सूरह 70
अल-मआरिज
المَعَارِجِ
Al-Ma'arij · मक्की · 44 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
سَأَلَ سَآئِلٌۢ بِعَذَابٍۢ وَاقِعٍۢ
Sa ala saaa'ilum bi'azaa binw-waaqi'
एक माँगने वाले[1] ने वह यातना माँगी, जो घटित होने वाली है।
[1] कहा जाता है नज़्र पुत्र ह़ारिस अथवा अबू जह्ल ने यह माँग की थी कि "ऐ अल्लाह! यदि यह सत्य है तेरी ओर से तो तू हमपर आकाश से पत्थर बरसा दे।" (देखिए : सूरतुल-अन्फाल, आयतः 32)
- 2
لِّلْكَٰفِرِينَ لَيْسَ لَهُۥ دَافِعٌۭ
Lilkaafireen laisa lahoo daafi'
काफ़िरों पर। उसे कोई टालने वाला नहीं।
- 3
مِّنَ ٱللَّهِ ذِى ٱلْمَعَارِجِ
Minal laahi zil ma'aarij
ऊँचाइयों वाले अल्लाह की ओर से।
- 4
تَعْرُجُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍۢ كَانَ مِقْدَارُهُۥ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍۢ
Ta'rujul malaaa'ikatu war Roohu ilaihi fee yawmin kaana miqdaaruhoo khamseena alfa sanah
फ़रिश्ते और रूह[2] उसकी ओर चढ़ेंगे, एक ऐसे दिन में जिसकी मात्रा पचास हज़ार वर्ष है।
[2] रूह़ से अभिप्राय फ़रिश्ता जिबरील (अलैहिस्सलाम) हैं।
- 5
فَٱصْبِرْ صَبْرًۭا جَمِيلًا
Fasbir ssabran jameelaa
अतः (ऐ नबी!) आप अच्छे धैर्य से काम लें।
- 6
إِنَّهُمْ يَرَوْنَهُۥ بَعِيدًۭا
Inaahum yarawnahoo ba'eedaa
निःसंदेह वे उसे दूर समझ रहे हैं।
- 7
وَنَرَىٰهُ قَرِيبًۭا
Wa naraahu qareebaa
और हम उसे निकट देख रहे हैं।
- 8
يَوْمَ تَكُونُ ٱلسَّمَآءُ كَٱلْمُهْلِ
Yawma takoonus samaaa'u kalmuhl
जिस दिन आकाश पिघली हुई धातु के समान हो जाएगा।
- 9
وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ
Wa takoonul jibaalu kal'ihn
और पर्वत धुने हुए ऊन के समान हो जाएँगे।[3]
[3] देखिए : सूरतुल-क़ारिआ।
- 10
وَلَا يَسْـَٔلُ حَمِيمٌ حَمِيمًۭا
Wa laa yas'alu hameemun hameemaa
और कोई मित्र किसी मित्र को नहीं पूछेगा।
- 11
يُبَصَّرُونَهُمْ ۚ يَوَدُّ ٱلْمُجْرِمُ لَوْ يَفْتَدِى مِنْ عَذَابِ يَوْمِئِذٍۭ بِبَنِيهِ
Yubassaroonahum; ya waddul mujrimu law yaftadee min 'azaabi yawma'izim bibaneeh
हालाँकि वे उन्हें दिखाए जा रहे होंगे। अपराधी चाहेगा कि काश उस दिन की यातना से बचने के लिए छुड़ौती में दे दे अपने बेटों को।
- 12
وَصَٰحِبَتِهِۦ وَأَخِيهِ
Wa saahibatihee wa akheeh
तथा अपनी पत्नी और अपने भाई को।
- 13
وَفَصِيلَتِهِ ٱلَّتِى تُـْٔوِيهِ
Wa faseelathil latee tu'weeh
तथा अपने परिवार (कुटुंब) को, जो उसे शरण देता था।
- 14
وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا ثُمَّ يُنجِيهِ
Wa man fil ardi jamee'an summa yunjeeh
और उन सभी लोगों[4] को जो धरती में हैं। फिर अपने आपको बचा ले।
[4] ह़दीस में है कि जिस नारकी को सबसे सरल यातना दी जाएगी, उससे अल्लाह कहेगा : क्या धरती का सब कुछ तुम्हें मिल जाए तो उसे इसके दंड में दे दोगे? वह कहेगा : हाँ। अल्लाह कहेगा : तुम आदम की पीठ में थे, तो मैंने तुमसे इससे सरल की माँग की थी कि मेरा किसी को साझी न बनाना, पर तुमने इनकार किया और शिर्क किया। (सह़ीह़ बुख़ारी : 6557, सह़ीह़ मुस्लिम : 2805)
- 15
كَلَّآ ۖ إِنَّهَا لَظَىٰ
Kallaa innahaa lazaa
कदापि नहीं! निःसंदेह वह (जहन्नम) भड़कने वाली आग है।
- 16
نَزَّاعَةًۭ لِّلشَّوَىٰ
Nazzaa'atal lishshawaa
जो खाल उधेड़ देने वाली है।
- 17
تَدْعُوا۟ مَنْ أَدْبَرَ وَتَوَلَّىٰ
Tad'oo man adbara wa tawallaa
वह उसे पुकारेगी, जिसने पीठ फेरी[5] और मुँह मोड़ा।
[5] अर्थात सत्य से।
- 18
وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰٓ
W jama'a fa aw'aa
तथा (धन) एकत्र किया और संभाल कर रखा।
- 19
۞ إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ خُلِقَ هَلُوعًا
Innal insaana khuliqa haloo'aa
निःसंदेह मनुष्य बहुत अधीर बनाया गया है।
- 20
إِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ جَزُوعًۭا
Izaa massahush sharru jazoo'aa
जब उसे कष्ट पहुँचता है, तो बहुत घबरा जाने वाला है।
- 21
وَإِذَا مَسَّهُ ٱلْخَيْرُ مَنُوعًا
Wa izaa massahul khairu manoo'aa
और जब उसे भलाई मिलती है, तो बहुत रोकने वाला है।
- 22
إِلَّا ٱلْمُصَلِّينَ
Illal musalleen
सिवाय नमाज़ियों के।
- 23
ٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ دَآئِمُونَ
Allazeena hum 'alaa Salaatihim daaa'imoon
जो हमेशा अपनी नमाज़ों की पाबंदी करते हैं।
- 24
وَٱلَّذِينَ فِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّۭ مَّعْلُومٌۭ
Wallazeena feee amwaalihim haqqum ma'loom
और जिनके धन में एक निश्चित भाग है।
- 25
لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
Lissaaa 'ili walmahroom
माँगने वाले तथा वंचित[6] के लिए।
[6] अर्थात जो न माँगने के कारण वंचित रह जाता है।
- 26
وَٱلَّذِينَ يُصَدِّقُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ
Wallazeena yusaddiqoona bi yawmid Deen
और जो बदले के दिन को सत्य मानते हैं।
- 27
وَٱلَّذِينَ هُم مِّنْ عَذَابِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
Wallazeena hum min 'azaabi Rabbihim mushfiqoon
और जो अपने पालनहार की यातना से डरने वाले हैं।
- 28
إِنَّ عَذَابَ رَبِّهِمْ غَيْرُ مَأْمُونٍۢ
Inna 'azaaba Rabbihim ghairu maamoon
निश्चय उनके पालनहार की यातना ऐसी चीज़ है, जिससे निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।
- 29
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَٰفِظُونَ
Wallazeena hum lifuroo jihim haafizoon
और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते हैं।
- 30
إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
Illaa 'alaaa azwaajihim aw maa malakat aymaanuhum fainnahum ghairu maloomeen
सिवाय अपनी पत्नियों से या अपने स्वामित्व में आई दासियों[7] से, तो निश्चय वे निंदनीय नहीं हैं।
[7] इस्लाम में उसी दासी से संभोग उचित है जिसे सेनापति ने ग़नीमत के दूसरे धनों के समान किसी मुजाहिद के स्वामित्व में दे दिया हो। इससे पूर्व किसी बंदी स्त्री से संभोग पाप तथा व्यभिचार है। और उससे संभोग भी उस समय वैध है जब उसे एक बार मासिक धर्म आ जाए। अथवा गर्भवती हो, तो प्रसव के पश्चात् ही संभोग किया जा सकता है। इसी प्रकार जिसके स्वामित्व में आई हो, उसके सिवा और कोई उससे संभोग नहीं कर सकता।
- 31
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
Famanib taghaa waraaa'a zaalika fa ulaaa'ika humul 'aadoon
फिर जो इसके अलावा कुछ और चाहे, तो ऐसे ही लोग सीमा का उल्लंघन करने वाले हैं।
- 32
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَٰنَٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
Wallazeena hum li amaa naatihim wa 'ahdihim raa'oon
और जो अपनी अमानतों तथा अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखने वाले हैं।
- 33
وَٱلَّذِينَ هُم بِشَهَٰدَٰتِهِمْ قَآئِمُونَ
Wallazeena hum bishahaadaatihim qaaa'imoon
और जो अपनी गवाहियों पर क़ायम रहने वाले हैं।
- 34
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
Wallazeena hum 'alaa salaatihim yuhaafizoon
तथा जो अपनी नमाज़ की रक्षा करते हैं।
- 35
أُو۟لَٰٓئِكَ فِى جَنَّٰتٍۢ مُّكْرَمُونَ
Ulaaa'ika fee jannaatim mukramoon
वही लोग जन्नतों में सम्मानित होंगे।
- 36
فَمَالِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ قِبَلَكَ مُهْطِعِينَ
Famaa lil lazeena kafaroo qibalaka muhti'een
फिर इन काफ़िरों को क्या हुआ है कि वे आपकी ओर दौड़े चले आ रहे है?
- 37
عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ عِزِينَ
'Anil yameeni wa 'anish shimaali 'izeen
दाएँ से और बाएँ से समूह के समूह।[8]
[8] अर्थात जब आप क़ुरआन सुनाते हैं, तो उसका उपहास करने के लिए समूहों में होकर आ जाते हैं। और इनका दावा यह है कि स्वर्ग में जाएँगे।
- 38
أَيَطْمَعُ كُلُّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ أَن يُدْخَلَ جَنَّةَ نَعِيمٍۢ
Ayatma'u kullum ri'im minhum anyyudkhala jannata Na'eem
क्या उनमें से प्रत्येक व्यक्ति यह लालच रखता है कि उसे नेमत वाली जन्नत में दाखिल किया जाएगा?
- 39
كَلَّآ ۖ إِنَّا خَلَقْنَٰهُم مِّمَّا يَعْلَمُونَ
Kallaaa innaa khalaq nahum mimmaa ya'lamoon
कदापि नहीं, निश्चय हमने उन्हें उस चीज़[9] से पैदा किया है, जिसे वे जानते हैं।
[9] अर्थात हीन जल (वीर्य) से। फिर भी घमंड करते हैं, तथा अल्लाह और उसके रसूल को नहीं मानते।
- 40
فَلَآ أُقْسِمُ بِرَبِّ ٱلْمَشَٰرِقِ وَٱلْمَغَٰرِبِ إِنَّا لَقَٰدِرُونَ
Falaaa uqsimu bi Rabbil mashaariqi wal maghaaribi innaa laqaadiroon
तो मैं क़सम खाता हूँ पूर्वों (सूर्योदय के स्थानों) तथा पश्चिमों (सूर्यास्त के स्थानों) के रब की! निश्चय हम सक्षम हैं।
- 41
عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ خَيْرًۭا مِّنْهُمْ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
'Alaaa an nubaddila khairam minhum wa maa Nahnu bimasbooqeen
कि उनके स्थान पर उनसे उत्तम लोग ले आएँ तथा हम विवश नहीं हैं।
- 42
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
Fazarhum yakhoodoo wa yal'aboo hattaa yulaaqoo yaw mahumul lazee yoo'adoon
अतः आप उन्हें छोड़ दें कि वे व्यर्थ की बातों में लगे रहें तथा खेलते रहें, यहाँ तक कि उनका सामना उनके उस दिन से हो जाए, जिसका उनसे वादा किया जाता है।
- 43
يَوْمَ يَخْرُجُونَ مِنَ ٱلْأَجْدَاثِ سِرَاعًۭا كَأَنَّهُمْ إِلَىٰ نُصُبٍۢ يُوفِضُونَ
Yawma yakhrujoona minal ajdaasi siraa'an ka anna hum ilaa nusubiny yoofidoon
जिस दिन वे क़ब्रों से तेज़ी से बाहर निकलेंगे, जैसे कि वे किसी निशान की ओर[10] दौड़े जा रहे हैं।
[10] या उनके थानों की ओर। क्योंकि संसार में वे सूर्योदय के समय बड़ी तीव्र गति से अपनी मूर्तियों की ओर दौड़ते थे।
- 44
خَٰشِعَةً أَبْصَٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ
Khaashi'atan absaaruhum tarhaquhum zillah; zaalikal yawmul lazee kaanoo yoo'adoon
उनकी निगाहें झुकी होंगी, उनपर अपमान छाया होगा। यही वह दिन है जिसका उनसे वादा किया[11] जाता था।
[11] अर्थात रसूलों की ज़बानी तथा आकाशीय पुस्तकों के माध्यम से।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
