सूरह 87
अल-आला
الأَعۡلَىٰ
Al-A'la · मक्की · 19 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
سَبِّحِ ٱسْمَ رَبِّكَ ٱلْأَعْلَى
Sabbihisma Rabbikal A'laa
अपने सर्वोच्च पालनहार के नाम की पवित्रता का वर्णन करो।
- 2
ٱلَّذِى خَلَقَ فَسَوَّىٰ
Allazee khalaqa fasawwaa
जिसने पैदा किया और ठीक-ठीक बनाया।
- 3
وَٱلَّذِى قَدَّرَ فَهَدَىٰ
Wallazee qaddara fahadaa
और जिसने (हर चीज़ को) अनुमानित किया, फिर मार्ग दिखाया।
- 4
وَٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلْمَرْعَىٰ
Wallazeee akhrajal mar'aa
और जिसने चारा उगाया।[1]
[1] (1-4) इन आयतों में जिस पालनहार ने अपने नाम की पवित्रता का वर्णन करने का आदेश दिया है उसका परिचय दिया गया है कि वह पालनहार है जिसने सभी को पैदा किया, फिर उनको संतुलित किया, और उनके लिए एक विशेष प्रकार का अनुमान बनाया जिसकी सीमा से नहीं निकल सकते, और उनके लिए उस कार्य को पूरा करने की राह दिखाई जिसके लिए उन्हें पैदा किया है।
- 5
فَجَعَلَهُۥ غُثَآءً أَحْوَىٰ
Faja'alahoo ghusaaa'an ahwaa
फिर उसे (सुखाकर) काले रंग का कूड़ा बना दिया।[2]
[2] (4-5) इन आयतों में बताया गया है कि प्रत्येक कार्य अनुक्रम से धीरे-धीरे होते हैं। धरती के पौधे धीरे-धीरे गुंजान और हरे-भरे होते हैं। ऐसे ही मानवीय योग्यताएँ भी धीरे-धीरे पूरी होती हैं।
- 6
سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنسَىٰٓ
Sanuqri'uka falaa tansaaa
(ऐ नबी!) हम तुम्हें ऐसा पढ़ाएँगे कि तुम नहीं भूलोगे।
- 7
إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ وَمَا يَخْفَىٰ
Illaa maa shaaa'al laah; innahoo ya'lamul jahra wa maa yakhfaa
परन्तु जो अल्लाह चाहे। निश्चय ही वह खुली बात को जानता है और उस बात को भी जो छिपी हुई है।
- 8
وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرَىٰ
Wa nu-yassiruka lilyusraa
और हम तुम्हारे लिए सरल मार्ग आसान कर देंगे।[3]
[3] (6-8) इनमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह निर्देश दिया गया है कि इसकी चिंता न करें कि क़ुरआन मुझे कैसे याद होगा, इसे याद कराना हमारा काम है, और इसका सुरक्षित रहना हमारी दया से होगा। और यह उसकी दया और रक्षा है कि इस मानव संसार में किसी धार्मिक ग्रंथ के संबंध में यह दावा नहीं किया जा सकता कि वह सुरक्षित है, यह गौरव केवल क़ुरआन ही को प्राप्त है।
- 9
فَذَكِّرْ إِن نَّفَعَتِ ٱلذِّكْرَىٰ
Fazakkir in nafa'atizzikraa
तो आप नसीहत करते रहें। अगर नसीहत करना लाभदायक हो।
- 10
سَيَذَّكَّرُ مَن يَخْشَىٰ
Sa yazzakkaru maiyakhshaa
वह व्यक्ति उपदेश ग्रहण करेगा, जो डरता है।
- 11
وَيَتَجَنَّبُهَا ٱلْأَشْقَى
Wa yatajannabuhal ashqaa
और उससे दूर रहेगा, जो सबसे बड़ा अभागा है।
- 12
ٱلَّذِى يَصْلَى ٱلنَّارَ ٱلْكُبْرَىٰ
Allazee yaslan Naaral kubraa
जो सबसे बड़ी आग में प्रवेश करेगा।
- 13
ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ
Summa laa yamootu feehaa wa laa yahyaa
फिर वह उसमें न मरेगा, न जिएगा।[4]
[4] (9-13) इनमें बताया गया है कि आपको मात्र इसका प्रचार-प्रसार करना है। और इसकी सरल राह यह है कि जो सुने और मानने के लिए तैयार हो, उसे शिक्षा दी जाए। किसी के पीछे पड़ने की आवश्यकता नहीं है। जो हत्भागे हैं, वही नहीं सुनेंगे और नरक की यातना के रूप में अपना दुष्परिणाम देखेंगे।
- 14
قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ
Qad aflaha man tazakkaa
निश्चय वह सफल हो गया, जो पाक हो गया।
- 15
وَذَكَرَ ٱسْمَ رَبِّهِۦ فَصَلَّىٰ
Wa zakaras ma Rabbihee fasallaa
तथा अपने पालनहार के नाम को याद किया और नमाज़ पढ़ी।[5]
[5] (14-15) इन आयतों में कहा गया है कि सफलता मात्र उनके लिए है, जो आस्था, स्वभाव तथा कर्म की पवित्रता को अपनाएँ, और नमाज़ अदा करते रहें।
- 16
بَلْ تُؤْثِرُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا
Bal tu'siroonal hayaatad dunyaa
बल्कि तुम सांसारिक जीवन को प्राथमिकता देते हो।
- 17
وَٱلْءَاخِرَةُ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ
Wal Aakhiratu khairunw wa abqaa
हालाँकि आख़िरत बहुत उत्तम और अधिक बाक़ी रहने वाली है।
- 18
إِنَّ هَٰذَا لَفِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ
Inna haazaa lafis suhu fil oolaa
निःसंदेह यह बात पहले सह़ीफ़ों (ग्रंथों) में है।
- 19
صُحُفِ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ
Suhufi Ibraaheema wa Moosaa
इबराहीम तथा मूसा के सह़ीफ़ों (ग्रंथों) में।[6]
[6] (16-19) इन आयतों का भावार्थ यह है कि वास्तव में रोग यह है कि काफ़िरों को सांसारिक स्वार्थ के कारण नबी की बातें अच्छी नहीं लगतीं। जबकि परलोक ही स्थायी है। और यही सभी आदि ग्रंथों की शिक्षा है।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
