सूरह 53
अन-नज्म
النَّجۡمِ
An-Najm · मक्की · 62 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
وَٱلنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ
Wannajmi izaa hawaa
क़सम है तारे की जब वह गिरे!
- 2
مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ
Maa dalla saahibukum wa maa ghawaa
तुम्हारा साथी न तो रास्ते से भटका है और न ही गलत रास्ते पर चला है।
- 3
وَمَا يَنطِقُ عَنِ ٱلْهَوَىٰٓ
Wa maa yyantiqu 'anilhawaaa
और न वह अपनी इच्छा से बोलता है।
- 4
إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْىٌۭ يُوحَىٰ
In huwa illaa Wahyuny yoohaa
वह तो केवल वह़्य है, जो उतारी जाती है।
- 5
عَلَّمَهُۥ شَدِيدُ ٱلْقُوَىٰ
'Allamahoo shadeedul quwaa
उसे बहुत मज़ूबत शक्तियों वाले (फ़रिश्ते)[1] ने सिखाया है।
[1] इससे अभिप्राय जिबरील (अलैहिस्सलाम) हैं, जो वह़्य लाते थे।
- 6
ذُو مِرَّةٍۢ فَٱسْتَوَىٰ
Zoo mirratin fastawaa
जो बड़ा बलशाली है। फिर वह बुलंद हुआ (अपने असली रूप में प्रकट हुआ)।
- 7
وَهُوَ بِٱلْأُفُقِ ٱلْأَعْلَىٰ
Wa huwa bil ufuqil a'laa
जबकि वह आकाश के सबसे ऊँचे क्षितिज (पूर्वी किनारे) पर था।
- 8
ثُمَّ دَنَا فَتَدَلَّىٰ
Summa danaa fatadalla
फिर वह निकट हुआ और उतर आया।
- 9
فَكَانَ قَابَ قَوْسَيْنِ أَوْ أَدْنَىٰ
Fakaana qaaba qawsaini aw adnaa
फिर वह दो धनुषों की दूरी पर था, या उससे भी निकट।
- 10
فَأَوْحَىٰٓ إِلَىٰ عَبْدِهِۦ مَآ أَوْحَىٰ
Fa awhaaa ilaa 'abdihee maaa awhaa
फिर उसने अल्लाह के बंदे[2] की ओर वह़्य की, जो भी वह़्य की।
[2] अर्थात मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर। इन आयतों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जिबरील (फरिश्ते) को उनके वास्तविक रूप में दो बार देखने का वर्णन है। आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कहा : जो कहे कि मुह़म्मद (सल्लल्लहु अलैहि व सल्लम) ने अल्लाह को देखा है, तो वह झूठा है। और जो कहे कि आप कल (भविष्य) की बात जानते थे, तो वह झूठा है। तथा जो कहे कि आप ने धर्म की कुछ बातें छिपा लीं, तो वह झूठा है। किंतु आपने जिबरील (अलैहिस्सलाम) को उनके रूप में दो बार देखा। (बुख़ारी : 4855) इब्ने मसऊद ने कहा कि आपने जिबरील को देखा जिनके छह सौ पंख थे। (बुख़ारी : 4856)
- 11
مَا كَذَبَ ٱلْفُؤَادُ مَا رَأَىٰٓ
Maa kazabal fu'aadu maa ra aa
दिल ने झूठ नहीं बोला, जो कुछ उसने देखा।
- 12
أَفَتُمَٰرُونَهُۥ عَلَىٰ مَا يَرَىٰ
Afatumaaroonahoo 'alaa maayaraa
फिर क्या तुम उससे उसपर झगड़ते हो, जो वह देखता है?
- 13
وَلَقَدْ رَءَاهُ نَزْلَةً أُخْرَىٰ
Wa laqad ra aahu nazlatan ukhraa
हालाँकि, निश्चित रूप से उसने उसे एक और बार उतरते हुए भी देखा है।
- 14
عِندَ سِدْرَةِ ٱلْمُنتَهَىٰ
'Inda sidratil muntaha
सिदरतुल-मुनतहा'[3] के पास।
[3] 'सिदरतुल मुनतहा', यह छठे या सातवें आकाश पर बैरी का एक वृक्ष है। जिस तक धरती की चीज़ पहुँचती है। तथा ऊपर की चीज़ उतरती है। (सह़ीह़ मुस्लिम : 173)
- 15
عِندَهَا جَنَّةُ ٱلْمَأْوَىٰٓ
'Indahaa jannatul maawaa
उसी के पास 'जन्नतुल मावा' (शाश्वत स्वर्ग) है।
- 16
إِذْ يَغْشَى ٱلسِّدْرَةَ مَا يَغْشَىٰ
Iz yaghshas sidrata maa yaghshaa
जब सिदरा पर छा रहा था, जो कुछ छा रहा था।[4]
[4] ह़दीस में है कि वह सोने के पतिंगे थे। (सह़ीह़ मुस्लिम : 173)
- 17
مَا زَاغَ ٱلْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ
Maa zaaghal basaru wa maa taghaa
न निगाह इधर-उधर हुई और न सीमा से आगे बढ़ी।
- 18
لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ ءَايَٰتِ رَبِّهِ ٱلْكُبْرَىٰٓ
Laqad ra aa min aayaati Rabbihil kubraaa
निःसंदेह उसने अपने पालनहार की कुछ बहुत बड़ी निशानियाँ[5] देखीं।
[5] इसमें मे'राज की रात आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आकाशों में अल्लाह की निशानियाँ देखने का वर्णन है।
- 19
أَفَرَءَيْتُمُ ٱللَّٰتَ وَٱلْعُزَّىٰ
Afara'aytumul laata wal 'uzzaa
फिर क्या तुमने लात और उज़्ज़ा को देखा।
- 20
وَمَنَوٰةَ ٱلثَّالِثَةَ ٱلْأُخْرَىٰٓ
Wa manaatas saalisatal ukhraa
तथा तीसरी एक और (मूर्ति) मनात को?[6]
[6] लात, उज़्ज़ा और मनात ये तीनों मक्का के मुश्रिकों की देवियों के नाम हैं। और अर्थ यह है कि क्या इनकी भी कोई वास्तविकता है?
- 21
أَلَكُمُ ٱلذَّكَرُ وَلَهُ ٱلْأُنثَىٰ
A-lakumuz zakaru wa lahul unsaa
क्या तुम्हारे लिए पुत्र हैं और उस (अल्लाह) के लिए पुत्रियाँ?
- 22
تِلْكَ إِذًۭا قِسْمَةٌۭ ضِيزَىٰٓ
Tilka izan qismatun deezaa
तब तो यह बड़ा अन्यायपूर्ण बँटवारा है।
- 23
إِنْ هِىَ إِلَّآ أَسْمَآءٌۭ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَٰنٍ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَمَا تَهْوَى ٱلْأَنفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّن رَّبِّهِمُ ٱلْهُدَىٰٓ
In hiya illaaa asmaaa'un sammaitumoohaaa antum wa aabaaa'ukum maaa anzalal laahu bihaa min sultaan; inyyattabi'oona illaz zanna wa maa tahwal anfusu wa laqad jaaa'ahum mir Rabbihimul hudaa
ये (मूर्तियाँ) कुछ नामों के सिवा कुछ भी नहीं हैं, जो तुमने तथा तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने इनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है। ये लोग केवल अटकल[7] के और उन चीज़ों के पीछे चल रहे हैं जो उनके दिल चाहते हैं। जबकि निःसंदेह उनके पास उनके पालनहार की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है।
[7] मुश्रिक अपनी मूर्तियों को अल्लाह की पुत्रियाँ कहकर उनकी पूजा करते थे, जिसका यहाँ खंडन किया जा रहा है।
- 24
أَمْ لِلْإِنسَٰنِ مَا تَمَنَّىٰ
Am lil insaani maa taman naa
क्या मनुष्य को वह मिल जाएगा, जिसकी वह कामना करे?
- 25
فَلِلَّهِ ٱلْءَاخِرَةُ وَٱلْأُولَىٰ
Falillaahil aakhiratu wal oolaa
(नहीं, ऐसा नहीं है) क्योंकि आख़िरत और दुनिया अल्लाह ही के अधिकार में है।
- 26
۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍۢ فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ لَا تُغْنِى شَفَٰعَتُهُمْ شَيْـًٔا إِلَّا مِنۢ بَعْدِ أَن يَأْذَنَ ٱللَّهُ لِمَن يَشَآءُ وَيَرْضَىٰٓ
Wa kam mim malakin fissamaawaati laa tughnee shafaa'atuhum shai'an illaa mim ba'di anyyaazanal laahu limany yashaaa'u wa yardaa
और आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते हैं कि उनकी सिफ़ारिश कुछ लाभ नहीं देती, परंतु इसके पश्चात कि अल्लाह अनुमति दे जिसके लिए चाहे तथा (जिसे) पसंद करे।[8]
[8] अरब के मुश्रिक यह समझते थे कि यदि हम फ़रिश्तों की पूजा करेंगे, तो वे अल्लाह से सिफ़ारिश करके हमें यातना से मुक्त करा देंगे। इसी का खंडन यहाँ किया जा रहा है।
- 27
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْءَاخِرَةِ لَيُسَمُّونَ ٱلْمَلَٰٓئِكَةَ تَسْمِيَةَ ٱلْأُنثَىٰ
innal lazeena laa yu'minoona bil aakhirati la yusammoonal malaaa'ikata tasmiyatal unsaa
निःसंदेह वे लोग जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, निश्चय वे फ़रिश्तों के नाम औरतों के नामों की तरह रखते हैं।
- 28
وَمَا لَهُم بِهِۦ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ ۖ وَإِنَّ ٱلظَّنَّ لَا يُغْنِى مِنَ ٱلْحَقِّ شَيْـًۭٔا
Wa maa lahum bihee min 'ilmin iny yattabi'oona illaz zanna wa innaz zanna laa yughnee minal haqqi shai'aa
हालाँकि उन्हें इसके बारे में कोई ज्ञान नहीं। वे केवल अनुमान के पीछे चल रहे हैं। और निःसंदेह अनुमान सच्चाई की तुलना में किसी काम नहीं आता।
- 29
فَأَعْرِضْ عَن مَّن تَوَلَّىٰ عَن ذِكْرِنَا وَلَمْ يُرِدْ إِلَّا ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا
Fa a'rid 'am man tawallaa 'an zikrinaa wa lam yurid illal hayaatad dunyaa
अतः आप उससे मुँह फेर लें, जिसने हमारी नसीहत से मुँह मोड़ लिया और जिसने दुनिया के जीवन के सिवा कुछ नहीं चाहा।
- 30
ذَٰلِكَ مَبْلَغُهُم مِّنَ ٱلْعِلْمِ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ وَهُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ ٱهْتَدَىٰ
Zalika mablaghuhum minal 'ilm; inna rabbaka huwa a'lamu biman dalla 'an sabee lihee wa huwa a'lamu bimanih tadaa
यही उनके ज्ञान की सीमा है। निश्चित रूप से आपका पालनहार ही उसे अधिक जानने वाला है, जो उसके मार्ग से भटक गया और वही उसे भी ज़्यादा जानने वाला है, जो सीधे मार्ग पर चला।
- 31
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ لِيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَسَٰٓـُٔوا۟ بِمَا عَمِلُوا۟ وَيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ بِٱلْحُسْنَى
Wa lillaahi maa fis samaawaati wa maa fil ardi liyajziyal lazeena asaaa'oo bimaa 'amiloo wa yajziyal lazeena ahsanoo bilhusnaa
तथा जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, सब अल्लाह ही का है, ताकि वह बुराई करने वालों को उनके किए का बदला दे, और भलाई करने वालों को अच्छा बदला दे।
- 32
ٱلَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَٰٓئِرَ ٱلْإِثْمِ وَٱلْفَوَٰحِشَ إِلَّا ٱللَّمَمَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ وَٰسِعُ ٱلْمَغْفِرَةِ ۚ هُوَ أَعْلَمُ بِكُمْ إِذْ أَنشَأَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ وَإِذْ أَنتُمْ أَجِنَّةٌۭ فِى بُطُونِ أُمَّهَٰتِكُمْ ۖ فَلَا تُزَكُّوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ ٱتَّقَىٰٓ
Allazeena yajtaniboona kabaaa'iral ismi walfawaa hisha illal lamam; inna rabbaka waasi'ul maghfirah; huwa a'lamu bikum iz ansha akum minal ardi wa iz antum ajinnatun fee butooni umma haatikum falaa tuzakkooo anfusakum huwa a'lamu bimanit taqaa
वे लोग जो बड़े गुनाहों तथा अश्लील कार्यों[9] से दूर रहते हैं, सिवाय कुछ छोटे गुनाहों के। निःसंदेह आपका पालनहार बड़ा क्षमा करने वाला है। वह तुम्हें अधिक जानने वाला है जब उसने तुम्हें धरती[10] से पैदा किया और जब तुम अपनी माँओं के पेटों में बच्चे थे। अतः अपनी पवित्रता का दावा मत करो, वह उसे ज़्यादा जानने वाला है जो वास्तव में परहेज़गार है।
[9] इससे अभिप्राय अश्लीलता पर आधारित कुकर्म हैं। जैसे बाल-मैथुन, व्यभिचार, नारियों का अपने सौंदर्य का प्रदर्शन और पर्दे का त्याग, मिश्रित शिक्षा, मिश्रित सभाएँ, सौंदर्य की प्रतियोगिता आदि। जिसे आधुनिक युग में सभ्यता का नाम दिया जाता है। और मुस्लिम समाज भी इससे प्रभावित हो रहा है। ह़दीस में है कि सात विनाशकारी कर्मों से बचो : 1- अल्लाह का साझी बनाने से। 2- जादू करना। 3- अकारण जान मारना। 4- मदिरा पीना। 5- अनाथ का धन खाना। 6- युद्ध के दिन भागना। 7- तथा भोली-भाली पवित्र स्त्री को कलंक लगाना। (सह़ीह़ बुख़ारी : 2766, मुस्लिम : 89)
[10] अर्थात तुम्हारे मूल आदम (अलैहिस्सलाम) को।
- 33
أَفَرَءَيْتَ ٱلَّذِى تَوَلَّىٰ
Afara'ayatal lazee tawallaa
फिर क्या आपने उसे देखा जिसने मुँह फेर लिया?
- 34
وَأَعْطَىٰ قَلِيلًۭا وَأَكْدَىٰٓ
Wa a'taa qaleelanw wa akdaa
और थोड़ा-सा दिया फिर रोक लिया।
- 35
أَعِندَهُۥ عِلْمُ ٱلْغَيْبِ فَهُوَ يَرَىٰٓ
A'indahoo 'ilmul ghaibi fahuwa yaraa
क्या उसके पास परोक्ष का ज्ञान है? अतः वह देख रहा है।[11]
[11] इस आयत में जो परंपरागत धर्म को मोक्ष का साधन समझता है उससे कहा जा रहा है कि क्या वह जानता है कि प्रलय के दिन इतने ही से सफल हो जाएगा? जबकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) वह़्य के आधार पर जो प्रस्तुत कर रहे हैं, वही सत्य है। और अल्लाह की वह़्य ही परोक्ष के ज्ञान का साधन है।
- 36
أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِى صُحُفِ مُوسَىٰ
Am lam yunabbaa bimaa fee suhuhfi Moosa
या उसे उन बातों की सूचना नहीं दी गई, जो मूसा के ग्रंथों में हैं?
- 37
وَإِبْرَٰهِيمَ ٱلَّذِى وَفَّىٰٓ
Wa Ibraaheemal lazee waffaaa
और इबराहीम के (ग्रंथों में), जिसने (कर्तव्य) पूरा किया।
- 38
أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌۭ وِزْرَ أُخْرَىٰ
Allaa taziru waaziratunw wizra ukhraa
कि कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा।
- 39
وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَٰنِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
Wa al laisa lil insaani illaa maa sa'aa
और यह कि मनुष्य के लिए केवल वही है, जिसके लिए उसने प्रयास किया।
- 40
وَأَنَّ سَعْيَهُۥ سَوْفَ يُرَىٰ
Wa anna sa'yahoo sawfa yuraa
और यह कि निश्चय उसका प्रयास शीघ्र ही देखा जाएगा।
- 41
ثُمَّ يُجْزَىٰهُ ٱلْجَزَآءَ ٱلْأَوْفَىٰ
Summa yujzaahul jazaaa 'al awfaa
फिर उसे उसका पूरा प्रतिफल दिया जाएगा।
- 42
وَأَنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلْمُنتَهَىٰ
Wa anna ilaa rabbikal muntahaa
और यह कि निःसंदेह आपके पालनहार ही की ओर अंततः पहुँचना है।
- 43
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَىٰ
Wa annahoo huwa adhaka wa abkaa
तथा यह कि निःसंदह वही है, जिसने हँसाया तथा रुलाया।
- 44
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَمَاتَ وَأَحْيَا
Wa annahoo huwa amaata wa ahyaa
तथा यह कि निःसंदेह वही है, जिसने मृत्यु दी और जीवन दिया।
- 45
وَأَنَّهُۥ خَلَقَ ٱلزَّوْجَيْنِ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰ
Wa annahoo khalaqaz zawjainiz zakara wal unsaa
और यह कि निःसंदेह उसी ने दो प्रकार : नर और मादा पैदा किए।
- 46
مِن نُّطْفَةٍ إِذَا تُمْنَىٰ
Min nutfatin izaa tumnaa
एक बूँद से, जब वह टपकाई जाती है।
- 47
وَأَنَّ عَلَيْهِ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْأُخْرَىٰ
Wa anna 'alaihin nash atal ukhraa
और यह कि निःसंदेह उसी के ज़िम्मे दूसरी बार[12] पैदा करना है।
[12] अर्थात प्रलय के दिन प्रतिफल प्रदान करने के लिए।
- 48
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَغْنَىٰ وَأَقْنَىٰ
Wa annahoo huwa aghnaa wa aqnaa
और यह कि निःसंदेह उसी ने धनी बनाया और कोष प्रदान किया।
- 49
وَأَنَّهُۥ هُوَ رَبُّ ٱلشِّعْرَىٰ
Wa annahoo huwa rabbush shi'raa
और यह कि निःसंदेह वही ''शे'रा'' [13] का रब है।
[13] शे'रा एक तारे का नाम है। जिसकी पूजा कुछ अरब के लोग किया करते थे। (इब्ने कसीर) अर्थ यह है कि यह तारा पूज्य नहीं, वास्तविक पूज्य उसका स्वामी अल्लाह है।
- 50
وَأَنَّهُۥٓ أَهْلَكَ عَادًا ٱلْأُولَىٰ
Wa annahooo ahlak a 'Aadanil oolaa
और यह कि निःसंदेह उसी ने प्रथम 'आद' [14] को विनष्ट किया।
[14] यह हूद (अलैहिस्सलाम) की जाति थे।
- 51
وَثَمُودَا۟ فَمَآ أَبْقَىٰ
Wa samooda famaaa abqaa
तथा समूद को, फिर (किसी को) बाक़ी न छोड़ा।
- 52
وَقَوْمَ نُوحٍۢ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ هُمْ أَظْلَمَ وَأَطْغَىٰ
Wa qawma Noohim min qablu innahum kaanoo hum azlama wa atghaa
तथा इनसे पहले नूह़ की जाति को। निःसंदेह वे बहुत ही ज़ालिम और बड़े ही सरकश थे।
- 53
وَٱلْمُؤْتَفِكَةَ أَهْوَىٰ
Wal mu'tafikata ahwaa
और उलट जाने वाली बस्ती[15] को उसने उठाकर धरती पर दे मारा।
[15] अर्थात लूत अलैहिस्सलमा की जाति कि बस्तियों को।
- 54
فَغَشَّىٰهَا مَا غَشَّىٰ
Faghashshaahaa maa ghashshaa
तो ढाँप दिया[16] उसे जिस चीज़ से ढाँपा।
[16] अर्थात पत्थरों की वर्षा करके उससे उनकी बस्ती को ढाँप दिया।
- 55
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكَ تَتَمَارَىٰ
Fabi ayyi aalaaa'i Rabbika tatamaaraa
तो (ऐ इनसान!) तू अपने पालनहार की ने'मतों में से किस-किस में संदेह करेगा?
- 56
هَٰذَا نَذِيرٌۭ مِّنَ ٱلنُّذُرِ ٱلْأُولَىٰٓ
Haazaa nazeerum minan nuzuril oolaa
यह[17] पहले डराने वालों में से एक डराने वाला है।
[17] अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) भी एक रसूल हैं प्रथम रसूलों के समान।
- 57
أَزِفَتِ ٱلْءَازِفَةُ
Azifatil laazifah
निकट आने वाली निकट आ गई।
- 58
لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ ٱللَّهِ كَاشِفَةٌ
Laisa lahaa min doonil laahi kaashifah
जिसे अल्लाह के सिवा कोई हटाने वाला नहीं।
- 59
أَفَمِنْ هَٰذَا ٱلْحَدِيثِ تَعْجَبُونَ
Afamin hazal hadeesi ta'jaboon
तो क्या तुम इस बात पर आश्चर्य करते हो?
- 60
وَتَضْحَكُونَ وَلَا تَبْكُونَ
Wa tadhakoona wa laa tabkoon
तथा हँसते हो और रोते नहीं हो?
- 61
وَأَنتُمْ سَٰمِدُونَ
Wa antum saamidoon
तथा तुम ग़ाफ़िल हो!
- 62
فَٱسْجُدُوا۟ لِلَّهِ وَٱعْبُدُوا۟ ۩
Fasjudoo lillaahi wa'budoo
अतः अल्लाह को सजदा करो और उसी की इबादत[18] करो।
[18] ह़दीस में है कि जब सजदे की प्रथम सूरत "नज्म" उतरी, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और जो आपके पास थे, सब ने सजदा किया, एक व्यक्ति के सिवा। उसने कुछ धूल ली, और उसपर सज्दा किया। तो मैंने इसके पश्चात् देखा कि वह काफ़िर रहते हुए मारा गया। और वह उमय्या बिन ख़लफ़ है। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4863)
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
