सूरह 68

अल-क़लम

القَلَمِ

Al-Qalam · मक्की · 52 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    نٓ ۚ وَٱلْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ

    Noon; walqalami wa maa yasturoon

    नून। क़सम है क़लम की तथा उसकी[1] जो वे लिखते हैं।

    [1] अर्थात क़ुरआन की। जिसे उतरने के साथ ही नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) लेखकों से लिखवाते थे। जैसे ही कोई सूरत या आयत उतरती, लेखक क़लम तथा चमड़ों और झिल्लियों के साथ उपस्थित हो जाते थे, ताकि पूरे संसार के मनुष्यों को क़ुरआन अपने वास्तविक रूप में पहुँच सके। और सदा के लिए सुरक्षित हो जाए। क्योंकि अब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पश्चात् कोई नबी और कोई पुस्तक नहीं आएगी। और प्रलय तक के लिए अब पूरे संसार के नबी आप ही हैं। और उनके मार्गदर्शन के लिए क़ुरआन ही एकमात्र धर्म पुस्तक है। इसी लिए इसे सुरक्षित कर दिया गया है। और यह विशेषता किसी भी आकाशीय ग्रंथ को प्राप्त नहीं है। इस लिए अब मोक्ष के लिए अंतिम नबी तथा अंतिम धर्म ग्रंथ क़ुरआन पर ईमान लाना अनिवार्य है।

  2. 2

    مَآ أَنتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍۢ

    Maa anta bini'mati Rabbika bimajnoon

    आप, अपने रब के अनुग्रह से हरगिज़ दीवाना नहीं हैं।

  3. 3

    وَإِنَّ لَكَ لَأَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍۢ

    Wa inna laka la ajran ghaira mamnoon

    तथा निःसंदेह आपके लिए निश्चय ऐसा प्रतिफल है जो निर्बाध है।

  4. 4

    وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِيمٍۢ

    Wa innaka la'alaa khuluqin 'azeem

    तथा निःसंदेह निश्चय आप एक महान चरित्र पर हैं।

  5. 5

    فَسَتُبْصِرُ وَيُبْصِرُونَ

    Fasatubsiru wa yubsiroon

    अतः शीघ्र ही आप देख लेंगे तथा वे भी देख लेंगे।

  6. 6

    بِأَييِّكُمُ ٱلْمَفْتُونُ

    Bi ayyikumul maftoon

    कि तुममें से कौन पागलपन से ग्रसित है।

  7. 7

    إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ

    Innaa Rabbaka Huwa a'lamu biman dalla 'an sabeelihee wa Huwa a'lamu bilmuhtadeen

    निःसंदेह आपका पालनहार ही उसे अधिक जानता है, जो उसकी राह से भटक गया तथा वही अधिक जानता है उन्हें, जो सीधे मार्ग पर हैं।

  8. 8

    فَلَا تُطِعِ ٱلْمُكَذِّبِينَ

    Falaa tuti'il mukazzibeen

    अतः आप झुठलाने वालों की बात न मानें।

  9. 9

    وَدُّوا۟ لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُونَ

    Waddoo law tudhinu fa-yudhinoon

    वे चाहते हैं काश! आप नरमी करें, तो वे भी नरमी[2] करें।

    [2] जब काफ़िर, इस्लाम के प्रभाव को रोकने में असफल हो गए, तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को धमकी और लालच देने के पश्चात्, कुछ लो और कुछ दो की नीति पर आ गए। इस लिए कहा गया कि आप उनकी बातों में न आएँ और परिणाम की प्रतीक्षा करें।

  10. 10

    وَلَا تُطِعْ كُلَّ حَلَّافٍۢ مَّهِينٍ

    Wa laa tuti' kulla hallaa fim maheen

    और आप किसी बहुत क़समें खाने वाले, हीन व्यक्ति की बात न मानें।[3]

    [3] इन आयतों में किसी विशेष काफ़िर की दशा का वर्णन नहीं, बल्कि काफ़िरों के प्रमुखों के नैतिक पतन तथा कुविचारों और दुराचारों को बताया गया है, जो लोगों को इस्लाम के विरुद्ध उकसा रहे थे। तो फिर क्या इनकी बात मानी जा सकती है?

  11. 11

    هَمَّازٍۢ مَّشَّآءٍۭ بِنَمِيمٍۢ

    Hammaazim mash shaaa'im binameem

    जो बहुत ग़ीबत करने वाला, चुग़ली में बहुत दौड़-धूप करने वाला है।

  12. 12

    مَّنَّاعٍۢ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ

    Mannaa'il lilkhairi mu'tadin aseem

    भलाई को बहुत रोकने वाला, हद से बढ़ने वाला, घोर पापी है।

  13. 13

    عُتُلٍّۭ بَعْدَ ذَٰلِكَ زَنِيمٍ

    'Utullim ba'da zaalika zaneem

    क्रूर है, इसके उपरांत हरामज़ादा (वर्णसंकर) है।

  14. 14

    أَن كَانَ ذَا مَالٍۢ وَبَنِينَ

    An kaana zaa maalinw-wa baneen

    इस कारण कि वह धन और बेटों वाला है।

  15. 15

    إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَٰتُنَا قَالَ أَسَٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ

    Izaa tutlaa 'alaihi aayaatunaa qaala asaateerul awwaleen

    जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो कहता है : यह पहले लोगों की (कल्पित) कहानियाँ हैं।

  16. 16

    سَنَسِمُهُۥ عَلَى ٱلْخُرْطُومِ

    Sanasimuhoo 'alal khurtoom

    शीघ्र ही हम उसकी थूथन[4] पर दाग़ लगाएँगे।

    [4] अर्थात नाक पर जिसे वह घमंड से ऊँची रखना चाहता है। और दाग़ लगाने का अर्थ अपमानित करना है।

  17. 17

    إِنَّا بَلَوْنَٰهُمْ كَمَا بَلَوْنَآ أَصْحَٰبَ ٱلْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا۟ لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ

    Innaa balawnaahum kamaa balawnaaa As-haabal jannati iz 'aqsamoo la-yasri munnahaa musbiheen

    निःसंदेह हमने उन्हें परीक्षा में डाला[5] है, जिस प्रकार बाग़ वालों को परीक्षा में डाला था, जब उन्होंने क़सम खाई कि भोर होते ही उसके फल अवश्य तोड़ लेंगे।

    [5] अर्थात मक्का वालों को। इस लिए यदि वे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान लाएँगे, तो उनपर सफलता की राह खुलेगी। अन्यथा संसार और परलोक दोनों की यातना के भागी होंगे।

  18. 18

    وَلَا يَسْتَثْنُونَ

    Wa laa yastasnoon

    और वे 'इन शा अल्लाह' नहीं कह रहे थे।

  19. 19

    فَطَافَ عَلَيْهَا طَآئِفٌۭ مِّن رَّبِّكَ وَهُمْ نَآئِمُونَ

    Fataafa 'alaihaa taaa'i fum mir rabbika wa hum naaa'imoon

    तो आपके पालनहार की ओर से उस (बाग़) पर एक यातना फिर गई, जबकि वे सोए हुए थे।

  20. 20

    فَأَصْبَحَتْ كَٱلصَّرِيمِ

    Fa asbahat kassareem

    तो वह अंधेरी रात जैसा (काला) हो गया।

  21. 21

    فَتَنَادَوْا۟ مُصْبِحِينَ

    Fatanaadaw musbiheen

    फिर उन्होंने भोर होते ही एक-दूसरे को पुकारा :

  22. 22

    أَنِ ٱغْدُوا۟ عَلَىٰ حَرْثِكُمْ إِن كُنتُمْ صَٰرِمِينَ

    Anighdoo 'alaa harsikum in kuntum saarimeen

    कि अपने खेत पर सवेरे ही जा पहुँचो, यदि तुम फल तोड़ने वाले हो।

  23. 23

    فَٱنطَلَقُوا۟ وَهُمْ يَتَخَٰفَتُونَ

    Fantalaqoo wa hum yatakhaafatoon

    चुनाँचे वे आपस में चुपके-चुपके बातें करते हुए चल दिए।

  24. 24

    أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا ٱلْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌۭ

    Al laa yadkhulannahal yawma 'alaikum miskeen

    कि आज उस (बाग़) में तुम्हारे पास कोई निर्धन[6] हरगिज़ न आने पाए।

    [6] ताकि उन्हें कुछ दान न करना पड़े।

  25. 25

    وَغَدَوْا۟ عَلَىٰ حَرْدٍۢ قَٰدِرِينَ

    Wa ghadaw 'alaa hardin qaadireen

    और वे सुबह-सुबह (यह सोचकर) निकले कि वे (निर्धनों को) रोकने में सक्षम हैं।

  26. 26

    فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوٓا۟ إِنَّا لَضَآلُّونَ

    Falammaa ra awhaa qaalooo innaa ladaaalloon

    फिर जब उन्होंने उसे देखा, तो कहा : निःसंदेह हम निश्चय रास्ता भूल गए हैं।

  27. 27

    بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ

    Bal nahnu mahroomoon

    बल्कि हम वंचित[7] कर दिए गए हैं।

    [7] पहले तो सोचा कि राह भूल गए हैं। किंतु फिर देखा कि बाग़ तो उन्हीं का है तो कहा कि यह तो ऐसा उजाड़ हो गया है कि अब कुछ तोड़ने के लिए रह ही नहीं गया है। वास्तव में, यह हमारा दुर्भाग्य है।

  28. 28

    قَالَ أَوْسَطُهُمْ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ لَوْلَا تُسَبِّحُونَ

    Qaala awsatuhum alam aqul lakum law laa tusabbihoon

    उनमें से बेहतर ने कहा : क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि तुम (अल्लाह की) पवित्रता का वर्णन क्यों नहीं करते?

  29. 29

    قَالُوا۟ سُبْحَٰنَ رَبِّنَآ إِنَّا كُنَّا ظَٰلِمِينَ

    Qaaloo subhaana rabbinaaa innaa kunnaa zaalimeen

    उन्होंने कहा : हमारा रब पवित्र है। निःसंदेह हम ही अत्याचारी थे।

  30. 30

    فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ يَتَلَٰوَمُونَ

    Fa aqbala ba'duhum 'alaa ba'diny yatalaawamoon

    फिर वे आपस में एक दूसरे को दोष देने लगे।

  31. 31

    قَالُوا۟ يَٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا طَٰغِينَ

    Qaaloo yaa wailanaaa innaa kunnaa taagheen

    उन्होंने कहा : हाय हमारा विनाश! निश्चय हम ही सीमा का उल्लंघन करने वाले थे।

  32. 32

    عَسَىٰ رَبُّنَآ أَن يُبْدِلَنَا خَيْرًۭا مِّنْهَآ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا رَٰغِبُونَ

    'Asaa rabbunaaa any yubdilanaa khairam minhaaa innaaa ilaa rabbinaa raaghiboon

    आशा है कि हमारा पालनहार हमें बदले में इस (बाग़) से बेहतर प्रदान करेगा। निश्चय हम अपने पालनहार ही की ओर इच्छा रखने वाले हैं।

  33. 33

    كَذَٰلِكَ ٱلْعَذَابُ ۖ وَلَعَذَابُ ٱلْءَاخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ

    Kazaalikal azaab, wa la'azaabul aakhirati akbar; law kaanoo ya'lamoon

    इसी तरह होती है यातना, और आख़िरत की यातना तो इससे भी बड़ी है। काश वे जानते होते!

  34. 34

    إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّٰتِ ٱلنَّعِيمِ

    Inna lilmuttaqeena 'inda rabbihim jannaatin na'eem

    निःसंदेह डरने वालों के लिए उनके पालनहार के पास नेमत के बाग़ हैं।

  35. 35

    أَفَنَجْعَلُ ٱلْمُسْلِمِينَ كَٱلْمُجْرِمِينَ

    Afanaj'alul muslimeena kalmujrimeen

    तो क्या हम आज्ञाकारियों[8] को अपराध करने वालों की तरह कर देंगे?

    [8] मक्का के प्रमुख कहते थे कि यदि प्रलय हुई, तो वहाँ भी हमें यही सांसारिक सुख-सुविधा प्राप्त होगी। जिसका इस आयत में खंडन किया जा रहा है। अभिप्राय यह है कि अल्लाह के यहाँ देर है, परंतु अँधेर नहीं है।

  36. 36

    مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ

    Maa lakum kaifa tahhkumoon

    तुम्हें क्या हुआ, तुम कैसे फ़ैसले करते हो?

  37. 37

    أَمْ لَكُمْ كِتَٰبٌۭ فِيهِ تَدْرُسُونَ

    Am lakum kitaabun feehi tadrusoon

    क्या तुम्हारे पास कोई पुस्तक है, जिसमें तुम पढ़ते हो?

  38. 38

    إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ

    Inna lakum feehi lamaa takhaiyaroon

    (कि) निश्चय तुम्हारे लिए आख़िरत में वही होगा, जो तुम पसंद करोगे?

  39. 39

    أَمْ لَكُمْ أَيْمَٰنٌ عَلَيْنَا بَٰلِغَةٌ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَٰمَةِ ۙ إِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَ

    Am lakum aymaanun 'alainaa baalighatun ilaa yawmil qiyaamati inna lakum lamaa tahkumoon

    या तुम्हारे लिए हमारे ऊपर क़समें हैं, जो क़ियामत के दिन तक बाक़ी रहने वाली हैं कि तुम्हारे लिए निश्चय वही होगा, जो तुम निर्णय करोगे?

  40. 40

    سَلْهُمْ أَيُّهُم بِذَٰلِكَ زَعِيمٌ

    Salhum ayyuhum bizaa lika za'eem

    आप उनसे पूछिए कि उनमें से कौन इसकी ज़मानत लेता है?

  41. 41

    أَمْ لَهُمْ شُرَكَآءُ فَلْيَأْتُوا۟ بِشُرَكَآئِهِمْ إِن كَانُوا۟ صَٰدِقِينَ

    Am lahum shurakaaa'u falyaatoo bishurakaaa 'ihim in kaanoo saadiqeen

    क्या उनके कोई साझी हैं? फिर तो वे अपने साझियों को ले आएँ[9], यदि वे सच्चे हैं।

    [9] ताकि वे उन्हें अच्छा स्थान दिला दें।

  42. 42

    يَوْمَ يُكْشَفُ عَن سَاقٍۢ وَيُدْعَوْنَ إِلَى ٱلسُّجُودِ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ

    Yawma yukshafu 'am saaqinw wa yud'awna ilas sujoodi falaa yastatee'oon

    जिस दिन पिंडली खोल दी जाएगी और वे सजदा करने के लिए बुलाए जाएँगे, तो वे सजदा नहीं कर सकेंगे।[10]

    [10] ह़दीस में है कि प्रलय के दिन अल्लाह अपनी पिंडली खोलेगा, तो प्रत्येक मोमिन पुरुष तथा स्त्री सजदे में गिर जाएँगे। हाँ, वे शेष रह जाएँगे जो दिखावे और नाम के लिये (संसार में) सजदे किया करते थे। वह सजदा करना चाहेंगे, परंतु उनकी रीढ़ की हड्डी तख्त के समान बन जाएगी। जिसके कारण उनके लिए सजदा करना असंभव हो जाएगा। (बुख़ारी : 4919)

  43. 43

    خَٰشِعَةً أَبْصَٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ ۖ وَقَدْ كَانُوا۟ يُدْعَوْنَ إِلَى ٱلسُّجُودِ وَهُمْ سَٰلِمُونَ

    Khaashi'atan absaaruhum tarhaquhum zillatunw wa qad kaanoo yud'awna ilassujoodi wa hum saalimoon

    उनकी आँखें झुकी होंगी, उनपर अपमान छाया होगा। हालाँकि उन्हें (संसार में) सजदे की ओर बुलाया जाता था, जबकि वे भले-चंगे थे।

  44. 44

    فَذَرْنِى وَمَن يُكَذِّبُ بِهَٰذَا ٱلْحَدِيثِ ۖ سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ

    Fazarnee wa many yukazzibu bihaazal hadeesi sanastad rijuhum min haisu laa ya'lamoon

    अतः आप मुझे तथा उसको छोड़ दें, जो इस वाणी (क़ुरआन) को झुठलाता है। हम उन्हें धीरे-धीरे (यातना की ओर) इस प्रकार ले जाएँगे[11] कि वे जान भी न सकेंगे।

    [11] अर्थात उनके बुरे परिणाम की ओर।

  45. 45

    وَأُمْلِى لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِى مَتِينٌ

    Wa umlee lahum; inna kaidee mateen

    और मैं उन्हें मोहलत (अवकाश) दूँगा।[12] निश्चय मेरा उपाय बड़ा मज़बूत है।

    [12] अर्थात् सांसारिक सुख-सुविधा प्रदान करूँगा ताकि वे और अधिक लापरवाह हो जाएँ। फिर अंततः वे यातना से ग्रस्त हो जाएँगे।

  46. 46

    أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ أَجْرًۭا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍۢ مُّثْقَلُونَ

    Am tas'aluhum ajran fahum mim maghramim musqaloon

    क्या आप उनसे कोई पारिश्रमिक[13] माँगते हैं कि वे तावान के बोझ से दबे जा रहे हैं?

    [13] अर्थात धर्म के प्रचार पर।

  47. 47

    أَمْ عِندَهُمُ ٱلْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ

    Am 'indahumul ghaibu fahum yaktuboon

    अथवा उनके पास परोक्ष (का ज्ञान) है, तो वे लिख[14] रहे हैं?

    [14] या ''लौह़े मह़फ़ूज़'' (सुरक्षित पुस्तक) उनके अधिकार में है इस लिए आपका आज्ञा पालन नहीं करते और उसी से ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं?

  48. 48

    فَٱصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُن كَصَاحِبِ ٱلْحُوتِ إِذْ نَادَىٰ وَهُوَ مَكْظُومٌۭ

    Fasbir lihkmi rabbika wa laa takun kasaahibil boot; iz naadaa wa huwa makzoom

    अतः अपने पालनहार के निर्णय तक धैर्य रखें और मछली वाले के समान[15] न हो जाएँ, जब उसने (अल्लाह को) पुकारा, इस हाल में कि वह शोक से भरा हुआ था।

    [15] इससे अभिप्राय यूनुस (अलैहिस्सलाम) हैं, जिनको मछली ने निगल लिया था। (देखिए : सूरतुस-साफ़्फ़ात, आयत : 139)

  49. 49

    لَّوْلَآ أَن تَدَٰرَكَهُۥ نِعْمَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ لَنُبِذَ بِٱلْعَرَآءِ وَهُوَ مَذْمُومٌۭ

    Law laaa an tadaara kahoo ni'matum mir rabbihee lanubiza bil'araaa'i wa huwa mazmoom

    और यदि उसके पालनहार की अनुकंपा ने उसे संभाल न लिया होता, तो निश्चय वह चटियल मैदान में इस दशा में फेंक दिया जाता कि वह निंदित होता।

  50. 50

    فَٱجْتَبَٰهُ رَبُّهُۥ فَجَعَلَهُۥ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ

    Fajtabaahu rabbuhoo faja'alahoo minas saaliheen

    फिर उसके पालनहार ने उसे चुन लिया और उसे सदाचारियों में से बना दिया।

  51. 51

    وَإِن يَكَادُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَٰرِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا۟ ٱلذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُۥ لَمَجْنُونٌۭ

    Wa iny-yakaadul lazeena kafaroo la-yuzliqoonaka biabsaarihim lammaa saml'uz-Zikra wa yaqooloona innahoo lamajnoon

    और वे लोग जिन्होंने इनकार किया, निश्चय क़रीब हैं कि वे अपनी निगाहों से (घूर घूरकर) आपको अवश्य ही फिसला देंगे, जब वे क़ुरआन को सुनते हैं और कहते हैं कि यह अवश्य ही दीवाना है।

  52. 52

    وَمَا هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَٰلَمِينَ

    Wa maa huwa illaa zikrul lil'aalameen

    हालाँकि वह सर्व संसार के लिए मात्र एक उपदेश[16] है।

    [16] इसमें यह बताया गया है कि क़ुरआन केवल अरबों के लिए नहीं, संसार के सभी देशों और जातियों की शिक्षा के लिए उतरा है।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com