सूरह 14

इब्राहीम

إِبۡرَاهِيمَ

Ibrahim · मक्की · 52 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    الٓر ۚ كِتَٰبٌ أَنزَلْنَٰهُ إِلَيْكَ لِتُخْرِجَ ٱلنَّاسَ مِنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ بِإِذْنِ رَبِّهِمْ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ

    Alif-Laaam-Raa; Kitaabun anzalnaahu ilaika litukhrijan-naasa minaz zulumaati ilan noori bi-izni Rabbihim ilaa siraatil 'Azeezil Hameed

    अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। (यह क़ुरआन) एक पुस्तक है, जिसे हमने आपकी ओर अवतरित किया है; ताकि आप लोगों को, उनके पालनहार की अनुमति से, अंधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले आएँ, उस (अल्लाह) के रास्ते की ओर जो सब पर प्रभुत्वशाली, असीम प्रशंसा वाला है।

  2. 2

    ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَوَيْلٌۭ لِّلْكَٰفِرِينَ مِنْ عَذَابٍۢ شَدِيدٍ

    Allaahil lazee lahoo maa fis samaawaati wa maa fill ard; wa wailul lilkaafireena min 'azaabin shadeed

    उस अल्लाह के (रास्ते की ओर) कि उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। तथा काफ़िरों के लिए कड़ी यातना के कारण बड़ा विनाश है।

  3. 3

    ٱلَّذِينَ يَسْتَحِبُّونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا عَلَى ٱلْءَاخِرَةِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا ۚ أُو۟لَٰٓئِكَ فِى ضَلَٰلٍۭ بَعِيدٍۢ

    Allazeena yastahibboo nal hayaatad dunyaa 'alal aakhirati wa yasuddoona 'ansabeelil laahi wa yabghoonahaa 'iwajaa; ulaaa 'ika fee dalaalim ba'eed

    जो आख़िरत के मुक़ाबले में सांसारिक जीवन को बहुत अधिक पसंद करते हैं और अल्लाह के मार्ग से रोकते और उसमें टेढ़ ढूँढते हैं। ये लोग बहुत दूर की गुमराही में हैं।

  4. 4

    وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِۦ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ ۖ فَيُضِلُّ ٱللَّهُ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ

    Wa maaa arsalnaa mir Rasoolin illaa bilisaani qawmihee liyubaiyina lahum faiudillul laahu mai yashaaa'u wa yahde mai yashaaa'; wa Huwal 'Azeezul Hakeem

    और हमने कोई रसूल नहीं भेजा परंतु उसकी जाति की भाषा में, ताकि वह उनके लिए खोलकर बयान करे। फिर अल्लाह जिसे चाहता है, पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता है, मार्गदर्शन प्रदान करता है। और वही सब पर प्रभुत्वशाली, पूर्ण हिकमत वाला है।

  5. 5

    وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَٰتِنَآ أَنْ أَخْرِجْ قَوْمَكَ مِنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ وَذَكِّرْهُم بِأَيَّىٰمِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَٰتٍۢ لِّكُلِّ صَبَّارٍۢ شَكُورٍۢ

    Wa laqad arsalnaa Moosaa bi Aayaatinaa an akhrij qawmaka minaz zulumaati ilan noori wa zak kirhum bi ayyaamil laah; inna fee zaalika la aayaatil likulli sabbaarin shakoor

    और निःसंदेह हमने मूसा को अपनी निशानियों (चमत्कारों) के साथ भेजा कि अपनी जाति को अंधेरों से प्रकाश की ओर निकाल ला और उन्हें अल्लाह के दिन याद दिला। निःसंदेह इसमें हर ऐसे व्यक्ति के लिए निश्चय बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो बहुत सब्र करने वाला, बहुत शुक्र करने वाला है।

  6. 6

    وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ أَنجَىٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ وَيُذَبِّحُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌۭ

    Wa iz qaala Moosaa liqawmihiz kuroo ni'matal laahi 'alaikum iz anjaakum min Aali Fir'awna yasoomoo nakum sooo'al 'azaabi wa yuzabbihoona abnaaa'akum wa yastahyoona nisaaa'akum; wa fee zaalikum balaaa'um mir Rabbikum 'azeem

    तथा जब मूसा ने अपनी जाति से कहा : तुम अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को याद करो, जब उसने तुम्हें फ़िरऔनियों से छुटकारा दिलाया, जो तुम्हें घोर यातना देते थे, तुम्हारे बेटों का बुरी तरह वध करते और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित[1] रखते थे। और इसमें तुम्हारे पालनहार की ओर से बहुत बड़ी आज़माइश थी।

    [1] ताकि उनके पुरुषों की अधिक संख्या से अपने राज्य के लिए भय न हो। और उनकी स्त्रियों का अपमान करें।

  7. 7

    وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِن شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ ۖ وَلَئِن كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِى لَشَدِيدٌۭ

    Wa iz ta azzana Rabbukum la'in shakartum la azeedannakum wa la'in kafartum inn'azaabee lashadeed

    तथा (याद करो) जब तुम्हारे पालनहार ने साफ घोषणा कर दी कि निःसंदेह यदि तुम शुक्र करोगे, तो मैं अवश्य ही तुम्हें अधिक दूँगा तथा निःसंदेह यदि तुम नाशुक्री करोगे, तो निःसंदेह मेरी यातना निश्चय बहुत कड़ी है।

  8. 8

    وَقَالَ مُوسَىٰٓ إِن تَكْفُرُوٓا۟ أَنتُمْ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا فَإِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِىٌّ حَمِيدٌ

    Wa qaala Moosaaa in takfurooo antum wa man fil ardi jamee'an fa innal laaha la Ghaniyyun Hameed

    और मूसा ने कहा : यदि तुम और वे लोग जो धरती में हैं, सब के सब कुफ़्र करो, तो निःसंदेह अल्लाह निश्चय बड़ा बेनियाज़[2], असीम प्रशंसा वाला है।

    [2] ह़दीस में आया है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है : ऐ मेरे बंदो! यदि तुम्हारे अगले पिछले तथा सब मनुष्य और जिन्न संसार के सबसे बुरे मनुष्य के बराबर हो जाएँ, तो भी मेरे राज्य में कोई कमी नहीं आएगी। (सह़ीह़ मुस्लिम : 2577)

  9. 9

    أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَبَؤُا۟ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ قَوْمِ نُوحٍۢ وَعَادٍۢ وَثَمُودَ ۛ وَٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۛ لَا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ جَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَٰتِ فَرَدُّوٓا۟ أَيْدِيَهُمْ فِىٓ أَفْوَٰهِهِمْ وَقَالُوٓا۟ إِنَّا كَفَرْنَا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ وَإِنَّا لَفِى شَكٍّۢ مِّمَّا تَدْعُونَنَآ إِلَيْهِ مُرِيبٍۢ

    Alam yaatikum naba'ul lazeena min qablikum qawmi Noohinw wa 'Aadinw wa Samood, wallazeena mim ba'dihim; laa ya'lamuhum illallaah; jaaa'at hum Rusuluhum bilbaiyinaati faraddooo aydiyahum feee afwaahihim wa qaalooo innaa kafarnaa bimaaa ursiltum bihee wa innaa lafee shakkim mimmaa tad'oonanaaa ilaihi mureeb

    क्या तुम्हारे पास उन लोगों की ख़बर नहीं आई, जो तुमसे पहले थे; नूह़ की जाति की, तथा आद और समूद की और उन लोगों की जो उनके बाद थे, जिन्हें अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता? उनके रसूल उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने अपने हाथ अपने मुँहों में लौटा लिए[3] और उन्होंने कहा : निःसंदेह हम उसे नहीं मानते, जिसके साथ तुम भेजे गए हो और निःसंदेह हम तो उसके बारे में जिसकी ओर तुम हमें बुलाते हो, एक उलझन में डाल देने वाले संदेह में पड़े हुए हैं।

    [3] यह ऐसी ही भाषा शैली है, जिसे हम अपनी भाषा में बोलते हैं कि कानों पर हाथ रख लिया, और दाँतो से उँगली दबा ली।

  10. 10

    ۞ قَالَتْ رُسُلُهُمْ أَفِى ٱللَّهِ شَكٌّۭ فَاطِرِ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يَدْعُوكُمْ لِيَغْفِرَ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرَكُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۚ قَالُوٓا۟ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا تُرِيدُونَ أَن تَصُدُّونَا عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَا فَأْتُونَا بِسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍۢ

    Qaalat Rusuluhum afillaahi shakkun faatiris samaawaati wal ardi yad'ookum liyaghfira lakum min zunoobikum wa yu'akhkhirakum ilaaa ajalim musam maa; qaaloo in antum illaa basharum mislunaa tureedoona an tasuddoonaa 'ammaa kaana ya'budu aabaaa'unaa faatoonaa bisul taanim mubeen

    उनके रसूलों ने कहा : क्या अल्लाह के बारे में कोई संदेह है, जो आकाशों तथा धरती का पैदा करने वाला है? वह तुम्हें इसलिए बुलाता[4] है कि तुम्हारे लिए तुम्हारे कुछ पाप क्षमा कर दे और तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक अवसर दे।[5] उन्होंने कहा : तुम तो हमारे ही जैसे इनसान हो। तुम चाहते हो कि हमें उससे रोक दो, जिसकी पूजा हमारे बाप-दादा करते थे। तो तुम हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लाओ।

    [4] अपनी आज्ञा पालन की ओर।

    [5] अर्थात मरण तक सांसारिक यातना से सुरक्षित रखे। (क़ुर्तुबी)

  11. 11

    قَالَتْ لَهُمْ رُسُلُهُمْ إِن نَّحْنُ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَمُنُّ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ وَمَا كَانَ لَنَآ أَن نَّأْتِيَكُم بِسُلْطَٰنٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ

    Qaalat lahum Rusuluhum in nahnu illaa basharum mislukum wa laakinnal laaha yamunnu 'alaa mai yashaaa'u min 'ibaadihee wa maa kaana lanaaa an naatiyakum bisul taanin illaa bi iznil laah; wa 'alal laahi falyatawakkalil mu'minonn

    उनके रसूलों ने उनसे कहा : हम तो तुम्हारे जैसे इनसान ही हैं, परन्तु अल्लाह अपने बंदों में से जिसपर चाहे, उपकार करता है। और हमारे लिए कभी संभव नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना तुम्हारे पास कोई प्रमाण ले आएँ और ईमान वालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए।

  12. 12

    وَمَا لَنَآ أَلَّا نَتَوَكَّلَ عَلَى ٱللَّهِ وَقَدْ هَدَىٰنَا سُبُلَنَا ۚ وَلَنَصْبِرَنَّ عَلَىٰ مَآ ءَاذَيْتُمُونَا ۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُتَوَكِّلُونَ

    Wa maa lanaa allaa natawakkala 'alal laahi wa qad hadaanaa subulanaa; wa lanasbiranna 'alaa maaa aazaitumoonaa; wa 'alal laahi falyatawakkalil mutawakkiloon

    और हमें क्या है कि हम अल्लाह पर भरोसा न करें, हालाँकि उसने हमें हमारे मार्ग दिखा दिए? और हम अवश्य उसपर धैर्य से काम लेंगे, जो तुम हमें कष्ट पहुँचाओगे। और भरोसा करने वालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।

  13. 13

    وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِرُسُلِهِمْ لَنُخْرِجَنَّكُم مِّنْ أَرْضِنَآ أَوْ لَتَعُودُنَّ فِى مِلَّتِنَا ۖ فَأَوْحَىٰٓ إِلَيْهِمْ رَبُّهُمْ لَنُهْلِكَنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ

    Wa qaalal lazeena kafaroo li Rusulihim lanukhrijanna kum min aardinaaa aw lata'oo dunna fee millatinaa fa awhaaa ilaihim Rabbuhum lanuhlikannaz zalimeen

    और काफ़िरों ने अपने रसूलों से कहा : हम अवश्य तुम्हें अपने भू-भाग से निकाल देंगे, या अवश्य तुम हमारे पंथ में वापस आओगे। तो उनके पालनहार ने उनकी ओर वह़्य की कि निश्चय हम इन अत्याचारियों को अवश्य विनष्ट कर देंगे।

  14. 14

    وَلَنُسْكِنَنَّكُمُ ٱلْأَرْضَ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَافَ مَقَامِى وَخَافَ وَعِيدِ

    Wa lanuskinan nakumul arda mim ba'dihim; zaalika liman khaafa maqaamee wa khaafa wa'eed

    और निश्चय उनके बाद हम तुम्हें उस धरती में अवश्य बसा देंगे। यह उसके लिए है, जो मेरे समक्ष खड़ा होने से डरा[6] तथा मेरी चेतावनी से डरा।

    [6] अर्थात संसार में मेरी महिमा का विचार करके सत्कर्म किया।

  15. 15

    وَٱسْتَفْتَحُوا۟ وَخَابَ كُلُّ جَبَّارٍ عَنِيدٍۢ

    Wastaftahoo wa khaaba kullu jabbaarin 'aneed

    और उन (रसूलों) ने विजय की प्रार्थना की और प्रत्येक सरकश, हठधर्मी असफल हो गया।

  16. 16

    مِّن وَرَآئِهِۦ جَهَنَّمُ وَيُسْقَىٰ مِن مَّآءٍۢ صَدِيدٍۢ

    Minw waraaa'ihee jahannamu wa yusqaa mim maaa'in sadeed

    उसके आगे जहन्नम है और उसे पीप का पानी पिलाया जाएगा।

  17. 17

    يَتَجَرَّعُهُۥ وَلَا يَكَادُ يُسِيغُهُۥ وَيَأْتِيهِ ٱلْمَوْتُ مِن كُلِّ مَكَانٍۢ وَمَا هُوَ بِمَيِّتٍۢ ۖ وَمِن وَرَآئِهِۦ عَذَابٌ غَلِيظٌۭ

    Yatajarra'uhoo wa laa yakaadu yuseeghuhoo wa yaateehil mawtu min kulli makaaninw wa maa huwa bimaiyitinw wa minw waraaa'ihee 'azaabun ghaleez

    वह उसे कठिनाई से घूँट-घूँट पिएगा और उसे गले से न उतार सकेगा। और उसके पास मृत्यु प्रत्येक स्थान से आएगी। हालाँकि वह किसी प्रकार मरने वाला नहीं। और उसके सामने एक कठोर यातना है।

  18. 18

    مَّثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ ۖ أَعْمَٰلُهُمْ كَرَمَادٍ ٱشْتَدَّتْ بِهِ ٱلرِّيحُ فِى يَوْمٍ عَاصِفٍۢ ۖ لَّا يَقْدِرُونَ مِمَّا كَسَبُوا۟ عَلَىٰ شَىْءٍۢ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلضَّلَٰلُ ٱلْبَعِيدُ

    Masalul lazeena kafaroo bi Rabbihim a'maaluhum karamaadinish taddat bihir reehu fee yawmin 'aasif; laa yaqdiroona mimmaa kasaboo 'alaa shai'; zaalika huwad dalaalul ba'eed

    उन लोगों का उदाहरण जिन्होंने अपने पालनहार के साथ कुफ़्र किया, उनके कार्य उस राख की तरह हैं, जिसपर आँधी वाले दिन में हवा बहुत प्रचंड चली। वे लोग अपने किए में से कुछ नहीं पा सकेंगे। यही (सत्य से) बहुत दूर की गुमराही है।

  19. 19

    أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَأْتِ بِخَلْقٍۢ جَدِيدٍۢ

    Alam tara annal laaha khalaqas samaawaati wal arda bilhaqq; iny yashaa yuzhibkum wa yaati bikhalqin jadeed

    क्या तूने नहीं देखा कि अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना सत्य के साथ की है? यदि वह चाहे, तो तुम सब को ले जाए और एक नई रचना ले आए।

  20. 20

    وَمَا ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ بِعَزِيزٍۢ

    Wa maa zaalika 'alal laahi bi 'azeez

    और यह अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं है।

  21. 21

    وَبَرَزُوا۟ لِلَّهِ جَمِيعًۭا فَقَالَ ٱلضُّعَفَٰٓؤُا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًۭا فَهَلْ أَنتُم مُّغْنُونَ عَنَّا مِنْ عَذَابِ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ ۚ قَالُوا۟ لَوْ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ لَهَدَيْنَٰكُمْ ۖ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَجَزِعْنَآ أَمْ صَبَرْنَا مَا لَنَا مِن مَّحِيصٍۢ

    Wa barazoo lillaahi jamee'an faqaalad du'afaaa'u lillazeenas takbarooo innaa kunnaa lakum taba'an fahal antum mughnoona 'annaa min 'azaabil laahi min shai'; qaaloo law hadaanal laahu lahadai naakum sawaaa'un 'alainaaa ajazi'naa am sabarnaa maa lanaa mim mahees

    और वे सब के सब अल्लाह के सामने पेश[7] होंगे, तो कमज़ोर लोग उन लोगों से कहेंगे, जो बड़े बने हुए थे : निःसंदेह हम तुम्हारे अनुयायी थे, तो क्या तुम हमें अल्लाह की यातना से बचाने में कुछ भी काम आने वाले हो? वे कहेंगे : यदि अल्लाह ने हमें मार्ग दिखाया होता, तो हम तुम्हें अवश्य मार्ग दिखाते। अब हमारे लिए बराबर है कि हम व्याकुल हों, या हम धैर्य से काम लें। हमारे लिए भागने की कोई जगह नहीं है।

    [7] अर्थात प्रलय के दिन अपनी समाधियों से निकलकर।

  22. 22

    وَقَالَ ٱلشَّيْطَٰنُ لَمَّا قُضِىَ ٱلْأَمْرُ إِنَّ ٱللَّهَ وَعَدَكُمْ وَعْدَ ٱلْحَقِّ وَوَعَدتُّكُمْ فَأَخْلَفْتُكُمْ ۖ وَمَا كَانَ لِىَ عَلَيْكُم مِّن سُلْطَٰنٍ إِلَّآ أَن دَعَوْتُكُمْ فَٱسْتَجَبْتُمْ لِى ۖ فَلَا تَلُومُونِى وَلُومُوٓا۟ أَنفُسَكُم ۖ مَّآ أَنَا۠ بِمُصْرِخِكُمْ وَمَآ أَنتُم بِمُصْرِخِىَّ ۖ إِنِّى كَفَرْتُ بِمَآ أَشْرَكْتُمُونِ مِن قَبْلُ ۗ إِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ

    Wa qaalash Shaitaanu lammaa qudiyal amru innal laaha wa'adakum wa'dal haqqi wa wa'attukum faakhlaftukum wa maa kaana liya 'alaikum min sultaanin illaaa an da'awtukum fastajabtum lee falaa taloomoonee wa loomooo anfusakum maaa ana bimusrikhikum wa maaa antum bimusrikhiyya innee kafartu bimaaa ashraktumooni min qabl; innaz zaalimeena lahum azaabun aleem

    और जब निर्णय कर दिया[8] जाएगा, तो शैतान कहेगा : निःसंदेह अल्लाह ने तुमसे सच्चा वादा किया था। और मैंने (भी) तुमसे वादा किया था, तो मैंने तुमसे वादाखिलाफ़ी की। और मेरा तुमपर कोई आधिपत्य नहीं था, सिवाय इसके कि मैंने तुम्हें (अपनी ओर) बुलाया, तो तुमने मेरी बात मान ली। अब मेरी निंदा न करो, बल्कि स्वयं अपनी निंदा करो। न मैं तुम्हारी फ़रयाद सुन सकता हूँ और न तुम मेरी फ़रयाद सुन सकते हो। निःसंदेह मैं उसका इनकार करता हूँ, जो तुमने इससे पहले[9] मुझे साझी बनाया। निश्चय अत्याचारियों के लिए दर्दनाक यातना है।

    [8] स्वर्ग और नरक के योग्य का निर्णय कर दिया जाएगा।

    [9] संसार में।

  23. 23

    وَأُدْخِلَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ جَنَّٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ ۖ تَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَٰمٌ

    Wa udkhilal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati Jannaatin tajree min tahtihal anhaaru khaalideena feehaa bi izni Rabbihim tahiyyatuhum feeha salaam

    और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कार्य किए, उन्हें ऐसी जन्नतों में प्रवेश कराया जाएगा, जिनके (महलों और पेड़ों के) नीचे से नहरें बहती हैं। वे अपने पालनहार की अनुमति से उनमें हमेशा रहने वाले होंगे। उसमें उनका अभिवादन 'सलाम' से होगा।

  24. 24

    أَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًۭا كَلِمَةًۭ طَيِّبَةًۭ كَشَجَرَةٍۢ طَيِّبَةٍ أَصْلُهَا ثَابِتٌۭ وَفَرْعُهَا فِى ٱلسَّمَآءِ

    Alam tara kaifa darabal laahu masalan kalimatan taiyibatan kashajaratin taiyibatin asluhaa saabitunw wa far'uhaa fis samaaa'

    (ऐ नबी!) क्या आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने एक पवित्र कलिमा[10] का उदाहरण कैसे दिया (कि वह) एक पवित्र वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ (भूमि में) सुदृढ़ है और जिसकी शाखा आकाश में है?

    [10] (पवित्र कलिमा) से अभिप्राय "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। जो इस्लाम का धर्म सूत्र है। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है। और यही एकेश्वरवाद का मूलाधार है। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहू अन्हुमा कहते हैं कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के पास थे कि आपने कहा : मुझे ऐसा वृक्ष बताओ जो मुसलमान के समान होता है। जिसका पत्ता नहीं गिरता, तथा प्रत्येक समय अपना फल दिया करता है? इब्ने उमर ने कहा : मेरे मन में यह बात आई कि वह खजूर का वृक्ष है। और अबू बक्र तथा उमर को देखा कि बोल नहीं रहे हैं, इसलिए मैंने भी बोलना अच्छा नहीं समझा। जब वे कुछ नहीं बोले, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : वह खजूर का वृक्ष है। (संक्षिप्त अनुवाद के साथ, सह़ीह़ बुख़ारी : 4698, सह़ीह़ मुस्लिम : 2811)

  25. 25

    تُؤْتِىٓ أُكُلَهَا كُلَّ حِينٍۭ بِإِذْنِ رَبِّهَا ۗ وَيَضْرِبُ ٱللَّهُ ٱلْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

    Tu'teee ukulahaa kulla heenim bi izni Rabbihaa; wa yadribul laahul amsaala linnaasi la'allahum yatazak karoon

    वह अपने पालनहार की अनुमति से प्रत्येक समय अपना फल देता है। और अल्लाह लोगों के लिए उदाहरण देता है, ताकि वे शिक्षा ग्रहण करें।

  26. 26

    وَمَثَلُ كَلِمَةٍ خَبِيثَةٍۢ كَشَجَرَةٍ خَبِيثَةٍ ٱجْتُثَّتْ مِن فَوْقِ ٱلْأَرْضِ مَا لَهَا مِن قَرَارٍۢ

    Wa masalu kalimatin khabeesatin kashajaratin khabee satinij tussat min fawqil ardi maa lahaa min qaraar

    और बुरी[11] बात का उदाहरण एक बुरे पेड़ की तरह है, जो धरती की सतह से उखाड़ लिया गया, जिसमें कोई स्थिरता नहीं है।

    [11] अर्थात शिर्क तथा मिश्रणवाद की बात।

  27. 27

    يُثَبِّتُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱلْقَوْلِ ٱلثَّابِتِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَفِى ٱلْءَاخِرَةِ ۖ وَيُضِلُّ ٱللَّهُ ٱلظَّٰلِمِينَ ۚ وَيَفْعَلُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ

    Yusabbitul laahul lazeena aamanoo bilqawlis saabiti fil hayaatid dunyaa wa fil Aakhirati wa yudillul laahuz zaalimeen; wa yaf'alul laahu maa yashaaa'

    अल्लाह ईमान लाने वालों को दृढ़ बात[12] के द्वारा दुनिया तथा आख़िरत में स्थिरता प्रदान करता है तथा अत्याचारियों को गुमराह कर देता है। और अल्लाह जो चाहता है, करता है।

    [12] दृढ़ बात से अभिप्रेत "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। (क़ुर्तुबी) बरा' बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि आपने कहा : मुसलमान से जब क़ब्र में प्रश्न किया जाता है, तो वह "ला इलाहा इल्लल्लाह मुह़म्मदुर् रसूलुल्लाह" की गवाही देता है। अर्थात अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। इसी के बारे में यह आयत है। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4699)

  28. 28

    ۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ بَدَّلُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ كُفْرًۭا وَأَحَلُّوا۟ قَوْمَهُمْ دَارَ ٱلْبَوَارِ

    Alam tara ilal lazeena baddaloo ni'matal laahi kufranw wa ahalloo qawmahum daaral bawaar

    क्या आपने उन लोगों[13] को नहीं देखा, जिन्होंने अल्लाह की नेमत को नाशुक्री से बदल दिया और अपनी जाति को विनाश के घर में ला उतारा।

    [13] अर्थात मक्का के मुश्रिक, जिन्होंने आपका विरोध किया। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 4700)

  29. 29

    جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا ۖ وَبِئْسَ ٱلْقَرَارُ

    Jahannama yaslawnahaa wa bi'sal qaraar

    (अर्थात्) जहन्नम में। वे उसमें प्रवेश करेंगे और वह बुरा ठिकाना है।

  30. 30

    وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ أَندَادًۭا لِّيُضِلُّوا۟ عَن سَبِيلِهِۦ ۗ قُلْ تَمَتَّعُوا۟ فَإِنَّ مَصِيرَكُمْ إِلَى ٱلنَّارِ

    Wa ja'aloo lillaahi andaadal liyudilloo 'an sabeelih; qul tamatta'oo fa innaa maseerakum ilan Naar

    और उन्होंने अल्लाह के कुछ साझी बना लिए, ताकि उसके मार्ग से (लोगों को) पथभ्रष्ट करें। आप कह दें : लाभ उठा लो। फिर निःसंदेह तुम्हें आग की ओर लौटना है।

  31. 31

    قُل لِّعِبَادِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَٰهُمْ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خِلَٰلٌ

    Qul li'ibaadiyal lazeena aamanoo yuqeemus Salaata wa yunfiqoo mimmaa razaqnaahum sirranw wa 'alaaniyatam min qabli any yaatiya Yawmul laa bai'un feehi wa laa khilaal

    (ऐ नबी!) मेरे उन बंदों से कह दो, जो ईमान लाए हैं कि वे नमाज़ क़ायम करें और उसमें से जो हमने उन्हें प्रदान किया है, छिपे और खुले ख़र्च करें, इससे पहले कि वह दिन आए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई मैत्री।

  32. 32

    ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًۭا لَّكُمْ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْفُلْكَ لِتَجْرِىَ فِى ٱلْبَحْرِ بِأَمْرِهِۦ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلْأَنْهَٰرَ

    Allaahul lazee khalaqas samaawaati wal arda wa anzala minas samaaa'i maaa'an faakhraja bihee minas samaraati rizqal lakum wa sakhkhara lakumul fulka litajriya fil bahri bi amrihee wa sakhkhara lakumul anhaar

    अल्लाह वह है, जिसने आकाशों तथा धरती को पैदा किया, और आकाश से कुछ पानी उतारा, फिर उसके द्वारा तुम्हारे लिए फलों में से कुछ जीविका निकाली, और तुम्हारे लिए नौकाओं को वशीभूत कर दिया, ताकि वे सागर में उसके आदेश से चलें और तुम्हारे लिए नदियों को वशीभूत कर दिया।

  33. 33

    وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ دَآئِبَيْنِ ۖ وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ

    Wa sakhkhara lakumush shamsa walqamara daaa'ibaini wa sakhkhara lakumul laila wannahaar

    तथा तुम्हारे लिए सूर्य और चाँद को वशीभूत कर दिया कि निरंतर चलने वाले हैं, तथा तुम्हारे लिए रात और दन को वशीभूत[14] कर दिया।

    [14] वशीभूत करने का अर्थ यह है कि अल्लाह ने इनके ऐसे नियम बना दिए हैं, जिनके कारण ये मानव के लिए लाभदायक हो सकें।

  34. 34

    وَءَاتَىٰكُم مِّن كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ ۚ وَإِن تَعُدُّوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ لَا تُحْصُوهَآ ۗ إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَظَلُومٌۭ كَفَّارٌۭ

    Wa aataakum min kulli maa sa altumooh; wa in ta'uddoo ni'matal laahi laa tuhsoohaa; innal insaana lazaloo mun kaffaar

    और तुम्हें हर उस चीज़ में से दिया, जो तुमने उससे माँगी।[15] और यदि तुम अल्लाह की नेमत की गणना करो, तो उसकी गणना नहीं कर पाओगे। निःसंदेह मनुष्य निश्चय बड़ा अत्याचारी, बहुत नाशुक्रा है।

    [15] अर्थात तुम्हारी प्रत्येक प्राकृतिक माँग पूरी की, और तुम्हारे जीवन की आवश्यक्ता के सभी संसाधनों की व्यवस्था कर दी।

  35. 35

    وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَٰذَا ٱلْبَلَدَ ءَامِنًۭا وَٱجْنُبْنِى وَبَنِىَّ أَن نَّعْبُدَ ٱلْأَصْنَامَ

    Wa iz qaala Ibraaheemu Rabbij 'al haazal balada aaminanw wajnubnee wa baniyya an na'budal asnaam

    तथा (याद करो) जब इबराहीम ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! इस नगर (मक्का) को शांति एवं सुरक्षा वाला बना दे, तथा मुझे और मेरे बेटों को मूर्तियों की पूजा करने से बचा ले।

  36. 36

    رَبِّ إِنَّهُنَّ أَضْلَلْنَ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ ۖ فَمَن تَبِعَنِى فَإِنَّهُۥ مِنِّى ۖ وَمَنْ عَصَانِى فَإِنَّكَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ

    Rabbi innahunna adlalna kaseeram minan naasi faman tabi'anee fa innahoo minnee wa man 'asaanee fa innaka Ghafoorur Raheem

    ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह इन्होंने बहुत-से लोगों को गुमराह कर दिया। अतः जो मेरे पीछे चला, वह मुझसे है और जिसने मेरी अवज्ञा की, तो निश्चय तू अत्यंत क्षमाशील, बड़ा दयावान् है।

  37. 37

    رَّبَّنَآ إِنِّىٓ أَسْكَنتُ مِن ذُرِّيَّتِى بِوَادٍ غَيْرِ ذِى زَرْعٍ عِندَ بَيْتِكَ ٱلْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱجْعَلْ أَفْـِٔدَةًۭ مِّنَ ٱلنَّاسِ تَهْوِىٓ إِلَيْهِمْ وَٱرْزُقْهُم مِّنَ ٱلثَّمَرَٰتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ

    Rabbanaaa inneee askantu min zurriyyatee biwaadin ghairi zee zar'in 'inda Baitikal Muharrami Rabbanaa liyuqeemus Salaata faj'al af'idatam minan naasi tahweee ilaihim warzuqhum minas samaraati la'allahum yashkuroon

    ऐ हमारे पालनहार! निःसंदेह मैंने अपनी कुछ संतान को इस घाटी में, जो किसी खेती वाली नहीं, तेरे सम्मानित घर (काबा) के पास, बसाया है। ऐ हमारे पालनहार! ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। अतः कुछ लोगों के दिलों को ऐसे कर दे कि उनकी ओर झुके रहें और उन्हें फलों से जीविका प्रदान कर, ताकि वे शुक्रिया अदा करें।

  38. 38

    رَبَّنَآ إِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْفِى وَمَا نُعْلِنُ ۗ وَمَا يَخْفَىٰ عَلَى ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ

    Rabbanaaa innaka ta'lamu maa nukhfee wa maa nu'lin; wa maa yakhfaa 'alal laahi min shai'in fil ardi wa laa fis samaaa'

    ऐ हमारे पालनहार! निश्चय तू जानता है, जो हम छिपाते हैं और जो हम प्रकट करते हैं। और अल्लाह से कोई चीज़ नहीं छिपती धरती में और न आकाश में।

  39. 39

    ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى وَهَبَ لِى عَلَى ٱلْكِبَرِ إِسْمَٰعِيلَ وَإِسْحَٰقَ ۚ إِنَّ رَبِّى لَسَمِيعُ ٱلدُّعَآءِ

    Alhamdu lillaahil lazee wahaba lee 'alal kibari Ismaa'eela wa Ishaaq; inna Rabbee lasamee'ud du'aaa

    सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने मुझे बुढ़ापे के बावजूद (दो पुत्र) इसमाईल और इसहाक़ प्रदान किए। निःसंदेह मेरा पालनहार तो बहुत दुआ सुनने वाला है।

  40. 40

    رَبِّ ٱجْعَلْنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَآءِ

    Rabbij 'alnee muqeemas Salaati wa min zurriyyatee Rabbanaa wa taqabbal du'aaa'

    मेरे पालनहार! मुझे नमाज़ क़ायम करने वाला बना तथा मेरी संतान में से भी। ऐ हमारे पालनहार! और मेरी दुआ स्वीकार कर।

  41. 41

    رَبَّنَا ٱغْفِرْ لِى وَلِوَٰلِدَىَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ ٱلْحِسَابُ

    Rabbanagh fir lee wa liwaalidaiya wa lilmu'mineena Yawma yaqoomul hisaab

    ऐ हमारे पालनहार! मुझे क्षमा कर दे तथा मेरे माता-पिता को और ईमान वालों को, जिस दिन हिसाब लिया जाएगा।

  42. 42

    وَلَا تَحْسَبَنَّ ٱللَّهَ غَٰفِلًا عَمَّا يَعْمَلُ ٱلظَّٰلِمُونَ ۚ إِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍۢ تَشْخَصُ فِيهِ ٱلْأَبْصَٰرُ

    Wa laa tahsabannal laaha ghaafilan 'ammaa ya'maluz zaalimoon; innamaa yu'akh khiruhum li Yawmin tashkhasu feehil absaar

    और तुम अल्लाह को उससे हरगिज़ असावधान न समझो, जो अत्याचारी लोग कर रहे हैं! वह तो उन्हें उस दिन[16] के लिए विलंबित कर रहा है, जिस दिन आँखें खुली रह जाएँगी।

    [16] अर्थात प्रलय के दिन के लिए।

  43. 43

    مُهْطِعِينَ مُقْنِعِى رُءُوسِهِمْ لَا يَرْتَدُّ إِلَيْهِمْ طَرْفُهُمْ ۖ وَأَفْـِٔدَتُهُمْ هَوَآءٌۭ

    Muhti'eena muqni'ee ru'oosihim laa yartaddu ilaihim tarfuhum wa af'idatuhum hawaaa'

    इस हाल में कि वे तेज़ डौड़ने वाले, अपने सिर को ऊपर उठाने वाले होंगे। उनकी निगाह उनकी ओर नहीं लौटेगी और उनके दिल ख़ाली[17] होंगे।

    [17] यहाँ अर्बी भाषा का शब्द "हवाअ" प्रयुक्त हुआ है। जिसका एक अर्थ है शून्य (ख़ाली), अर्थात भय के कारण उसे अपनी सुध न होगी।

  44. 44

    وَأَنذِرِ ٱلنَّاسَ يَوْمَ يَأْتِيهِمُ ٱلْعَذَابُ فَيَقُولُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ رَبَّنَآ أَخِّرْنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ قَرِيبٍۢ نُّجِبْ دَعْوَتَكَ وَنَتَّبِعِ ٱلرُّسُلَ ۗ أَوَلَمْ تَكُونُوٓا۟ أَقْسَمْتُم مِّن قَبْلُ مَا لَكُم مِّن زَوَالٍۢ

    Wa anzirin naasa Yawma yaateehimul 'azaabu fa yaqoolul lazeena zalamoo Rabbanaaa akhkhirnaaa ilaaa ajalin qareebin nujib da'wataka wa nattabi 'ir Rusul; awalam takoonooo aqsamtum min qablu maa lakum min zawaal

    और (ऐ नबी!) लोगों को उस दिन से डराएँ, जब उनपर यातना आ जाएगी, तो वे लोग जिन्होंने अत्याचार किया, कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! हमें कुछ समय तक मोहलत दे दे, हम तेरा आमंत्रण स्वीकार करेंगे और रसूलों का अनुसरण करेंगे।(कहा जाएगा :) क्या तुमने इससे पहले क़समें नहीं खाई थीं कि तुम्हारे लिए कोई भी स्थानांतरण नहीं?

  45. 45

    وَسَكَنتُمْ فِى مَسَٰكِنِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَتَبَيَّنَ لَكُمْ كَيْفَ فَعَلْنَا بِهِمْ وَضَرَبْنَا لَكُمُ ٱلْأَمْثَالَ

    Wa sakantum fee masaakinil lazeena zalamooo anfusahum wa tabaiyana lakum kaifa fa'alnaa bihim wa darabnaa lakumul amsaal

    और तुम उन लोगों की बस्तियों में आबाद रहे, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया था और तुम्हारे लिए अच्छी तरह स्पष्ट हो गया कि हमने उनके साथ किस तरह किया? और हमने तुम्हारे लिए कई उदाहरण प्रस्तुत किए।

  46. 46

    وَقَدْ مَكَرُوا۟ مَكْرَهُمْ وَعِندَ ٱللَّهِ مَكْرُهُمْ وَإِن كَانَ مَكْرُهُمْ لِتَزُولَ مِنْهُ ٱلْجِبَالُ

    Wa qad makaroo makrahum wa 'indal laahi makruhum wa in kaana makruhum litazoola minhul jibaal

    और निःसंदेह उन्होंने अपना उपाय किया। और अल्लाह ही के पास[18] उनका उपाय है। और उनका उपाय हरगिज़ ऐसा न था कि उससे पर्वत टल जाएँ।

    [18] अर्थात अल्लाह उसको निष्फल करना जानता है।

  47. 47

    فَلَا تَحْسَبَنَّ ٱللَّهَ مُخْلِفَ وَعْدِهِۦ رُسُلَهُۥٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌۭ ذُو ٱنتِقَامٍۢ

    Falaa tahsabannal laaha mukhlifa wa'dihee Rusulah; innal laaha 'azeezun zuntiqaam

    अतः आप हरगिज़ यह न समझें कि अल्लाह अपने रसूलों से किए हुए अपने वादे के विरुद्ध करने वाला है। निःसंदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, बदला लेने वाला है।

  48. 48

    يَوْمَ تُبَدَّلُ ٱلْأَرْضُ غَيْرَ ٱلْأَرْضِ وَٱلسَّمَٰوَٰتُ ۖ وَبَرَزُوا۟ لِلَّهِ ٱلْوَٰحِدِ ٱلْقَهَّارِ

    Yawma tubaddalul ardu ghairal ardi wassamaawaatu wa barazoo lillaahil Waahidil Qahhaar

    जिस दिन यह धरती अन्य धरती से बदल दी जाएगी और सब आकाश भी। तथा लोग अल्लाह के समक्ष[19] प्रस्तुत होंगे, जो अकेला, सब पर प्रभुत्वशाली है।

    [19] अर्थात अपनी क़ब्रों (समाधियों) से निकलकर।

  49. 49

    وَتَرَى ٱلْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍۢ مُّقَرَّنِينَ فِى ٱلْأَصْفَادِ

    Wa taral mujrimeena Yawma 'izim muqarraneena filasfaad

    और आप अपराधियों को उस दिन ज़ंजीरों में एक-दूसरे के साथ जकड़े हुए देखेंगे।

  50. 50

    سَرَابِيلُهُم مِّن قَطِرَانٍۢ وَتَغْشَىٰ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ

    Saraabeeluhum min qatiraaninw wa taghshaa wujoohahumun Naar

    उनके वस्त्र तारकोल के होंगे और उनके चेहरों को आग ढाँपे होगी।

  51. 51

    لِيَجْزِىَ ٱللَّهُ كُلَّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ

    Liyajziyal laahu kulla nafsim maa kasabat; innal laaha saree'ul hisaab

    ताकि अल्लाह प्रत्येक प्राणी को उसके किए का बदला दे। निःसंदेह अल्लाह शीघ्र हिसाब लेने वाला है।

  52. 52

    هَٰذَا بَلَٰغٌۭ لِّلنَّاسِ وَلِيُنذَرُوا۟ بِهِۦ وَلِيَعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَا هُوَ إِلَٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ وَلِيَذَّكَّرَ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَٰبِ

    Haaza balaaghul linnaasi wa liyunzaroo bihee wa liya'lamooo annamaa Huwa Illaahunw Waahidunw wa liyaz zakkara ulul albaab

    यह लोगों के लिए एक सूचना है और ताकि उन्हें इसके साथ डराया जाए और ताकि वे जान लें कि वही एक सत्य पूज्य है और ताकि बुद्धि वाले लोग शिक्षा ग्रहण करें।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com