaaa aiyuhal lazee nuzzila 'alaihiz Zikru innaka lamajnoon
तथा उन (काफ़िरों) ने कहा : ऐ वह व्यक्ति जिसपर स्मरण (क़ुरआन) अवतरित किया गया है, निःसंदेह तू तो पागल है।
- 7
لَّوْ مَا تَأْتِينَا بِٱلْمَلَٰٓئِكَةِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ
Law maa taateenaa bil malaaa'ikati in kunta minas saadiqeen
यदि तू सच्चों में से है, तो हमारे पास फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले आता?
- 8
مَا نُنَزِّلُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةَ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَمَا كَانُوٓا۟ إِذًۭا مُّنظَرِينَ
Maa nunazzilul malaaa'i kata illaa bilhaqqi wa maa kaanooo izam munzareen
हम फ़रिश्तों को सत्य के साथ ही उतारते हैं और उस समय उन्हें कोई मोहलत नहीं दी जाती।
- 9
إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا ٱلذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَٰفِظُونَ
Innaa Nahnu nazalnaz Zikra wa Innaa lahoo lahaa fizoon
निःसंदेह हमने ही यह ज़िक्र (क़ुरआन) उतारी है और निःसंदेह हम ही इसकी अवश्य रक्षा करने वाले[3] हैं।
[3] यह ऐतिहासिक सत्य है। इस विश्व के धर्म ग्रंथों में क़ुरआन ही एक ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें उसके अवतरित होने के समय से अब तक एक अक्षर तो क्या एक मात्रा का भी परिवर्तन नहीं हुआ। और न हो सकता है। यह विशेषता इस विश्व के किसी भी धर्म ग्रंथ को प्राप्त नहीं है। तौरात हो अथवा इंजील या इस विश्व के अन्य धर्म शास्त्र हों, सब में इतने परिवर्तन किए गए हैं कि सत्य मूल धर्म की पहचान असंभव हो गई है। इसी प्रकार इस (क़ुरआन) की व्याख्या जिसे ह़दीस कहा जाता है, वह भी सुरक्षित है। और उसका पालन किए बिना किसी का जीवन इस्लामी नहीं हो सकता। क्योंकि क़ुरआन का आदेश है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुम्हें जो दें उसको ले लो। और जिससे रोक दें उससे रुक जाओ। (देखिए सूरतुल-ह़श्र, आयत : 7) क़ुरआन कहता है कि ऐ नबी! अल्लाह ने आप पर क़ुरआन इसलिए उतारा है कि आप लोगों के लिए उसकी व्याख्या कर दें। क़ुरआन कहता है कि ऐ नबी! (सूरतुन-नह़्ल, आयत : 44) जिस व्याख्या से नमाज़, रोज़ा आदि इस्लामी अनिवार्य कर्तव्यों की विधि का ज्ञान होता है। इसीलिए उसको सुरक्षित किया गया है। और हम ह़दीस के एक-एक रावी के जन्म और मौत का समय और उसकी पूरी दशा को जानते हैं। और यह भी जानते हैं कि वह विश्वसनीय है या नहीं? इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि इस संसार में इस्लाम के सिवा कोई धर्म ऐसा नहीं है, जिसकी मूल पुस्तकें तथा उसके नबी की सारी बातें सुरक्षित हों।
- 10
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِى شِيَعِ ٱلْأَوَّلِينَ
Wa laqad arsalnaa min qablika fee shiya'il awwaleen
और निःसंदेह हमने आपसे पहले विगत समुदायों के समूहों में रसूल भेजे हैं।
- 11
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
Wa maa yaateehim mir Rasoolin illaa kaanoo bihee yastahzi'oon
और उनके पास जो भी रसूल आता, वे उसका मज़ाक उड़ाया करते थे।
- 12
كَذَٰلِكَ نَسْلُكُهُۥ فِى قُلُوبِ ٱلْمُجْرِمِينَ
kazaalika naslukuhoo fee quloobil mujrimeen
इसी तरह हम यह[4] (झुठलाने की प्रवृत्ति) अपराधियों के दिलों में डाल देते हैं।
[4] अर्थात रसूलों को झुठलाने और उनका मज़ाक उड़ाने को, अर्थात उन्हें इसका दंड देंगे।
- 13
لَا يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَقَدْ خَلَتْ سُنَّةُ ٱلْأَوَّلِينَ
Laa yu'minoona bihee wa qad khalat sunnatul awwaleen
वे उसपर ईमान नहीं लाते। और प्रथम जातियों से यही परंपरा चली आ रही है।
- 14
وَلَوْ فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فَظَلُّوا۟ فِيهِ يَعْرُجُونَ
Wa law fatahnaa 'alaihim baabam minas samaaa'i fazaloo feehi ya'rujoon
और यदि हम उनपर आकाश का कोई द्वार खोल दें, फिर वे उसमें चढ़ते चले जाएँ।
- 15
لَقَالُوٓا۟ إِنَّمَا سُكِّرَتْ أَبْصَٰرُنَا بَلْ نَحْنُ قَوْمٌۭ مَّسْحُورُونَ
Laqaaloo innamaa sukkirat absaarunaa bal nahnu qawmum mashooroon
तब भी निश्चय वे यही कहेंगे कि हमारी निगाहें बाँध दी गई हैं। बल्कि हमपर जादू कर दिया गया है।
- 16
وَلَقَدْ جَعَلْنَا فِى ٱلسَّمَآءِ بُرُوجًۭا وَزَيَّنَّٰهَا لِلنَّٰظِرِينَ
Wa laqad ja'alnaa fissamaaa'i buroojanw wa zaiyannaahaa linnaazireen
निःसंदेह हमने आकाश में कई बुर्ज (बड़े सितारे) बनाए हैं और उन्हें देखने वालों के लिए सुशोभित किया है।
- 17
وَحَفِظْنَٰهَا مِن كُلِّ شَيْطَٰنٍۢ رَّجِيمٍ
Wa hafiznaahaa min kulli Shaitaanir rajeem
और हमने उसे प्रत्येक धिक्कारे हुए शैतान से सुरक्षित किया है।
- 18
إِلَّا مَنِ ٱسْتَرَقَ ٱلسَّمْعَ فَأَتْبَعَهُۥ شِهَابٌۭ مُّبِينٌۭ
Illaa manis taraqas sam'a fa atba'ahoo shihaabum mubeen
परंतु जो (शैतान) चोरी-छिपे सुनना चाहे, तो एक स्पष्ट ज्वाला (उल्का) उसका पीछा[5] करती है।
[5] शैतान चोरी से फ़रिश्तों की बात सुनने का प्रयास करते हैं। तो ज्वलंत उल्का उन्हें मारता है। अधिक विवरण के लिए, देखिए : सूरतुल-मुल्क, आयत : 5)
- 19
وَٱلْأَرْضَ مَدَدْنَٰهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَٰسِىَ وَأَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ شَىْءٍۢ مَّوْزُونٍۢ
Wal arda madadnaahaa wa alqainaa feehaa rawaasiya wa ambatnaa feehaa min kulli shai'im mawzoon
और हमने धरती को फैलाया और उसमें पर्वत डाल (गाड़) दिए और उसमें हर चीज़ निर्धारित मात्रा में उगाई।
- 20
وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَٰيِشَ وَمَن لَّسْتُمْ لَهُۥ بِرَٰزِقِينَ
Wa ja'alnaa lakum feehaa ma'aayisha wa mal lastum lahoo biraaziqeen
और हमने उसमें तुम्हारे लिए जीवन के संसाधन बना दिए। तथा उनके लिए (भी) जिन्हें तुम हरगिज़ रोज़ी देने वाले नहीं।
- 21
وَإِن مِّن شَىْءٍ إِلَّا عِندَنَا خَزَآئِنُهُۥ وَمَا نُنَزِّلُهُۥٓ إِلَّا بِقَدَرٍۢ مَّعْلُومٍۢ
Wa im min shai'in illaa 'indanaa khazaaa 'inuhoo wa maa nunazziluhooo illaa biqadarim ma'loom
और कोई चीज़ ऐसी नहीं है, जिसके ख़ज़ाने हमारे पास न हों। और हम उसे एक निश्चित मात्रा ही में उतारते हैं।
- 22
وَأَرْسَلْنَا ٱلرِّيَٰحَ لَوَٰقِحَ فَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَسْقَيْنَٰكُمُوهُ وَمَآ أَنتُمْ لَهُۥ بِخَٰزِنِينَ
Wa arsalnar riyaaha la waaqiha fa anzalnaa minas samaaa'i maaa'an fa asqai naakumoohu wa maaa antum lahoo bikhaazineen
और हमने बादलों को पानी से गर्भित करने वाली हवाओं को भेजा, फिर हमने आकाश से पानी उतारा, और उसे तुम्हें पिलाया, तथा तुम हरगिज़ उसे संग्रह करने वाले नहीं।
- 23
وَإِنَّا لَنَحْنُ نُحْىِۦ وَنُمِيتُ وَنَحْنُ ٱلْوَٰرِثُونَ
Wa innnaa la nahnu nuhyee wa numeetu wa nahnul waarisoon
तथा निःसंदेह हम ही जीवित करते और मारते हैं और हम ही (सबके) उत्तराधिकारी हैं।
- 24
وَلَقَدْ عَلِمْنَا ٱلْمُسْتَقْدِمِينَ مِنكُمْ وَلَقَدْ عَلِمْنَا ٱلْمُسْتَـْٔخِرِينَ
Wa la qad 'alimnal mustaqdimeena minkum wa laqad 'alimnal mustaakhireen
तथा निःसंदेह हम तुम्हारे पहले लोगों को भी जानते हैं, और बाद में आने वालों को भी जानते हैं।
- 25
وَإِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَحْشُرُهُمْ ۚ إِنَّهُۥ حَكِيمٌ عَلِيمٌۭ
Wa inna Rabbaka Huwa yahshuruhum; innahoo Hakeem 'Aleem
और निःसंदेह आपका पालनहार ही उन्हें इकट्ठा[6] करेगा। निश्चय वह पूर्ण हिकमत वाला, सब कुछ जानने वाला है।
[6] अर्थात प्रलय के दिन ह़िसाब के लिए।
- 26
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ مِن صَلْصَٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
Wa laqad khalaqnal insaana min salsaalim min hama im masnoon
और निःसंदेह हमने मनुष्य को सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से बनाया है।
- 27
وَٱلْجَآنَّ خَلَقْنَٰهُ مِن قَبْلُ مِن نَّارِ ٱلسَّمُومِ
Waljaaanna khalaqnaahu min qablu min naaris samoom
और इससे पहले जिन्नों को हमने धुँआ रहित अति गर्म आग से पैदा किया।
- 28
وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَٰٓئِكَةِ إِنِّى خَٰلِقٌۢ بَشَرًۭا مِّن صَلْصَٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
Wa iz qaala Rabbuka lilmalaaa' ikati innee khaaliqum basharam min salsaalim min hama im masnoon
और (याद करो) जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा : मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करने वाला हूँ।
- 29
فَإِذَا سَوَّيْتُهُۥ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِى فَقَعُوا۟ لَهُۥ سَٰجِدِينَ
Fa izaa sawwaituhoo wa nafakhtu feehi mir roohee faqa'oo lahoo saajideen
तो जब मैं उसे पूरा बना लूँ और उसमें अपनी रूह़ फूँक दूँ, तो तुम उसके आगे सजदा करते हुए गिर जाओ।[7]
[7] फ़रिश्तों का आदम को सजदा करना अल्लाह के आदेश से उनकी परीक्षा के लिए था, किंतु इस्लाम में मनुष्य के लिए किसी मनुष्य या वस्तु को सजदा करना शिर्क और अक्षम्य पाप है। (सूरत ह़ा-मीम-सजदा, आयत संख्या : 37)
- 30
فَسَجَدَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ
Fasajadal malaaa'ikatu kulluhum ajma'oon
तो सब के सब फ़रिश्तों ने सजदा किया।
- 31
إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰٓ أَن يَكُونَ مَعَ ٱلسَّٰجِدِينَ
Illaaa ibleesa abaaa ai yakoona ma'as saajideen
सिवाय इबलीस के। उसने सजदा करने वालों के साथ शामिल होने से इनकार कर दिया।
- 32
قَالَ يَٰٓإِبْلِيسُ مَا لَكَ أَلَّا تَكُونَ مَعَ ٱلسَّٰجِدِينَ
Qaala yaaa Ibleesu maa laka allaa takoona ma'as saajideen
अल्लाह ने पूछा : ऐ इबलीस! तुझे क्या हुआ कि तू सजदा करने वालों में शामिल नहीं हुआॽ
- 33
قَالَ لَمْ أَكُن لِّأَسْجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقْتَهُۥ مِن صَلْصَٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
Qaala lam akul li asjuda libasharin khalaqtahoo min salsaalim min hama im masnoon
उसने कहा : मैं ऐसा नहीं कि एक मनुष्य को सजदा करूँ, जिसे तूने सड़े हुए गारे की खनखनाती मिट्टी से पैदा किया है।
- 34
قَالَ فَٱخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌۭ
Qaala fakhruj minhaa fa innaka rajeem
अल्लाह ने कहा : फिर तू यहाँ से निकल जा। क्योंकि निश्चय तू धिक्कारा हुआ है।
- 35
وَإِنَّ عَلَيْكَ ٱللَّعْنَةَ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلدِّينِ
Wa inna 'alikal la'nata ilaa Yawmid Deen
और निःसंदेह तुझपर बदले (क़ियामत) के दिन तक धिक्कार है।
- 36
قَالَ رَبِّ فَأَنظِرْنِىٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
Qaala Rabbi fa anzirneee ilaa Yawmi yub'asoon
उस (इबलीस) ने कहा[8] : ऐ मेरे पालनहार! तो फिर मुझे उस दिन तक मोहलत दे, जब वे (पुनः जीवित कर) उठाए जाएँगे।
[8] अर्थात फ़रिश्ते परीक्षा में सफल हुए और इबलीस असफल रहा। क्योंकि उसने आदेश का पालन न करके अपनी मनमानी की। इसी प्रकार वे भी हैं, जो अल्लाह की बात न मानकर मनमानी करते हैं।
- 37
قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ ٱلْمُنظَرِينَ
Qaala fa innaka minal munzareen
(अल्लाह ने) कहा : तू निःसंदेह मोहलत दिए गए लोगों में से है।
- 38
إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْوَقْتِ ٱلْمَعْلُومِ
Ilaa Yawmil waqtil ma'loom
ज्ञात समय के दिन तक।
- 39
قَالَ رَبِّ بِمَآ أَغْوَيْتَنِى لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
Qaala Rabbi bimaaa aghwaitanee la uzayyinaana lahum fil ardi wa la ughwiyan nahum ajma'een
वह बोला : ऐ मेरे पालनहार! चूँकि तूने मुझे पथभ्रष्ट किया है, मैं अवश्य ही उनके लिए धरती में (पाप को) सुशोभित करूँगा और उन सभी को पथभ्रष्ट कर दूँगा।
- 40
إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ ٱلْمُخْلَصِينَ
Illaa 'ibaadaka minhumul mukhlaseen
सिवाय तेरे उनमें से चुने हुए बंदों के।
- 41
قَالَ هَٰذَا صِرَٰطٌ عَلَىَّ مُسْتَقِيمٌ
Qaala haaza Siraatun 'alaiya Mustaqeem
(अल्लाह ने) कहा : यह रास्ता है जो मुझ तक सीधा है।
- 42
إِنَّ عِبَادِى لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَٰنٌ إِلَّا مَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْغَاوِينَ
Inna 'ibaadee laisa laka 'alaihim sultaanun illaa manittaba'aka minal ghaaween
निःसंदेह मेरे बंदों पर तेरा कोई वश नहीं[9], परंतु जो बहके हुए लोगों में से तेरे पीछे चले।
[9] अर्थात जो बंदे क़ुरआन तथा ह़दीस (नबी का तरीक़ा) का ज्ञान रखेंगे, उनपर शैतान का प्रभाव नहीं होगा। और जो इन दोनों के ज्ञान से जाहिल होंगे, वही उसके झाँसे में आएँगे। किंतु जो तौबा कर लें, तो उनको क्षमा कर दिया जाएगा।
- 43
وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمَوْعِدُهُمْ أَجْمَعِينَ
Wa inna jahannama lamaw'iduhum ajma'een
और निश्चय ही उन सब के वादा की जगह जहन्नम है।
- 44
لَهَا سَبْعَةُ أَبْوَٰبٍۢ لِّكُلِّ بَابٍۢ مِّنْهُمْ جُزْءٌۭ مَّقْسُومٌ
Lahaa sab'atu abwaab; likulli baabim minhum juz'um maqsoom
उस (जहन्नम) के सात द्वार हैं। और प्रत्येक द्वार के लिए उन (इबलीस के अनुयायियों) का एक विभाजित भाग[10] है।
[10] अर्थात इबलीस के अनुयायी अपने कुकर्मों के अनुसार नरक के द्वार में प्रवेश करेंगे।
- 45
إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍ
Innal muttaqeena fee Jannaatinw wa 'uyoon
निःसंदेह आज्ञाकारी लोग जन्नतों तथा स्रोतों में होंगे।
- 46
ٱدْخُلُوهَا بِسَلَٰمٍ ءَامِنِينَ
Udkhuloohaa bisalaamin aamineen
(उनसे कहा जाएगा :) इसमें सलामती के साथ निर्भय होकर प्रवेश कर जाओ।
- 47
وَنَزَعْنَا مَا فِى صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّ إِخْوَٰنًا عَلَىٰ سُرُرٍۢ مُّتَقَٰبِلِينَ
Wa naza'naa ma fee sudoorihim min ghillin ikhwaanan 'alaa sururim mutaqaabileen
और हम निकाल देंगे उनके दिलों में जो कुछ द्वेष होगा। वे भाई-भाई होकर एक-दूसरे के आमने-सामने तख़्तों पर (बैठे) होंगे।
- 48
لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌۭ وَمَا هُم مِّنْهَا بِمُخْرَجِينَ
Laa yamas suhum feehaa nasabunw wa maa hum minhaa bimukhrajeen
न उसमें उन्हें कोई थकान होगी और न वे वहाँ से निकाले जाएँगे।
- 49
۞ نَبِّئْ عِبَادِىٓ أَنِّىٓ أَنَا ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
Nabbi' 'ibaadeee annneee anal Ghafoorur Raheem
(ऐ नबी!) आप मेरे बंदों को सूचित कर दें कि निःसंदेह मैं ही बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान्[11] हूँ।
[11] ह़दीस में है कि अल्लाह ने सौ दया पैदा की, निन्नानवे अपने पास रख लीं। और एक को पूरे संसार के लिए भेज दिया। अतः यदि काफ़िर उसकी पूरी दया जान जाए, तो स्वर्ग से निराश नहीं होगा। और ईमान वाला उसकी पूरी यातना जान जाए, तो नरक से निर्भय नहीं होगा। (सह़ीह़ बुख़ारी : 6469)
- 50
وَأَنَّ عَذَابِى هُوَ ٱلْعَذَابُ ٱلْأَلِيمُ
Wa anna 'azaabee uwal 'azaabul aleem
और यह भी कि निःसंदेह मेरी यातना ही कष्टदायक यातना है।
- 51
وَنَبِّئْهُمْ عَن ضَيْفِ إِبْرَٰهِيمَ
Wa nabbi'hum 'an daifi Ibraaheem
और आप उन्हें इबराहीम (अलैहिस्सलाम) के अतिथियों के बारे में सूचित कर दें।
- 52
إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَقَالُوا۟ سَلَٰمًۭا قَالَ إِنَّا مِنكُمْ وَجِلُونَ
Iz dakhaloo 'alaihi faqaaloo salaaman qaala innaa minkum wajiloon
जब वे इबराहीम के पास आए, तो उन्होंने सलाम किया। उसने कहा : हमें तो तुमसे डर लग रहा है।
- 53
قَالُوا۟ لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَٰمٍ عَلِيمٍۢ
Qaaloo la tawjal innaa nubashshiruka bighulaamin 'aleem
उन्होंने कहा : डरिए नहीं, निःसंदेह हम आपको एक ज्ञानी बालक की शुभ सूचना देते हैं।
- 54
قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِى عَلَىٰٓ أَن مَّسَّنِىَ ٱلْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ
Qaala abashshartumoonee 'alaaa am massaniyal kibaru fabima tubashshiroon
उसने कहा : क्या तुम मुझे इस बुढ़ापे के आ जाने के उपरांत शुभ सूचना दे रहे हो? तो तुम किस आधार पर यह शुभ सूचना दे रहे होॽ
- 55
قَالُوا۟ بَشَّرْنَٰكَ بِٱلْحَقِّ فَلَا تَكُن مِّنَ ٱلْقَٰنِطِينَ
Qaaloo bashsharnaaka bilhaqqi falaa takum minal qaaniteen
उन्होंने कहा : हमने आपको सच्ची शुभ सूचना दी है। अतः आप निराश होने वालों में से न हों।
- 56
قَالَ وَمَن يَقْنَطُ مِن رَّحْمَةِ رَبِّهِۦٓ إِلَّا ٱلضَّآلُّونَ
Qaala wa mai yaqnatu mir rahmati Rabbiheee illad daaaloon
(इबराहीम अलैहिस्सलाम ने) कहा : और पथभ्रष्टों के सिवा अपने पालनहार की दया से कौन निराश होता है।
- 57
قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
Qaala famaa khatbukum aiyuhal mursaloon
उसने कहा : ऐ भेजे हुए फ़रिश्तो! तुम्हारा अभियान क्या है?
- 58
قَالُوٓا۟ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمٍۢ مُّجْرِمِينَ
Qaaloo innaaa ursilnaaa ilaa qawmim mujrimeen
उन्होंने उत्तर दिया : निःसंदेह हम एक अपराधी जाति की ओर भेजे गए हैं।
- 59
إِلَّآ ءَالَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ
Illaaa Aala Loot; innaa lamunajjoohum ajma'een
लूत के घर वालों के सिवा। निश्चय हम उन सभी को अवश्य बचा लेने वाले हैं।
- 60
إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ قَدَّرْنَآ ۙ إِنَّهَا لَمِنَ ٱلْغَٰبِرِينَ
Illam ra atahoo qaddarnaaa innahaa laminal ghaabireen
परंतु लूत की पत्नी, हमने नियत कर दिया है कि निःसंदेह वह निश्चय ही पीछे रह जाने वालों में से है।
- 61
فَلَمَّا جَآءَ ءَالَ لُوطٍ ٱلْمُرْسَلُونَ
Falamma jaaa'a Aala Lootinil mursaloon
फिर जब लूत के घर वालों के पास भेजे हुए (फ़रिश्ते) आए।
- 62
قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌۭ مُّنكَرُونَ
Qaala innakum qawmum munkaroon
तो उस (लूत अलैहिस्सलाम) ने कहा : तुम तो अपरिचित लोग हो।
- 63
قَالُوا۟ بَلْ جِئْنَٰكَ بِمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَمْتَرُونَ
Qaaloo bal ji'naaka bimaa kaanoo feehi yamtaroon
उन्होंने कहा : (डरो नहीं) बल्कि हम तुम्हारे पास वह चीज़ लेकर आए हैं, जिसमें वे संदेह किया करते थे।
- 64
وَأَتَيْنَٰكَ بِٱلْحَقِّ وَإِنَّا لَصَٰدِقُونَ
Wa atainaaka bilhaqqi wa innaa lasaadiqoon
और हम तुम्हारे पास सत्य लेकर आए हैं और निःसंदेह हम निश्चय सच्चे हैं।
- 65
فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍۢ مِّنَ ٱلَّيْلِ وَٱتَّبِعْ أَدْبَٰرَهُمْ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنكُمْ أَحَدٌۭ وَٱمْضُوا۟ حَيْثُ تُؤْمَرُونَ
Fa asri bi ahlika biqit'im minal laili wattabi' adbaarahum wa laa yaltafit minkum ahadunw wamdoo haisu tu'maroon
अतः तुम अपने घर वालों को लेकर रात के किसी हिस्से में निकल जाओ और खुद उनके पीछे-पीछे चलो। और तुममें से कोई मुड़कर न देखे। तथा चले जाओ, जहाँ तुम्हें आदेश दिया जाता है।
- 66
وَقَضَيْنَآ إِلَيْهِ ذَٰلِكَ ٱلْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَٰٓؤُلَآءِ مَقْطُوعٌۭ مُّصْبِحِينَ
Wa qadainaaa ilaihi zaalikal amra anna daabira haaa'ulaaa'i maqtoo'um musbiheen
और हमने उसकी ओर इस बात की वह़्य कर दी कि इन लोगों की जड़ सुबह होते ही काट दी जाने वाली है।
- 67
وَجَآءَ أَهْلُ ٱلْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ
Wa jaaa'a ahlul madeenati yastabshiroon
और उस नगर वाले इस हाल में आए कि बहुत खुश हो रहे थे।[12]
[12] अर्थात जब फ़रिश्तों को नवयुवकों के रूप में देखा, तो लूत अलैहिस्सलाम के यहाँ आ गए ताकि उनके साथ कुकर्म करें।
- 68
قَالَ إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ ضَيْفِى فَلَا تَفْضَحُونِ
Qaala inna haaa'ulaaa'i daifee falaa tafdahoon
उस (लूत अलैहिस्सलाम) ने कहा : ये लोग तो मेरे अतिथि हैं। अतः मुझे अपमानित न करो।
- 69
وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ
Wattaqul laaha wa laa tukhzoon
तथा अल्लाह से डरो और मुझे अपमानित न करो।
- 70
قَالُوٓا۟ أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ ٱلْعَٰلَمِينَ
Qaalooo awalam nanhaka 'anil 'aalameen
उन्होंने कहा : क्या हमने तुम्हें विश्व वासियों (को अतिथि बनाने) से मना[13] नहीं किया?
[13] कि सबके समर्थक न बनो।
- 71
قَالَ هَٰٓؤُلَآءِ بَنَاتِىٓ إِن كُنتُمْ فَٰعِلِينَ
Qaala haaa'ulaaa'i banaateee in kuntum faa'ileen
उस (लूत अलैहिस्सलाम) ने कहा : ये मेरी बेटियाँ हैं, यदि तुम कुछ करने वाले[14] हो।
[14] अर्थात् इनसे विवाह कर लो, और अपनी कामवासना पूरी करो, और कुकर्म न करो।
- 72
لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِى سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ
La'amruka innahum lafee sakratihim ya'mahoon
ऐ नबी! आपकी आयु की क़सम![15] निःसंदेह वे निश्चय अपनी मस्ती में भटके फिरते थे।
[15] अल्लाह के सिवा किसी मनुष्य के लिए उचित नहीं है कि वह अल्लाह के सिवा किसी और चीज़ की क़सम खाए।
- 73
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ
Fa akhazat humus saihatu mushriqeen
अंततः सूर्योदय के समय ही चिंघाड़ ने उन्हें पकड़ लिया।
- 74
فَجَعَلْنَا عَٰلِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةًۭ مِّن سِجِّيلٍ
Faja'alnaa 'aaliyahaa saafilahaa wa amtamaa 'alaihim hijaaratam min sjijjeel
फिर हमने उस बस्ती के ऊपरी भाग को नीचे कर दिया और उनपर कंकड़ के पत्थर बरसाए।
- 75
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَٰتٍۢ لِّلْمُتَوَسِّمِينَ
Inna fee zaalika la Aayaatil lilmutawassimeen
निःसंदेह इसमें सोच-विचार करने वालों[16] के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।
[16] अर्थात जो लक्षणों से तथ्य को समझ जाते हैं।
- 76
وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍۢ مُّقِيمٍ
Wa innahaa labi sabeelim muqeem
और निःसंदेह वह (बस्ती) एक सार्वजनिक[17] मार्ग पर स्थित है।
[17] अर्थात जो सार्वजनिक मार्ग ह़िजाज़ (मक्का) से शाम को जाता है। यह शिक्षाप्रद बस्ती उसी मार्ग में आती है, जिससे तुम गुज़रते हुए शाम जाते हो।
- 77
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ
Inna fee zaalika la Aayatal lilmu'mineen
निःसंदेह इसमें ईमान वलों के लिए निश्चय बड़ी निशानी है।
- 78
وَإِن كَانَ أَصْحَٰبُ ٱلْأَيْكَةِ لَظَٰلِمِينَ
Wa in kaana Ashaabul Aikati lazaalimeen
और निःसंदेह 'ऐका'[18] वाले निश्चित रूप से अत्याचारी थे।
[18] इससे अभिप्रेत शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति है, ऐका का अर्थ वन तथा झाड़ी है।
- 79
فَٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍۢ مُّبِينٍۢ
Fantaqamnaa minhum wa innahumaa labi imaamim mubeen
तो हमने उनसे बदला लिया। और निःसंदेह वे दोनों[19] (बस्तियाँ) स्पष्ट मार्ग पर हैं।
[19] अर्थात मदयन और ऐका का क्षेत्र भी ह़िजाज़ से फ़िलस्तीन और सीरिया जाते हुए, राह में पड़ता है।
- 80
وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَٰبُ ٱلْحِجْرِ ٱلْمُرْسَلِينَ
Wa laqad kazzaba ashaabul Hijril mursaleen
तथा निःसंदेह ह़िज्र[20] के रहने वालों ने (भी) रसूलों को झुठलाया।
[20] ह़िज्र समूद जाति की बस्ती थी, जो सालेह (अलैहिस्सलाम) की जाति थी, यह बस्ती मदीना और तबूक के बीच में स्थित थी।
- 81
وَءَاتَيْنَٰهُمْ ءَايَٰتِنَا فَكَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
Wa aatainaahum Aayaatinaa fakaanoo 'anhaa mu'rideen
और हमने उन्हें अपनी निशानियाँ दीं, तो वे उनसे मुँह फेरने वाले थे।
- 82
وَكَانُوا۟ يَنْحِتُونَ مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًا ءَامِنِينَ
Wa kaanoo yanhitoona minal jibaali buyootan aamineen
और वे निर्भय होकर पर्वतों को काटकर घर बनाते थे।
- 83
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ
Fa akhazat humus saihatu musbiheen
अंततः सुबह होते ही उन्हें चिंघाड़ ने पकड़ लिया।
- 84
فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
Famaaa aghnaa 'anhum maa kaanoo yaksiboon
फिर उनके किसी काम न आया, जो वे कमाया करते थे।
- 85
وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۗ وَإِنَّ ٱلسَّاعَةَ لَءَاتِيَةٌۭ ۖ فَٱصْفَحِ ٱلصَّفْحَ ٱلْجَمِيلَ
Wa maa khalaqnas samaawaati wal arda wa maa bainahumaaa illaa bilhaqq; wa innas Saa'ata la aatiyatun fasfahis safhal jameel
और हमने आकाशों तथा धरती और उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों को सत्य के साथ पैदा किया है। और निःसंदेह क़ियामत अवश्य आने वाली है। अतः (ऐ नबी!) आप (उन्हें) भले तौर पर क्षमा कर दें।
- 86
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ ٱلْخَلَّٰقُ ٱلْعَلِيمُ
Inna Rabbaka Huwal khallaaqul 'aleem
निःसंदेह आपका पालनहार ही हर चीज़ को पैदा करने वाला, सब कुछ जानने वाला है।
- 87
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَٰكَ سَبْعًۭا مِّنَ ٱلْمَثَانِى وَٱلْقُرْءَانَ ٱلْعَظِيمَ
Wa laqad aatainaaka sab'am mnal masaanee wal Qur-aanal 'azeem
तथा (ऐ नबी!) हमने आपको बार-बार दोहराई जाने वाली सात आयतें और महान क़ुरआन[21] प्रदान किया है।
[21] अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का कथन है कि उम्मुल क़ुरआन (सूरतुल-फ़ातिह़ा) ही वे सात आयतें हैं जो दुहराई जाती हैं, तथा महा क़ुरआन हैं। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4704) एक दूसरी ह़दीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "अल्ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" ही वह सात आयतें हैं जो बार-बार दुहराई जाती हैं, और महा क़ुरआन हैं, जो मुझे प्रदान किया गया है। (संक्षिप्त अनुवाद, सह़ीह़ बुख़ारी : 4702) यही कारण है कि इसके पढ़े बिना नमाज़ नहीं होती। ( सह़ीह़ बुख़ारी : 756, मुस्लिम : 394)
- 88
لَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًۭا مِّنْهُمْ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَٱخْفِضْ جَنَاحَكَ لِلْمُؤْمِنِينَ
Laa tamuddanna 'ainaika ilaa maa matta 'naa biheee azwaajam minhum wa laa tahzan 'alaihim wakhfid janaahaka lilmu 'mineen
आप उसकी ओर हरगिज़ न देखें, जो सुख-सामग्री हमने उनमें से विभिन्न प्रकार के लोगों को दे रखी है और न उनपर दुखी हों और ईमान वालों के लिए अपने बाज़ू झुका दें (यानी उनके लिए विनम्र रहें)।
- 89
وَقُلْ إِنِّىٓ أَنَا ٱلنَّذِيرُ ٱلْمُبِينُ
Wa qul inneee anan nazeerul mubeen
और कह दें कि निःसंदेह मैं तो खुल्लम-खुल्ला डराने[22] वाला हूँ।
[22] अर्थात अवज्ञा पर यातना से।
- 90
كَمَآ أَنزَلْنَا عَلَى ٱلْمُقْتَسِمِينَ
Kamaaa anzalnaa 'alal muqtasimeen
जैसे कि हमने (अल्लाह की किताब को) विभाजित करने वालों[23] पर (यातना) उतारी थी।
[23] विभाजन कारियों से अभिप्राय : यहूदी और ईसाई हैं। जिन्होंने अपनी पुस्तकों तौरात तथा इंजील को खंड-खंड कर दिए। अर्थात उनके कुछ भाग पर ईमान लाए और कुछ को नकार दिया। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4705-4706)
- 91
ٱلَّذِينَ جَعَلُوا۟ ٱلْقُرْءَانَ عِضِينَ
Allazeena ja'alul Quraana'ideen
जिन्होंने क़ुरआन को खंड-खंड कर दिया।[24]
[24] इसी प्रकार इन्होंने भी क़ुरआन के कुछ भाग को मान लिया और कुछ का अगलों की कहानियाँ बता कर इनकार कर दिया। तो ऐसे सभी लोगों से प्रलय के दिन पूछ होगी कि मेरी पुस्तकों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?
- 92
فَوَرَبِّكَ لَنَسْـَٔلَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
Fawa Rabbika lanas'a lannahum ajma'een
अतः आपके पालनहार की क़सम! हम उन सबसे अवश्य पूछेंगे।
- 93
عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
'Ammaa kaanoo ya'maloon
उसके बारे में जो वे किया करते थे।
- 94
فَٱصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَأَعْرِضْ عَنِ ٱلْمُشْرِكِينَ
Fasda' bimaa tu'maru wa a'rid anil mushrikeen
अतः आपको जो आदेश दिया जा रहा है, उसका ऐलान कर दें और मुश्रिकों (अनेकेश्वरवादियो) से मुँह फेर लें।
- 95
إِنَّا كَفَيْنَٰكَ ٱلْمُسْتَهْزِءِينَ
Innaa kafainaakal mustahzi'een
निःसंदेह हम आपकी ओर से मज़ाक उड़ाने वालों के विरुद्ध काफ़ी हैं।
- 96
ٱلَّذِينَ يَجْعَلُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
Allazeena yaj'aloona ma'al laahi ilaahan aakhar; fasawfa ya'lamoon
जो अल्लाह के साथ दूसरा पूज्य बनाते हैं। तो उन्हें जल्द पता चल जाएगा।
- 97
وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّكَ يَضِيقُ صَدْرُكَ بِمَا يَقُولُونَ
Wa laqad na'lamu annak yadeequ sadruka bimaa yaqooloon
और निश्चय हम जानते हैं कि उनकी बातों से आपका सीना तंग होता है।
- 98
فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَكُن مِّنَ ٱلسَّٰجِدِينَ
Fasbbih bihamdi Rabbika wa kum minas saajideen
अतः आप अपने रब की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का गान करें और सजदा करने वालों में शामिल हो जाएँ।
- 99
وَٱعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّىٰ يَأْتِيَكَ ٱلْيَقِينُ
Wa'bud Rabbaka hattaa yaatiyakal yaqeen
और अपने रब की इबादत करते रहें, यहाँ तक कि आपके पास यक़ीन (मौत) आ जाए।[25]
[25] अर्थात मरण का समय आ जाए, जिसका आना यक़ीनी (निश्चित) है।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
