सूरह 44

अद-दुख़ान

الدُّخَانِ

Ad-Dukhan · मक्की · 59 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    حمٓ

    Haa Meeem

    ह़ा, मीम।

  2. 2

    وَٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ

    Wal Kitaabil Mubeen

    क़सम है स्पष्ट करने वाली पुस्तक की।

  3. 3

    إِنَّآ أَنزَلْنَٰهُ فِى لَيْلَةٍۢ مُّبَٰرَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ

    Innaaa anzalnaahu fee lailatim mubaarakah; innaa kunnaa munzireen

    निःसंदेह हमने इसे[1] एक बरकत वाली रात में उतारा है। निःसंदेह हम डराने वाले थे।

    [1] बरकत वाली रात से अभिप्राय "लैलतुल क़द्र" है। यह रमज़ान के महीने के अंतिम दशक की एक विषम रात्रि होती है। यहाँ आगे बताया जा रहा है कि इसी रात्रि में पूरे वर्ष होने वाले विषय का निर्णय किया जाता है। इस शुभ रात की विशेषता तथा प्रधानता के लिए सूरतुल-क़द्र देखिए। इसी शुभ रात्रि में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर क़ुरआन उतरने का आरंभ हुआ। फिर 23 वर्षों तक आवश्यकतानुसार विभिन्न समय में उतरता रहा। (देखिए : सूरतुल-बक़रह, आयत संख्या : 185)

  4. 4

    فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ

    Feehaa yufraqu kullu amrin hakeem

    इसी (रात) में प्रत्येक अटल मामले का निर्णय किया जाता है।

  5. 5

    أَمْرًۭا مِّنْ عِندِنَآ ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ

    Amram min 'indinaaa; innaa kunnaa mursileen

    हमारी ओर से आदेश के कारण। निःसंदेह हम ही भेजने वाले थे।

  6. 6

    رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ

    Rahmatam mir rabbik; innahoo Huwas Samee'ul 'Aleem

    आपके पालनहार की दया के कारण। निश्चय वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।

  7. 7

    رَبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ

    Rabbis samaawaati wal ardi wa maa bainahumaa; in kuntum mooqineen

    जो आकाशों तथा धरती और उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों का पालनहार है, यदि तुम विश्वास करने वाले हो।

  8. 8

    لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ

    Laaa ilaaha illaa Huwa yuhyee wa yumeetu Rabbukum wa Rabbu aabaaa'ikumul awwaleen

    उसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं। वही जीवित करता और मारता है। तुम्हारा पालनहार तथा तुम्हारे पहले बाप-दादाओं का पालनहार है।

  9. 9

    بَلْ هُمْ فِى شَكٍّۢ يَلْعَبُونَ

    Bal hum fee shakkiny yal'aboon

    बल्कि वे संदेह में पड़े खेल रहे हैं।

  10. 10

    فَٱرْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِى ٱلسَّمَآءُ بِدُخَانٍۢ مُّبِينٍۢ

    Fartaqib Yawma taatis samaaa'u bidukhaanim mubeen

    तो आप उस दिन की प्रतीक्षा करें, जब आकाश प्रत्यक्ष धुआँ[2] लाएगा।

    [2] इस प्रत्यक्ष धुएँ तथा दुःखदायी यातना की व्याख्या सह़ीह़ ह़दीस में यह आयी है कि जब मक्कावासियों ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कड़ा विरोध किया, तो आपने यह शाप दिया कि ऐ अल्लाह! उनपर सात वर्ष का अकाल भेज दे। और जब अकाल आया, तो भूख के कारण उन्हें धुआँ जैसा दिखाई देने लगा। तब उन्होंने आप से कहा कि आप अल्लाह से प्रार्थना कर दें। वह हमसे अकाल दूर कर देगा, तो हम ईमान ले आएँगे। और जब अकाल दूर हुआ तो फिर अपनी स्थिति पर लौट आए। फिर अल्लाह ने बद्र के युद्ध के दिन उनसे बदला लिया। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4821, तथा सह़ीह़ मुस्लिम : 2798)

  11. 11

    يَغْشَى ٱلنَّاسَ ۖ هَٰذَا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ

    Yaghshan naasa haazaa 'azaabun aleem

    जो लोगों को ढाँप लेगा। यह दुःखदायी यातना है।

  12. 12

    رَّبَّنَا ٱكْشِفْ عَنَّا ٱلْعَذَابَ إِنَّا مُؤْمِنُونَ

    Rabbanak shif 'annal 'azaaba innaa mu'minoon

    ऐ हमारे पालनहार! हमसे यह यातना दूर कर दे। निःसंदेह हम ईमान लाने वाले हैं।

  13. 13

    أَنَّىٰ لَهُمُ ٱلذِّكْرَىٰ وَقَدْ جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مُّبِينٌۭ

    Annaa lahumuz zikraa wa qad jaaa'ahum Rasoolum mubeen

    उनके लिए नसीहत कहाँ? हालाँकि, निश्चित रूप से उनके पास स्पष्ट करने वाला रसूल आ चुका।

  14. 14

    ثُمَّ تَوَلَّوْا۟ عَنْهُ وَقَالُوا۟ مُعَلَّمٌۭ مَّجْنُونٌ

    Summaa tawallaw 'anhu wa qaaloo mu'allamum majnoon

    फिर उन्होंने उससे मुँह फेर लिया और उन्होंने कहा : यह तो सिखाया हुआ है, यह पागल है।

  15. 15

    إِنَّا كَاشِفُوا۟ ٱلْعَذَابِ قَلِيلًا ۚ إِنَّكُمْ عَآئِدُونَ

    Innaa kaashiful 'azaabi qaleelaa; innakum 'aaa'indoon

    निःसंदेह हम इस यातना को थोड़ी देर के लिए दूर करने वाले हैं। (परंतु) निःसंदेह तुम फिर वही कुछ करने वाले हो।

  16. 16

    يَوْمَ نَبْطِشُ ٱلْبَطْشَةَ ٱلْكُبْرَىٰٓ إِنَّا مُنتَقِمُونَ

    Yawma nabtishul batsha tal kubraa innaa muntaqimoon

    जिस दिन हम बड़ी पकड़[3] पकड़ेंगे, निःसंदेह हम बदला लेने वाले हैं।

    [3] यह बड़ी पकड़ का दिन बद्र के युद्ध का दिन है। जिसमें उनके बड़े-बड़े सत्तर प्रमुख मारे गए तथा इतनी ही संख्या में बंदी बनाए गए। और उनकी दूसरी पकड़ क़ियामत के दिन होगी, जो इससे भी बड़ी और गंभीर होगी।

  17. 17

    ۞ وَلَقَدْ فَتَنَّا قَبْلَهُمْ قَوْمَ فِرْعَوْنَ وَجَآءَهُمْ رَسُولٌۭ كَرِيمٌ

    Wa laqad fatannaa qablahum qawma Fir'awna wa jaaa'ahum Rasoolun kareem

    तथा निःसंदेह हमने इनसे पूर्व फ़िरऔन की जाति की परीक्षा ली तथा उनके पास एक अति सम्मानित रसूल आया।

  18. 18

    أَنْ أَدُّوٓا۟ إِلَىَّ عِبَادَ ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ

    An addooo ilaiya 'ibaadal laahi innee lakum Rasoolun ameen

    यह कि अल्लाह के बंदों को मेरे हवाले कर दो। निश्चय मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।

  19. 19

    وَأَن لَّا تَعْلُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّىٓ ءَاتِيكُم بِسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍۢ

    Wa al laa ta'loo 'alal laahi innee aateekum bisultaanim mubeen

    तथा यह कि अल्लाह के मुक़ाबले में सरकशी न करो, निःसंदेह मैं तुम्हारे पास स्पष्ट प्रमाण लाने वाला हूँ।

  20. 20

    وَإِنِّى عُذْتُ بِرَبِّى وَرَبِّكُمْ أَن تَرْجُمُونِ

    Wa innee 'uztu bi Rabbee wa rabbikum an tarjumoon

    तथा निःसंदेह मैंने अपने पालनहार तथा तुम्हारे पालनहार की इससे शरण ली है कि तुम मुझपर पथराव कर मेरी जान ले लो।

  21. 21

    وَإِن لَّمْ تُؤْمِنُوا۟ لِى فَٱعْتَزِلُونِ

    Wa il lam tu'minoo lee fa'taziloon

    और अगर तुम मेरी बात नहीं मानते, तो मुझसे दूर रहो।

  22. 22

    فَدَعَا رَبَّهُۥٓ أَنَّ هَٰٓؤُلَآءِ قَوْمٌۭ مُّجْرِمُونَ

    Fada'aa rabbahooo anna haaa'ulaaa'i qawmum mujrimoon

    अंततः उसने अपने पालनहार को पुकारा कि निःसंदेह ये अपराधी लोग हैं।

  23. 23

    فَأَسْرِ بِعِبَادِى لَيْلًا إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ

    Fa asri bi'ibaadee lailan innakum muttaba'oon

    अतः तुम मेरे बंदों को लेकर रातों-रात चले जाओ। निःसंदेह तुम्हारा पीछा किया जाएगा।

  24. 24

    وَٱتْرُكِ ٱلْبَحْرَ رَهْوًا ۖ إِنَّهُمْ جُندٌۭ مُّغْرَقُونَ

    Watrukil bahra rahwan innahum jundum mughraqoon

    तथा सागर को अपनी दशा पर ठहरा हुआ छोड़ दे। निःसंदेह वे एक ऐसी सेना हैं, जो डुबोए जाने वाले हैं।

  25. 25

    كَمْ تَرَكُوا۟ مِن جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ

    Kam tarakoo min jannaatinw wa 'uyoon

    वे कितने ही बाग़ और जल स्रोत छोड़ गए।

  26. 26

    وَزُرُوعٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ

    Wa zuroo'inw wa maqaa min kareem

    तथा खेतियाँ और बढ़िया स्थान।

  27. 27

    وَنَعْمَةٍۢ كَانُوا۟ فِيهَا فَٰكِهِينَ

    Wa na'matin kaanoo feehaa faakiheen

    तथा सुख-सामग्री, जिनमें वे आनंद ले रहे थे।

  28. 28

    كَذَٰلِكَ ۖ وَأَوْرَثْنَٰهَا قَوْمًا ءَاخَرِينَ

    Kazaalika wa awrasnaahaa qawman aakhareen

    ऐसा ही हुआ और हमने उनका उत्तराधिकारी दूसरे[4] लोगों को बना दिया।

    [4] अर्थात बनी इसराईल (याक़ूब अलैहिस्सलाम की संतान) को।

  29. 29

    فَمَا بَكَتْ عَلَيْهِمُ ٱلسَّمَآءُ وَٱلْأَرْضُ وَمَا كَانُوا۟ مُنظَرِينَ

    Famaa bakat 'alaihimus samaaa'u wal ardu wa maa kaanoo munzareen

    फिर न उनपर आकाश और धरती रोए और न वे मोहलत पाने वाले हुए।

  30. 30

    وَلَقَدْ نَجَّيْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنَ ٱلْعَذَابِ ٱلْمُهِينِ

    Wa laqad najjainaa Baneee Israaa'eela minal'azaabil muheen

    तथा निःसंदेह हमने इसराईल की संतान को अपमानकारी यातना से बचा लिया।

  31. 31

    مِن فِرْعَوْنَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَالِيًۭا مِّنَ ٱلْمُسْرِفِينَ

    Min Fir'awn; innahoo kaana 'aaliyam minal musrifeen

    फ़िरऔन से। निःसंदेह वह हद से बढ़ने वालों में से एक सरकश व्यक्ति था।

  32. 32

    وَلَقَدِ ٱخْتَرْنَٰهُمْ عَلَىٰ عِلْمٍ عَلَى ٱلْعَٰلَمِينَ

    Wa laqadikh tarnaahum 'alaa 'ilmin 'alal 'aalameen

    तथा निःसंदेह हमने उन्हें ज्ञान के आधार पर संसार वासियों पर चुन लिया।

  33. 33

    وَءَاتَيْنَٰهُم مِّنَ ٱلْءَايَٰتِ مَا فِيهِ بَلَٰٓؤٌۭا۟ مُّبِينٌ

    Wa aatainaahum minal aayaati maa feehi balaaa'um mubeen

    तथा हमने उन्हें ऐसी निशानियाँ प्रदान कीं, जिनमें खुली परीछा थी।

  34. 34

    إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَيَقُولُونَ

    Inna haaa'ulaaa'i la yaqooloon

    निःसंदेह ये[5] लोग निश्चय कहते हैं।

    [5] अर्थात मक्का के मुश्रिक कहते हैं कि सांसारिक जीवन ही अंतिम जीवन है। इसके पश्चात् परलोक का जीवन नहीं है।

  35. 35

    إِنْ هِىَ إِلَّا مَوْتَتُنَا ٱلْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُنشَرِينَ

    In hiya illaa mawtatunal oolaa wa maa nahnu bimun shareen

    कि हमारी इस पहली मृत्यु के सिवा कोई (मृत्यु) नहीं, और न हम कभी दोबारा उठाए जाएँगे।

  36. 36

    فَأْتُوا۟ بِـَٔابَآئِنَآ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ

    Faatoo bi aabaaa'inaaa inkuntum saadiqeen

    तो तुम हमारे बाप-दादा को ले आओ, यदि तुम सच्चे हो?

  37. 37

    أَهُمْ خَيْرٌ أَمْ قَوْمُ تُبَّعٍۢ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ أَهْلَكْنَٰهُمْ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ مُجْرِمِينَ

    Ahum khayrun am qawmu Tubba'inw wallazeena min qablihim; ahlaknaahum innahum kaanoo mujrimeen

    क्या ये लोग बेहतर हैं, अथवा तुब्बा' की जाति[6] तथा वे लोग जो उनसे पूर्व थे? हमने उन्हें विनष्ट कर दिया। निःसंदेह वे अपराधी थे।

    [6] तुब्बा' की जाति से अभिप्राय यमन की जाति सबा है। जिसके विनाश का वर्णन सूरत सबा में किया गया है। तुब्बा' ह़िम्यर जाति के शासकों की उपाधि थी जिसे उनकी अवज्ञा के कारण ध्वस्त कर दिया गया। (देखिए : सूरत सबा की आयत : 15 से 19 तक।)

  38. 38

    وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَٰعِبِينَ

    Wa maa khalaqnas samaawaati wal arda wa maa baina humaa laa'ibeen

    और हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है, खेलते हुए नहीं बनाया है।

  39. 39

    مَا خَلَقْنَٰهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

    Maa khalaqnaahumaaa illaa bilhaqqi wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon

    हमने उन दोनों को सत्य ही के साथ पैदा किया है, किंतु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।

  40. 40

    إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ مِيقَٰتُهُمْ أَجْمَعِينَ

    Inna yawmal fasli meeqaatuhum ajma'een

    निश्चय फ़ैसले[7] का दिन उन सब का नियत समय है।

    [7] अर्थात आकाशों तथा धरती की रचना लोगों की परीक्षा के लिए की गई है। और परीक्षा फल के लिए प्रलय का समय निर्धारित कर दिया गया है।

  41. 41

    يَوْمَ لَا يُغْنِى مَوْلًى عَن مَّوْلًۭى شَيْـًۭٔا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ

    Yawma laa yughnee mawlan 'am mawlan shai'anw wa laa hum yunsaroon

    जिस दिन कोई साथी किसी साथी के कुछ काम न आएगा और न उनकी सहायता की जाएगी।

  42. 42

    إِلَّا مَن رَّحِمَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

    Illaa mar rahimal laah' innahoo huwal 'azeezur raheem

    किंतु जिसपर अल्लाह ने दया की, निःसंदेह वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान है।

  43. 43

    إِنَّ شَجَرَتَ ٱلزَّقُّومِ

    Inna shajarataz zaqqoom

    निःसंदेह ज़क़्क़ूम (थूहड़) का वृक्ष।

  44. 44

    طَعَامُ ٱلْأَثِيمِ

    Ta'aamul aseem

    पापी का भोजन है।

  45. 45

    كَٱلْمُهْلِ يَغْلِى فِى ٱلْبُطُونِ

    Kalmuhli yaghlee filbutoon

    पिघले हुए ताँबे (या तलछट) की तरह, पेटों में खौलता है।

  46. 46

    كَغَلْىِ ٱلْحَمِيمِ

    Kaghalyil hameem

    गर्म पानी के खौलने की तरह।

  47. 47

    خُذُوهُ فَٱعْتِلُوهُ إِلَىٰ سَوَآءِ ٱلْجَحِيمِ

    Khuzoohu fa'tiloohu ilaa sawaaa'il Jaheem

    इसे पकड़ो, फिर इसे धधकती आग के बीच तक घसीटकर ले जाओ।

  48. 48

    ثُمَّ صُبُّوا۟ فَوْقَ رَأْسِهِۦ مِنْ عَذَابِ ٱلْحَمِيمِ

    Summa subboo fawqa raasihee min 'azaabil hameem

    फिर खौलते हुए पानी की कुछ यातना उसके सिर पर उँडेल दो।[8]

    [8] ह़दीस में है कि इससे जो कुछ उसके भीतर होगा पिघलकर दोनों पाँव के बीच से निकल जाएगा, फिर उसे अपनी पहली दशा पर कर दिया जाएगा। (तिर्मिज़ी : 2582, इस ह़दीस की सनद हसन है।)

  49. 49

    ذُقْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْكَرِيمُ

    Zuq innaka antal 'azeezul kareem

    चख, निःसंदेह तू ही वह व्यक्ति है जो बड़ा बलशाली और सम्माननीय है।

  50. 50

    إِنَّ هَٰذَا مَا كُنتُم بِهِۦ تَمْتَرُونَ

    Inna haazaa maa kuntum bihee tamtaroon

    निःसंदे यह वही है जिसके बारे में तुम संदेह करते थे।

  51. 51

    إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى مَقَامٍ أَمِينٍۢ

    Innal muttaqeena fee maqaamin ameen

    निःसंदेह परहेज़गार लोग शांति एवं सुरक्षा वाली जगह में होंगे।

  52. 52

    فِى جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ

    Fee jannaatinw wa 'uyoon

    बाग़ों तथा जल स्रोतों में।

  53. 53

    يَلْبَسُونَ مِن سُندُسٍۢ وَإِسْتَبْرَقٍۢ مُّتَقَٰبِلِينَ

    Yalbasoona min sundusinw wa istbraqim mutaqaabileen

    वे बारीक और गाढ़े रेशम के वस्त्र पहनेंगे, आमने-सामने बैठे होंगे।

  54. 54

    كَذَٰلِكَ وَزَوَّجْنَٰهُم بِحُورٍ عِينٍۢ

    Kazaalika wa zawwajnaahum bihoorin 'een

    ऐसा ही होगा और हम उनका विवाह गोरे बदन, काली आँखों वाली औरतों से कर देंगे, जो बड़ी-बड़ी आँखों वाली होंगी।

  55. 55

    يَدْعُونَ فِيهَا بِكُلِّ فَٰكِهَةٍ ءَامِنِينَ

    Yad'oona feehaa bikulli faakihatin aamineen

    वे उसमें निश्चिंत होकर हर प्रकार के फल मंगवाएँगे।

  56. 56

    لَا يَذُوقُونَ فِيهَا ٱلْمَوْتَ إِلَّا ٱلْمَوْتَةَ ٱلْأُولَىٰ ۖ وَوَقَىٰهُمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ

    Laa yazooqoona feehal mawtaa illal mawtatal oolaa wa qaqaahum 'azaabal jaheem

    वे उसमें मृत्यु[9] का स्वाद नहीं चखेंगे, परंतु वह मृत्यु जो पहली थी, और वह (अल्लाह) उन्हें दहकती हुई आग के अज़ाब से बचा लेगा।

    [9] ह़दीस में है कि जब स्वर्गी स्वर्ग में और नारकी नरक में चले जाएँगे, तो मौत को स्वर्ग और नरक के बीच लाकर वध कर दिया जाएगा। और एलान कर दिया जाएगा कि अब मौत नहीं होगी। जिससे स्वर्गी प्रसन्न हो जाएँगे और नारकियों को शोक पर शोक हो जाएगा। (सह़ीह़ बुख़ारी : 6548, सह़ीह़ मुस्लिम : 2850)

  57. 57

    فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكَ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ

    Fadlam mir rabbik; zaalika huwal fawzul 'azeem

    आपके पालनहार की ओर से अनुग्रह के कारण। यही बहुत बड़ी सफलता है।

  58. 58

    فَإِنَّمَا يَسَّرْنَٰهُ بِلِسَانِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

    Fa innamaa yassarnaahu bilisaanika la'allahum yatazakkaroon

    सो तथ्य यही है कि हमने इसे आपकी भाषा में आसान कर दिया है, ताकि वे नसीहत ग्रहण करें।

  59. 59

    فَٱرْتَقِبْ إِنَّهُم مُّرْتَقِبُونَ

    Fartaqib innahum murta qiboon

    अतः आप प्रतीक्षा करें,[10] निःसंदेह वे भी प्रतीक्षा करने वाले हैं।

    [10] अर्थात परिणाम की।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com