सूरह 85

अल-बुरूज

البُرُوجِ

Al-Buruj · मक्की · 22 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْبُرُوجِ

    Wassamaaa'i zaatil burooj

    क़सम है बुर्जों वाले आकाश की!

  2. 2

    وَٱلْيَوْمِ ٱلْمَوْعُودِ

    Wal yawmil maw'ood

    और क़सम है उस दिन की, जिसका वादा किया गया है!

  3. 3

    وَشَاهِدٍۢ وَمَشْهُودٍۢ

    Wa shaahidinw wa mashhood

    क़सम है गवाह की और उसकी, जिसके बारे में गवाही दी जाएगी!

  4. 4

    قُتِلَ أَصْحَٰبُ ٱلْأُخْدُودِ

    Qutila as haabul ukhdood

    खाई वालों का नाश हो गया![1]

    [1] (1-4) इनमें तीन चीज़ों की शपथ ली गई है। (1) बुर्जों वाले आकाश की। (2) प्रलय की, जिसका वचन दिया गया है। (3) प्रलय के भयावह दृश्य की और उस पूरी सृष्टि की जो उसे देखेगी। प्रथम शपथ इस बात की गवाही दे रही है कि जो शक्ति इस आकाश के ग्रहों पर राज कर रही है उसकी पकड़ से यह तुच्छ इनसान बच कर कहाँ जा सकता है? दूसरी शपथ इस बात पर है कि संसार में इनसान जो अत्याचार करना चाहे कर ले, परंतु वह दिन अवश्य आना है जिससे उसे सावधान किया जा रहा है, जिसमें सबके साथ न्याय किया जाएगा, और अत्याचारियों की पकड़ की जाएगी। तीसरी शपथ इस पर है कि जैसे इन अत्याचारियों ने विवश आस्तिकों के जलने का दृश्य देखा, इसी प्रकार प्रलय के दिन पूरी मानवजाति देखेगी कि उनकी क्या दुर्गत है।

  5. 5

    ٱلنَّارِ ذَاتِ ٱلْوَقُودِ

    Annaari zaatil waqood

    जिसमें ईंधन से भरी आग थी।

  6. 6

    إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌۭ

    Iz hum 'alaihaa qu'ood

    जबकि वे उस (के किनारों) पर बैठे हुए थे।

  7. 7

    وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌۭ

    Wa hum 'alaa maa yaf'aloona bilmu 'mineena shuhood

    और वे ईमान वालों के साथ जो कुछ कर रहे थे, उस पर गवाह थे।

  8. 8

    وَمَا نَقَمُوا۟ مِنْهُمْ إِلَّآ أَن يُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ

    Wa maa naqamoo minhum illaaa aiyu'minoo billaahil 'azeezil Hameed

    और उन्हें ईमान वालों की केवल यह बात बुरी लगी कि वे उस अल्लाह पर ईमान रखते थे, जो प्रभुत्वशाली और हर प्रकार की प्रशंसा के योग्य है।

  9. 9

    ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدٌ

    Allazee lahoo mulkus samaawaati wal ard; wallaahu 'alaa kulli shai 'in Shaheed

    वह (अल्लाह) कि जिसके लिए आकाशों और धरती का राज्य है, और अल्लाह हर चीज़ से अवगत है।

  10. 10

    إِنَّ ٱلَّذِينَ فَتَنُوا۟ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَٰتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا۟ فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ ٱلْحَرِيقِ

    Innal lazeena fatanul mu'mineena wal mu'minaati summa lam yatooboo falahum 'azaabu Jahannama wa lahum 'azaabul hareeq

    निश्चय जिन लोगों ने ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों को परीक्षण में डाला (सताया), फिर तौबा न की, तो उनके लिए जहन्नम की यातना है तथा उनके लिए जलाने वाली यातना है।

  11. 11

    إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَهُمْ جَنَّٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَٰرُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْكَبِيرُ

    Innal lazeena aamanoo wa 'amilus saalihaati lahum Jannaatun tajree min tahtihal anhaar; zaalikal fawzul kabeer

    निःसंदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे काम किए, उनके लिए ऐसे बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बह रही हैं और यही बहुत बड़ी सफलता है।[2]

    [2] (5-11) इन आयतों में जो आस्तिक सताए गए, उनके लिए सहायता का वादा तथा यदि वे अपने विश्वास (ईमान) पर स्थित रहे, तो उनके लिए स्वर्ग की शुभ सूचना और अत्याचारियों के लिए नरक की धमकी है जिन्होंने उनको सताया और फिर अल्लाह से क्षमा याचना आदि करके सत्य को नहीं माना।

  12. 12

    إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ

    Inna batsha Rabbika lashadeed

    निःसंदेह तेरे पालनहार की पकड़ बड़ी सख्त है।

  13. 13

    إِنَّهُۥ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ

    Innahoo Huwa yubdi'u wa yu'eed

    निःसंदेह वही पहली बार पैदा करता है और (वही) दूसरी बार पैदा करेगा।

  14. 14

    وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلْوَدُودُ

    Wa Huwal Ghafoorul Wadood

    और वह है जो अत्यंत क्षमा करने वाला, बहुत प्रेम करने वाला है।

  15. 15

    ذُو ٱلْعَرْشِ ٱلْمَجِيدُ

    Zul 'Arshil Majeed

    वह अर्श (सिंहासन) का मालिक, बड़ा गौरवशाली है।

  16. 16

    فَعَّالٌۭ لِّمَا يُرِيدُ

    Fa' 'aalul limaa yureed

    वह जो चाहता है, कर गुज़रने वाला है।[3]

    [3] (12-16) इन आयतों में बताया गया है कि अल्लाह की पकड़ के साथ ही जो क्षमा याचना करके उसपर ईमान लाए, उसके लिए क्षमा और दया का द्वार खुला हुआ है। क़ुरआन ने इस कुविचार का खंडन किया है कि अल्लाह, पापों को क्षमा नहीं कर सकता। क्योंकि इससे संसार पापों से भर जाएगा और कोई स्वार्थी पाप करके क्षमा याचना कर लेगा, फिर पाप करेगा। यह कुविचार उस समय सह़ीह़ हो सकता है जब अल्लाह को एक इनसान मान लिया जाए, जो यह न जानता हो कि जो व्यक्ति क्षमा माँग रहा है उसके मन में क्या है? अल्लाह तो मर्मज्ञ है, वह जानता है कि किसके मन में क्या है? फिर "तौबा" इसका नाम नहीं कि मुख से इस शब्द को बोल दिया जाए। तौबा (पश्चाताप) मन से पाप न करने के संकल्प का नाम है और अल्लाह तआला जानता है कि किसके मन में क्या है?

  17. 17

    هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْجُنُودِ

    Hal ataaka hadeesul junood

    (ऐ नबी!) क्या तुम्हें सेनाओं की ख़बर पहुँची है?

  18. 18

    فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ

    Fir'awna wa Samood

    फ़िरऔन तथा समूद की?[4]

    [4] (17-18) इनमें अतीत की कुछ अत्याचारी जातियों की ओर संकेत है, जिनका सविस्तार वर्णन क़ुरआन की अनेक सूरतों में आया है। जिन्होंने आस्तिकों पर अत्याचार किए, जैसे मक्का के क़ुरैश मुसलमानों पर कर रहे थे। जबकि उनको पता था कि पिछली जातियों के साथ क्या हुआ। परंतु वे अपने परिणाम से ग़ाफ़िल थे।

  19. 19

    بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى تَكْذِيبٍۢ

    Balil lazeena kafaroo fee takzeeb

    बल्कि वे लोग जिन्होंने कुफ़्र किया, झुठलाने में लगे हुए हैं।

  20. 20

    وَٱللَّهُ مِن وَرَآئِهِم مُّحِيطٌۢ

    Wallaahu minw waraaa'ihim muheet

    और अल्लाह उनके पीछे से (उन्हें) घेरे हुए है।[5]

    [5] (19-20) इन दो आयतों में उनके दुर्भाग्य को बताया जा रहा है जो अपने प्रभुत्व के गर्व में क़ुरआन को नहीं मानते। जबकि उसे माने बिना कोई उपाय नहीं, और वे अल्लाह के अधिकार के भीतर ही हैं।

  21. 21

    بَلْ هُوَ قُرْءَانٌۭ مَّجِيدٌۭ

    Bal huwa Quraanum Majeed

    बल्कि वह गौरव वाला क़ुरआन है।

  22. 22

    فِى لَوْحٍۢ مَّحْفُوظٍۭ

    Fee Lawhim Mahfooz

    जो लौह़े मह़फ़ूज़ (सुरक्षित पट्टिका) में लिखा हुआ है।[6]

    [6] (21-22) इन आयतों में बताया गया है कि यह क़ुरआन कविता और ज्योतिष नहीं है, जैसा कि वे सोचते हैं, यह अल्लाह का श्रेष्ठ और उच्चतम कथन है, जिसका उद्गम "लौह़े मह़फ़ूज़" में सुरक्षित है।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com