सूरह 28

अल-क़सस

القَصَصِ

Al-Qasas · मक्की · 88 आयतें

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

  1. 1

    طسٓمٓ

    Taa-Seeen-Meeem

    ता, सीन, मीम।

  2. 2

    تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ

    Tilka Aayaatul Kitaabil mubeen

    ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं।

  3. 3

    نَتْلُوا۟ عَلَيْكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِٱلْحَقِّ لِقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ

    Natloo 'alaika min naba-i Moosaa wa Fi'awna bilhaqqi liqawminy yu'miinoon

    हम आपको मूसा तथा फ़िरऔन के कुछ समाचार सच्चाई के साथ सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं।

  4. 4

    إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِى ٱلْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًۭا يَسْتَضْعِفُ طَآئِفَةًۭ مِّنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَآءَهُمْ وَيَسْتَحْىِۦ نِسَآءَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلْمُفْسِدِينَ

    Inna Fir'awna 'alaa fil ardi wa ja'ala ahlahaa shiya'ai yastad'ifu taaa'ifatam minhum yuzabbihu abnaaa'ahum wa yastahyee nisaaa'ahum; innahoo kaana minal mufsideen

    निःसंदेह फ़िरऔन ने धरती में सरकशी की और उसके वासियों को कई समूहों में विभाजित कर दिया। जिनमें से एक समूह को वह बहुत कमज़ोर कर रहा था, उनके बेटों का बुरी तरह से वध कर देता और उनकी महिलाओं को जीवित रहने देता था। निःसंदेह वह बिगाड़ पैदा करने वालों में से था।

  5. 5

    وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى ٱلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةًۭ وَنَجْعَلَهُمُ ٱلْوَٰرِثِينَ

    Wa nureedu an namunna 'alal lazeenas tud'ifoo fil ardi wa naj'alahum a'immatanw wa naj'alahumul waariseen

    तथा हम चाहते थे कि हम उन लोगों पर उपकार करें, जिन्हें धरती में बहुत कमज़ोर कर दिया गया तथा उन्हें अगुआ बनाएँ और उन्हीं को वारिस[1] बनाएँ।

    [1] अर्थात मिस्र देश का राज्य उन्हीं को प्रदान कर दें।

  6. 6

    وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَنُرِىَ فِرْعَوْنَ وَهَٰمَٰنَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَحْذَرُونَ

    Wa numakkina lahum fil ardi wa nuriya Fir'awna wa Haamaana wa junoodahumaa minhum maa kaanoo yahzaroon

    तथा उन्हें धरती में सत्ता प्रदान कर दें और फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाओं को उनकी ओर से वह सब दिखाएँ जिससे वे डरते थे।[2]

    [2] अर्थात बनी इसराईल के हाथों अपने राज्य के पतन से।

  7. 7

    وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ أُمِّ مُوسَىٰٓ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِى ٱلْيَمِّ وَلَا تَخَافِى وَلَا تَحْزَنِىٓ ۖ إِنَّا رَآدُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ

    Wa awhainaaa ilaaa ummi Moosaaa an ardi'eehi faizaa khifti 'alaihi fa alqeehi filyammi wa laa takhaafee wa laa tahzaneee innaa raaaddoohu ilaiki wa jaa'iloohu minal mursaleen

    और हमने मूसा की माँ की ओर वह़्य की[3] कि उसे दूध पिला, फिर जब तुझे उसके बारे में भय हो, तो उसे दरिया में डाल दे और न डर और न शोक कर। निःसंदेह हम उसे तेरी ओर वापस लाने वाले हैं और उसे रसूलों में से बनाने वाले हैं।

    [3] जब मूसा का जन्म हुआ, तो अल्लाह ने उनके माता के मन में ये बातें डाल दीं।

  8. 8

    فَٱلْتَقَطَهُۥٓ ءَالُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّۭا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَٰمَٰنَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا۟ خَٰطِـِٔينَ

    Faltaqatahooo Aalu Fir'awna li yakoona lahum 'aduwwanw wa hazanaa; inna Fir'awna wa Haamaana wa junooda humaa kaanoo khaati'een

    तो फ़िरऔन के घर वालों[4] ने उसे उठा लिया, ताकि अंत में वह उनका शत्रु और शोक का कारण ठहरे। निःसंदेह फ़िरऔन तथा हामान और उनकी सेनाएँ पापी थीं।

    [4] अर्थात उसे एक संदूक़ में रखकर दरिया में डाल दिया जिसे फ़िरऔन की पत्नी ने निकालकर उसे (मूसा को) अपना पुत्र बना लिया।

  9. 9

    وَقَالَتِ ٱمْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍۢ لِّى وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰٓ أَن يَنفَعَنَآ أَوْ نَتَّخِذَهُۥ وَلَدًۭا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ

    Wa qaalatim ra atu Fir'awna qurratu 'aynil lee wa lak; laa taqtuloohu 'asaaa aiyanfa'anaa aw nattakhizahoo waladanw wa hum laa yash'uroon

    और फ़िरऔन की पत्नी ने कहा : यह मेरी तथा तेरी आँखों की ठंडक है। इसे क़त्ल न करो। आशा है कि वह हमें लाभ पहुँचाए, या हम उसे पुत्र बना लें और वे समझते न थे।

  10. 10

    وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَٰرِغًا ۖ إِن كَادَتْ لَتُبْدِى بِهِۦ لَوْلَآ أَن رَّبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ

    Wa asbaha fu'aadu ummi Moosaa faarighan in kaadat latubdee bihee law laaa arrabatnaa 'alaa qalbihaa litakoona minal mu'mineen

    और मूसा की माता का दिल (मूसा की याद के सिवा हर चीज़ से) खाली हो गया। निश्चय वह क़रीब थी कि उसे प्रकट कर देती, यदि हम उसके दिल को मज़बूत कर उसका ढारस न बँधा देते, ताकि वह ईमानवालों में से हो जाए।

  11. 11

    وَقَالَتْ لِأُخْتِهِۦ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِۦ عَن جُنُبٍۢ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ

    Wa qaalat li ukhtihee qusseehi fabasurat bihee 'an junubinw wahum laa yash'uroon

    तथा (मूसा की माँ ने) उसकी बहन से कहा : इसके पीछे-पीछे जा। तो वह उसे दूर ही दूर से देखती रही और उन्हें (इसका) आभास नहीं होता था।

  12. 12

    ۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ ٱلْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰٓ أَهْلِ بَيْتٍۢ يَكْفُلُونَهُۥ لَكُمْ وَهُمْ لَهُۥ نَٰصِحُونَ

    Wa harramnaa 'alaihil maraadi'a min qablu faqaalat hal adullukum 'alaaa ahli baitiny yakfuloonahoo lakum wa hum lahoo naasihoon

    और हमने उसपर पहले से[5] सभी दूध हराम कर दिए। तो उस (की बहन) ने कहा : क्या मैं तुम्हें एक घर वाले बताऊँ, जो तुम्हारे लिए इसका पालन-पोषण करें और वे इसके शुभचिंतक हों?

    [5] अर्थात उसकी माता के पास आने से पहले।

  13. 13

    فَرَدَدْنَٰهُ إِلَىٰٓ أُمِّهِۦ كَىْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

    Faradadnaahu ilaa ummihee kai taqarra 'ainuhaa wa laa tahzana wa lita'lama anna wa'dal laahi haqqunw wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon

    तो हम उसे उसकी माँ के पास वापस ले आए, ताकि उसकी आँख ठंडी हो और वह शोक न करे, और ताकि वह जान ले कि निश्चय अल्लाह का वादा सच्चा है, लेकिन उनमें से ज्यादातर नहीं जानते।

  14. 14

    وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَٱسْتَوَىٰٓ ءَاتَيْنَٰهُ حُكْمًۭا وَعِلْمًۭا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ

    Wa lammaa balagha ashuddahoo wastawaaa aatai naahu hukmanw wa 'ilmaa; wa kazaalika najzil muhsineen

    और जब वह अपनी जवानी को पहुँचा और पूरा बलवान हो गया, तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया और इसी प्रकार हम भलाई करने वालों को बदला देते हैं।

  15. 15

    وَدَخَلَ ٱلْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍۢ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِۦ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِۦ ۖ فَٱسْتَغَٰثَهُ ٱلَّذِى مِن شِيعَتِهِۦ عَلَى ٱلَّذِى مِنْ عَدُوِّهِۦ فَوَكَزَهُۥ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ ٱلشَّيْطَٰنِ ۖ إِنَّهُۥ عَدُوٌّۭ مُّضِلٌّۭ مُّبِينٌۭ

    Wa dakhalal madeenata 'alaa heene ghaflatim min ahlihaa fawajada feeha raju laini yaqtatilaani haazaa min shee'atihee wa haaza min 'aduwwihee fastaghaasahul lazee min shee'atihee 'alal lazee min 'aduwwihee fawakazahoo Moosaa faqadaa 'alaihi qaala haaza min 'amalish Shaitaani innahoo 'aduwwum mmudillum mubeen

    और वह नगर में उसके लोगों की कुछ असावधानी के समय में प्रवेश किया, तो उसमें दो व्यक्तियों को लड़ते हुए पाया। यह उसके गिरोह में से है और यह उसके शत्रुओं में से।[6] तो जो उसके गिरोह में से था, उसने उसके विरुद्ध उससे मदद माँगी, जो उसके शत्रुओं में से था। तो मूसा ने उसे घूँसा मारा तो उसका काम तमाम कर दिया। (मूसा ने) कहा : यह शैतान के काम से है, निश्चित रूप से वह खुले तौर पर गुमराह करने वाला दुश्मन है।

    [6] अर्थात एक इसराईली तथा दूसरा क़िब्ती फ़िरऔन की जाति से था।

  16. 16

    قَالَ رَبِّ إِنِّى ظَلَمْتُ نَفْسِى فَٱغْفِرْ لِى فَغَفَرَ لَهُۥٓ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ

    Qaala Rabbi innee zalamtu nafsee faghfir lee faghafaralah; innahoo Huwal Ghafoorur Raheem

    उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निश्चय ही मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया है, अतः मुझे क्षमा कर दे। तो उसने उसे क्षमा कर दिया, निःसंदेह वही बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।

  17. 17

    قَالَ رَبِّ بِمَآ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًۭا لِّلْمُجْرِمِينَ

    Qaala Rabbi bimaaa an'amta 'alaiya falan akoona zaheeral lilmujrimeen

    उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! इस कारण कि तूने मुझपर उपकार किया है, मैं कभी भी अपराधियों का सहायक नहीं बनूँगा।

  18. 18

    فَأَصْبَحَ فِى ٱلْمَدِينَةِ خَآئِفًۭا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا ٱلَّذِى ٱسْتَنصَرَهُۥ بِٱلْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُۥ ۚ قَالَ لَهُۥ مُوسَىٰٓ إِنَّكَ لَغَوِىٌّۭ مُّبِينٌۭ

    Fa asbaha fil madeenati khaaa'ifany yataraqqabu fa izal lazis tansarahoo bil amsi yastasrikhuh; qaala lahoo moosaaa innaka laghawiyyum mubeen

    फिर उसने नगर में डरते हुए सुबह की, इंतज़ार करता था (कि अब क्या होगा)। तो अचानक वही व्यक्ति जिसने कल उससे सहायता माँगी थी, उसे गुहार रहा था। मूसा ने उससे कहा : निश्चय ही तू अवश्य खुला गुमराह है।

  19. 19

    فَلَمَّآ أَنْ أَرَادَ أَن يَبْطِشَ بِٱلَّذِى هُوَ عَدُوٌّۭ لَّهُمَا قَالَ يَٰمُوسَىٰٓ أَتُرِيدُ أَن تَقْتُلَنِى كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًۢا بِٱلْأَمْسِ ۖ إِن تُرِيدُ إِلَّآ أَن تَكُونَ جَبَّارًۭا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَن تَكُونَ مِنَ ٱلْمُصْلِحِينَ

    Falammaaa an araada ai yabtisha billazee huwa 'aduwwul lahumaa qaala yaa Moosaaa atureedu an taqtulanee kamaa qatalta nafsam bil amsi in tureedu illaaa an takoona jabbaaram fil ardi wa maa tureedu an takoona minal musliheen

    फिर जब उस (मूसा) ने उसे पकड़ना चाहा, जो उन दोनों का शत्रु था, तो उस (इसराईली) ने कहा : ऐ मूसा! क्या तू मुझे मारना चाहता है, जैसे तूने कल एक व्यक्ति को मार डाला था? तू केवल यही चाहता है कि धरती में शक्तिशाली बन जाए और तू नहीं चाहता कि सुधार करने वालों में से हो।

  20. 20

    وَجَآءَ رَجُلٌۭ مِّنْ أَقْصَا ٱلْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَٰمُوسَىٰٓ إِنَّ ٱلْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَٱخْرُجْ إِنِّى لَكَ مِنَ ٱلنَّٰصِحِينَ

    Wa jaaa'a rajulum min aqsal madeenati yas'aa qaala yaa Moosaaa innal mala a yaa tamiroona bika liyaqtulooka fakhruj innee laka minan naasiheen

    और एक व्यक्ति नगर के सबसे दूर छोर से दौड़ता हुआ आया। उसने कहा : ऐ मूसा! निःसंदेह प्रमुख लोग तेरे विषय में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें। अतः तू (यहाँ से) निकल जा। निश्चय मैं तेरा शुभचिंतक हूँ।

  21. 21

    فَخَرَجَ مِنْهَا خَآئِفًۭا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِى مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ

    Fakharaja minhaa khaaa 'ifany-yataraqqab; qaala Rabbi najjinee minal qawmiz zaalimeen

    तो वह डरता हुआ उस (शहर) से निकल पड़ा, इंतज़ार करता था (कि अब क्या होगा), उसने प्रार्थना की : ऐ मेरे पालनहार! मुझे इन ज़ालिम लोगों से बचा ले।

  22. 22

    وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَآءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّىٓ أَن يَهْدِيَنِى سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ

    Wa lammaa tawajjaha tilqaaa'a Madyana qaala 'asaa Rabbeee ai yahdiyanee Sawaaa'as Sabeel

    और जब उसने मदयन की ओर रुख़ किया, तो कहा : आशा है कि मेरा पालनहार मुझे सीधे मार्ग पर ले जाए।

  23. 23

    وَلَمَّا وَرَدَ مَآءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةًۭ مِّنَ ٱلنَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِن دُونِهِمُ ٱمْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِى حَتَّىٰ يُصْدِرَ ٱلرِّعَآءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌۭ كَبِيرٌۭ

    Wa lammaa warada maaa'a Madyana wajada 'alaihi ummatam minannaasi yasqoona wa wajada min doonihimum ra ataini tazoodaani qaala maa khatubkumaa qaalataa laa nasqee hataa yusdirar ri'aaa'u wa aboonaa shaikhun kabeer

    और जब वह मदयन के पानी पर पहुँचा, तो उसपर लागों का एक समूह पाया, जो (अपने पशुओं को) पानी पिला रहा था। तथा उनके एक तरफ दो महिलाओं को पाया जो (अपने पशुओं को) रोक रही थीं। उसने कहा : तुम्हारा क्या मामला है? उन दोनों ने कहा : हम पानी नहीं पिलाते यहाँ तक कि चरवाहे (अपने जानवरों को) पिलाकर वापस ले जाएँ और हमारे पिता बहुत बूढ़े हैं।

  24. 24

    فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰٓ إِلَى ٱلظِّلِّ فَقَالَ رَبِّ إِنِّى لِمَآ أَنزَلْتَ إِلَىَّ مِنْ خَيْرٍۢ فَقِيرٌۭ

    Fasaqaa lahumaa summa tawallaaa ilaz zilli faqaala Rabbi innee limaaa anzalta ilaiya min khairin faqeer

    तो उसने उनके लिए पानी पिला दिया। फिर पलट कर छाया की ओर आ गया और कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मैं, जो भलाई भी तू मुझपर उतार दे, मैं उसका मोहताज हूँ।

  25. 25

    فَجَآءَتْهُ إِحْدَىٰهُمَا تَمْشِى عَلَى ٱسْتِحْيَآءٍۢ قَالَتْ إِنَّ أَبِى يَدْعُوكَ لِيَجْزِيَكَ أَجْرَ مَا سَقَيْتَ لَنَا ۚ فَلَمَّا جَآءَهُۥ وَقَصَّ عَلَيْهِ ٱلْقَصَصَ قَالَ لَا تَخَفْ ۖ نَجَوْتَ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ

    Fajaaa'at hu ihdaahumaa tamshee 'alas tihyaaa'in qaalat inna abee yad'ooka li yajziyaka ajra maa saqaita lanaa; falammaa jaaa'ahoo wa qassa 'alaihil qasasa qaala laa takhaf najawta minal qawmiz zaalimeen

    फिर दोनों में से एक बहुत लज्जा के साथ चलती हुई उसके पास आई। उसने कहा : निःसंदेह मेरे पिता[7] आपको बुला रहे हैं। ताकि आपको उसका बदला दें जो आपने हमारे लिए (जानवरों को) पानी पिलाया है। तो जब वह (मूसा) उसके पास आया और उसे पूरी स्थिति बताई, तो उसने कहा : डरो मत, तुम उन ज़ालिम लोगों[8] से बच निकले हो।

    [7] व्याख्याकारों ने लिखा है कि वह आदरणीय शुऐब (अलैहिस्सलाम) थे जो मदयन के नबी थे। (देखिए : इब्ने कसीर)

    [8] अर्थात फ़िरऔनियों से।

  26. 26

    قَالَتْ إِحْدَىٰهُمَا يَٰٓأَبَتِ ٱسْتَـْٔجِرْهُ ۖ إِنَّ خَيْرَ مَنِ ٱسْتَـْٔجَرْتَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْأَمِينُ

    Qaalat ihdaahumaa yaaa abatis taajirhu inna khaira manistaajartal qawiyyul ameen

    उन दोनों स्त्रियों में से एक ने कहा : ऐ मेरे पिता! इसे मज़दूरी पर रख लें, क्योंकि सबसे अच्छा व्यक्ति जिसे आप मज़दूरी पर रखें वही है जो शक्तिशाली, अमानतदार हो।

  27. 27

    قَالَ إِنِّىٓ أُرِيدُ أَنْ أُنكِحَكَ إِحْدَى ٱبْنَتَىَّ هَٰتَيْنِ عَلَىٰٓ أَن تَأْجُرَنِى ثَمَٰنِىَ حِجَجٍۢ ۖ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًۭا فَمِنْ عِندِكَ ۖ وَمَآ أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ

    Qaala innee ureedu an unkihaka ihdab nataiya haataini 'alaaa an taajuranee samaaniya hijaj; fa in atmamta 'ashran famin 'indika wa maaa ureedu an ashuqqa 'alaik; satajiduneee in shaaa'al laahu minas saaliheen

    उसने कहा : निःसंदेह मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दो बेटियों में से एक का विवाह तुमसे कर दूँ, इस (शर्त) पर कि तुम आठ वर्ष मेरी मज़दूरी करोगे। फिर यदि तुम दस (वर्ष) पूरे कर दो, तो वह तुम्हारी ओर से है और मैं नहीं चाहता कि तुमपर बोझ डालूँ। यदि अल्लाह ने चाहा, तो तुम मुझे सदाचारियों में से पाओगे।

  28. 28

    قَالَ ذَٰلِكَ بَيْنِى وَبَيْنَكَ ۖ أَيَّمَا ٱلْأَجَلَيْنِ قَضَيْتُ فَلَا عُدْوَٰنَ عَلَىَّ ۖ وَٱللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌۭ

    Qaala zaalika bainee wa bainaka aiyamal ajalaini qadaitu falaa 'udwaana 'alaiya wallaahu 'alaa ma naqoolu Wakeel

    (मूसा ने) कहा : यह मेरे और आपके बीच (निश्चित) है। इन दोनों में से जो अवधि मैं पूरी कर दूँ, तो मुझपर कोई अति न होगी। और हम जो कुछ कह रहे हैं उसपर अल्लाह गवाह है।

  29. 29

    ۞ فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى ٱلْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِۦٓ ءَانَسَ مِن جَانِبِ ٱلطُّورِ نَارًۭا قَالَ لِأَهْلِهِ ٱمْكُثُوٓا۟ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًۭا لَّعَلِّىٓ ءَاتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍۢ مِّنَ ٱلنَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ

    Falammmaa qadaa Moosal ajala wa saara bi ahliheee aanasa min jaanibit Toori naaran qaala li ahlihim kusooo inneee aanastu naaral la 'alleee aateekum minhaa bikhabarin aw jazwatim minan naari la 'allakum tastaloon

    फिर जब मूसा ने वह अवधि पूरी कर दी और अपने परिवार को लेकर चला, तो उसने तूर (पर्वत) की ओर से एक आग देखी। उसने अपने परिवार से कहा : ठहरो, मैंने एक आग देखी है, संभव है कि मैं तुम्हारे लिए उससे कोई समाचार ले आऊँ, या आग का कोई अंगारा, ताकि तुम ताप लो।

  30. 30

    فَلَمَّآ أَتَىٰهَا نُودِىَ مِن شَٰطِئِ ٱلْوَادِ ٱلْأَيْمَنِ فِى ٱلْبُقْعَةِ ٱلْمُبَٰرَكَةِ مِنَ ٱلشَّجَرَةِ أَن يَٰمُوسَىٰٓ إِنِّىٓ أَنَا ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَٰلَمِينَ

    Falammaaa ataahaa noodiya min shaati'il waadil aimani fil buq'atil muubaarakati minash shajarati ai yaa Moosaaa inneee Anal laahu Rabbul 'aalameen

    फिर जब वह उसके पास आया, तो उस बरकत वाली जगह में घाटी के दाहिनी ओर से एक वृक्ष से आवाज़ दी गई : ऐ मूसा! निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ, जो सारे संसारों का पालनहार है।

  31. 31

    وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَءَاهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَآنٌّۭ وَلَّىٰ مُدْبِرًۭا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَٰمُوسَىٰٓ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ ٱلْءَامِنِينَ

    Wa an alqi 'asaaka falam maa ra aahaa tahtazzu ka annnahaa jaaannunw wallaa mudbiranw wa lam yu'aqqib; yaa Moosaa aqbil wa laa takhaf innaka minal aamineen

    और यह कि अपनी लाठी फेंक दो। फिर जब उसने उसे देखा कि रेंग रही है, मानो वह एक साँप है, तो पीठ फेरकर चल दिया और पीछे नहीं मुड़ा। ऐ मूसा! आगे बढ़ो और डरो मत, निश्चित रूप से तुम सुरक्षित रहने वालों में से हो।

  32. 32

    ٱسْلُكْ يَدَكَ فِى جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍۢ وَٱضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ ٱلرَّهْبِ ۖ فَذَٰنِكَ بُرْهَٰنَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَٰسِقِينَ

    Usluk yadaka fee jaibika takhruj baidaaa'a min ghairi sooo'inw wadmum ilaika janaahaka minar rahbi fazaanika burhaanaani mir Rabbika ilaa Fiw'awna wa mala'ih; innahum kaanoo qawman faasiqeen

    अपना हाथ अपने गरीबान में डाल। वह बिना किसी दोष के सफेद (चमकदार) निकलेगा। और भय से (बचने के लिए) अपनी भुजा को अपनी ओर चिमटा ले। तो ये दोनों तेरे पालनहार की ओर से फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों के लिए दो प्रमाण हैं। निःसंदेह वे हमेशा से अवज्ञाकारी लोग हैं।

  33. 33

    قَالَ رَبِّ إِنِّى قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًۭا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ

    Qaala Rabbi innee qataltu minhum nafsan fa akhaafu ai yaqtuloon

    उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मैंने उनमें से एक व्यक्ति को क़त्ल किया है। इसलिए मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार देंगे।

  34. 34

    وَأَخِى هَٰرُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّى لِسَانًۭا فَأَرْسِلْهُ مَعِىَ رِدْءًۭا يُصَدِّقُنِىٓ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ

    Wa akhee Haaroonu huwa afsahu minnee lisaanan fa arsilhu ma'iya rid ai yusaddiquneee innee akhaafu ai yukazziboon

    और मेरा भाई हारून, वह ज़बान में मुझसे अधिक वाक्पटु है। अतः उसे मेरे साथ सहायक बनाकर भेज कि वह मेरी तसदीक़ करे। निःसंदेह मैं डरता हूँ कि वे मुझे झुठला देंगे।

  35. 35

    قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَٰنًۭا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِـَٔايَٰتِنَآ أَنتُمَا وَمَنِ ٱتَّبَعَكُمَا ٱلْغَٰلِبُونَ

    Qaala sanashuddu 'adudaka bi akheeka wa naj'alu lakumaa sultaanan falaa yasiloona ilaikumaa; bi Aayaatinaa antumaa wa manit taba'akumal ghaaliboon

    फरमाया : हम तेरे भाई के साथ तेरा हाथ अवश्य मज़बूत करेंगे और तुम दोनों को प्रभुता प्रदान करेंगे। अतः वे तुम दोनों तक नहीं पहुँच सकेंगे। हमारी निशानियों के कारण तुम दोनों और जिन्होंने तुम्हारा अनुसरण किया, प्रभावी रहने वाले हो।

  36. 36

    فَلَمَّا جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِـَٔايَٰتِنَا بَيِّنَٰتٍۢ قَالُوا۟ مَا هَٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّفْتَرًۭى وَمَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِىٓ ءَابَآئِنَا ٱلْأَوَّلِينَ

    Falammaa jaaa'ahum Moosaa bi Aayaatinaa baiyinaatin qaaloo maa haazaaa illaa sihrum muftaranw wa maa sami'naa bihaazaa feee aabaaa'inal awwaleen

    फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने कहा : यह तो बस एक मनगढ़ंत जादू है और हमने इसे अपने पहले बाप-दादों में नहीं सुना।

  37. 37

    وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّىٓ أَعْلَمُ بِمَن جَآءَ بِٱلْهُدَىٰ مِنْ عِندِهِۦ وَمَن تَكُونُ لَهُۥ عَٰقِبَةُ ٱلدَّارِ ۖ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّٰلِمُونَ

    Wa qaala Moosaa Rabbeee a'alamu biman jaaa'a bilhudaa min 'indihee wa man takoonu lahoo 'aaqibatud daari innahoo laa yuflihuz zaalimoon

    तथा मूसा ने कहा : मेरा पालनहार उसे अधिक जानने वाला है जो उसके पास से मार्गदर्शन लेकर आया और उसको भी जिसके लिए (आख़िरत के) घर का परिणाम अच्छा होगा। निःसंदेह सत्य यह है कि अत्याचारी सफल नहीं होते।

  38. 38

    وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرِى فَأَوْقِدْ لِى يَٰهَٰمَٰنُ عَلَى ٱلطِّينِ فَٱجْعَل لِّى صَرْحًۭا لَّعَلِّىٓ أَطَّلِعُ إِلَىٰٓ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّى لَأَظُنُّهُۥ مِنَ ٱلْكَٰذِبِينَ

    Wa qaala Fir'awnu yaaa aiyuhal mala-u maa 'alimtu lakum min ilaahin ghairee fa awqid lee yaa Haamaanu 'alatteeni faj'al lee sarhal la'alleee attali'u ilaaa ilaahi Moosaa wa innee la azunnuhoo minal kaazibeen

    तथा फ़िरऔन ने कहा : ऐ प्रमुखो! मैंने अपने सिवा तुम्हारे लिए कोई पूज्य नहीं जाना। तो ऐ हामान! मेरे लिए मिट्टी पर आग जला, फिर मेरे लिए एक ऊँचा भवन बना, ताकि मैं मूसा के पूज्य को झाँककर देखूँ। और निःसंदेह मैं निश्चय उसे झूठों में से समझता हूँ।

  39. 39

    وَٱسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُۥ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ

    Wastakbara huwa wa junooduhoo fil ardi bighairil haqqi wa zannooo annahum ilainaa laa yurja'oon

    तथा वह और उसकी सेना बिना किसी अधिकार के देश में बड़े बन बैठे और उन्होंने सोचा कि निश्चित रूप से वे हमारे पास वापस नहीं लाए जाएँगे।

  40. 40

    فَأَخَذْنَٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذْنَٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلظَّٰلِمِينَ

    Fa akhaznaahu wa junoo dahoo fanabaznaahum fil yammi fanzur kaifa kaana 'aaqibatuz zaalimeen

    तो हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ लिया, फिर उन्हें समुद्र में फेंक दिया। तो देखो कि अत्याचारियों का अंत (परिणाम) कैसा था।

  41. 41

    وَجَعَلْنَٰهُمْ أَئِمَّةًۭ يَدْعُونَ إِلَى ٱلنَّارِ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ لَا يُنصَرُونَ

    Wa ja'alnaahum a'immatany yad'oona ilan Naari wa Yawmal Qiyaamati laa yunsaroon

    और हमने उन्हें ऐसे अगवा बनाया, जो आग की ओर बुलाते थे और क़ियामत के दिन उनकी मदद नहीं की जाएगी।

  42. 42

    وَأَتْبَعْنَٰهُمْ فِى هَٰذِهِ ٱلدُّنْيَا لَعْنَةًۭ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ هُم مِّنَ ٱلْمَقْبُوحِينَ

    Wa atba'naahum fee haazihid dunyaa la'natanw wa Yawmal Qiyaamati hum minal maqbooheen

    और हमने इस संसार में उनके पीछे धिक्कार लगा दी और क़ियामत के दिन वे ठुकराए गए लोगों में से होंगे।

  43. 43

    وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَٰبَ مِنۢ بَعْدِ مَآ أَهْلَكْنَا ٱلْقُرُونَ ٱلْأُولَىٰ بَصَآئِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

    Wa laqad aatainaa Moosal Kitaaba mim ba'di maaa ahlaknal quroonal oolaa basaaa'ira linnaasi wa hudanw wa rahmatal la'allahum yata zakkkaroon

    और निःसंदेह हमने मूसा को पुस्तक प्रदान की, इसके पश्चात् कि हमने पहली नस्लों को विनष्ट कर दिया, जो लोगों के लिए अंतर्दृष्टिपूर्ण तर्क तथा मार्गदर्शन और दया थी, ताकि वे नसीहत ग्रहण करें।

  44. 44

    وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ ٱلْغَرْبِىِّ إِذْ قَضَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَى ٱلْأَمْرَ وَمَا كُنتَ مِنَ ٱلشَّٰهِدِينَ

    Wa maa kunta bijaanibil gharbiyyi iz qadainaaa ilaa Moosal amra wa maa kunta minash shaahideen

    और उस समय आप पश्चिमी किनारे[9] पर नहीं थे, जब हमने मूसा की ओर आदेश पहुँचाया और न ही आप उपस्थित[10] लोगों में से थे।

    [9] पश्चिमी किनारे से अभिप्राय तूर पर्वत का पश्चिमी भाग है जहाँ मूसा (अलैहिस्सलाम) को तौरात प्रदान की गई।

    [10] इनसे अभिप्राय वे बनी इसराईल हैं जिनसे धर्मविधान प्रदान करते समय उसका पालन करने का वचन लिया गया था।

  45. 45

    وَلَٰكِنَّآ أَنشَأْنَا قُرُونًۭا فَتَطَاوَلَ عَلَيْهِمُ ٱلْعُمُرُ ۚ وَمَا كُنتَ ثَاوِيًۭا فِىٓ أَهْلِ مَدْيَنَ تَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَٰتِنَا وَلَٰكِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ

    Wa laakinnaa anshaanaa quroonan fatataawala 'alaihimul 'umur; wa maa kunta saawiyan feee ahli Madyana tatloo 'alaihim Aayaatinaa wa laakinnaa kunnaa mursileen

    परंतु हमने (मूसा के बाद) बहुत-सी नस्लें पैदा कीं, फिर उनपर लंबा समय बीत गया तथा न आप मदयन वालों के बीच रहने वाले थे कि उन्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाते हों, परंतु हम ही (रसूल) भेजने वाले हैं।[11]

    [11] भावार्थ यह है कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हज़ारों वर्ष पहले के जो समाचार इस समय सुना रहे हैं जैसे आँखों से देखें हों, वह अल्लाह की ओर से वह़्य के कारण ही सुना रहे हैं, जो आपके सच्चे नबी होने का प्रमाण है।

  46. 46

    وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ ٱلطُّورِ إِذْ نَادَيْنَا وَلَٰكِن رَّحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًۭا مَّآ أَتَىٰهُم مِّن نَّذِيرٍۢ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

    Wa maa kunta bijaanibit Toori iz naadainaa wa laakir rahmatam mir Rabbika litunzira qawmam maaa ataahum min nazeerim min qablika la'allahum yatazakkaroon

    तथा न (ही) आप तूर (पर्वत) के किनारे पर थे, जब हमने (मूसा को) पुकारा। परंतु आपके पालनहार की ओर से दया है, ताकि आप उन लोगों को डराएँ, जिनके पास आपसे पहले कोई डराने वाला नहीं आया, ताकि वे नसीहत ग्रहण करें।

  47. 47

    وَلَوْلَآ أَن تُصِيبَهُم مُّصِيبَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا۟ رَبَّنَا لَوْلَآ أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًۭا فَنَتَّبِعَ ءَايَٰتِكَ وَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ

    Wa law laaa an tuseebahum museebatum bimaa qaddamat aideehim fa yaqooloo Rabbanaa law laaa arsalta ilainaa Rasoolan fanattabi'a Aayaatika wa nakoona minal mu'mineen

    तथा यदि ऐसा न होता कि उन्हें उसके कारण कोई विपत्ति पहुँचेगी जो उनके हाथों ने आगे भेजा, तो वे कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! तूने हमारी ओर कोई रसूल क्यों न भेजा कि हम तेरी आयतों का अनुसरण करते और ईमान वालों में से हो जाते।[12]

    [12] अर्थात आपको उनकी ओर रसूल बना कर इसलिए भेजा है ताकि प्रलय के दिन उनको यह कहने का अवसर न मिले कि हमारे पास कोई रसूल नहीं आया ताकि हम ईमान लाते।

  48. 48

    فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا۟ لَوْلَآ أُوتِىَ مِثْلَ مَآ أُوتِىَ مُوسَىٰٓ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا۟ بِمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۖ قَالُوا۟ سِحْرَانِ تَظَٰهَرَا وَقَالُوٓا۟ إِنَّا بِكُلٍّۢ كَٰفِرُونَ

    Falammaa jaaa'ahumul haqqu min 'indinaa qaaloo law laa ootiya misla maaa ootiyaa Moosaa; awalam yakfuroo bimaaa ootiya Moosaa min qablu qaaloo sihraani tazaaharaa wa qaalooo innaa bikullin kaafiroon

    फिर जब उनके पास हमारी ओर से सत्य आ गया, तो उन्होंने कहा : उसे उस जैसी चीज़ें क्यों न दी गईं, जो मूसा को दी गईं? तो क्या उन्होंने इससे पहले उन चीज़ों का इनकार नहीं किया जो मूसा को दी गई थीं? उन्होंने कहा : ये दोनों[13] (सर्वथा) जादू हैं, जो एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, और कहने लगे : हम तो इन सब का इनकार करने वाले हैं।

    [13] अर्थात तौरात और क़ुरआन।

  49. 49

    قُلْ فَأْتُوا۟ بِكِتَٰبٍۢ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَآ أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ

    Qul faatoo bi Kitaabim min 'indil laahi huwa ahdaa minhu maaa attabi'hu in kuntum saadiqeen

    (ऐ नबी!) आप कह दें : फिर तुम अल्लाह की ओर से कोई पुस्तक ले आओ, जो इन दोनों[14] से अधिक मार्गदर्शन वाली हो, ताकि मैं उसका अनुसरण करूँ, यदि तुम सच्चे हो।

    [14] अर्थात क़ुरआन और तौरात से।

  50. 50

    فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَكَ فَٱعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَآءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ ٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ بِغَيْرِ هُدًۭى مِّنَ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّٰلِمِينَ

    Fa il lam yastajeeboo laka fa'lam annamaa yattabi'oona ahwaaa'ahum; w aman adallu mimmanit taba'a hawaahu bighari hudam minal laah; innal laaha laa yahdil qawmaz zaalimeen

    फिर यदि वे आपकी माँग पूरी न करें, तो आप जान लें कि वे केवल अपनी इच्छाओं का पालन कर रहे हैं, और उससे बढ़कर पथभ्रष्ट कौन है, जो अल्लाह की ओर से किसी मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छा का पालन करे? निःसंदेह अल्लाह अत्याचार करने वाले लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।

  51. 51

    ۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ ٱلْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ

    Wa laqad wassalnaa lahumul qawla la'allahum yatazakkaroon

    और निःसंदेह हमने उनकी ओर निरंतर संदेश पहुँचाया, ताकि वे नसीहत ग्रहण करें।

  52. 52

    ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَٰهُمُ ٱلْكِتَٰبَ مِن قَبْلِهِۦ هُم بِهِۦ يُؤْمِنُونَ

    Allazeena aatainaahu mul Kitaaba min qablihee hum bihee yu'minoon

    जिन लोगों को हमने इससे पहले किताब[15] दी थी, वे[16] इसपर ईमान लाते हैं।

    [15] अर्थात तौरात तथा इंजील।

    [16] अर्थात उनमें से जिन्होंने अपनी मूल पुस्तक में परिवर्तन नहीं किया है।

  53. 53

    وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِهِۦٓ إِنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّنَآ إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِۦ مُسْلِمِينَ

    Wa izaa yutlaa 'alaihim qaaloo aamannaa biheee innahul haqqu mir rabbinaaa innaa kunnaa min qablihee muslimeen

    तथा जब यह उनके सामने पढ़ा जाता है, तो वे कहते हैं : हम इसपर ईमान लाए। निश्चय यही हमारे रब की ओर से सत्य है। निःसंदेह हम इससे पहले मुसलमान (आज्ञाकारी) थे।

  54. 54

    أُو۟لَٰٓئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيَدْرَءُونَ بِٱلْحَسَنَةِ ٱلسَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَٰهُمْ يُنفِقُونَ

    Ulaaa'ika yu'tawna ajrahum marratayni bimaa sabaroo wa yadra'oona bil hasanatis saiyi'ata wa mimmmaa razaq naahum yunfiqoon

    ये वे लोग हैं जिन्हें उनका प्रतिफल दोहरा[17] दिया जाएगा, इसके बदले कि उन्होंने सब्र किया और वे भलाई के साथ बुराई को दूर करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से खर्च करते हैं।

    [17] अपनी पुस्तक तथा क़ुरआन दोनों पर ईमान लाने के कारण। (देखिए : सह़ीह़ बुख़ारी : 97, मुस्लिम : 154)

  55. 55

    وَإِذَا سَمِعُوا۟ ٱللَّغْوَ أَعْرَضُوا۟ عَنْهُ وَقَالُوا۟ لَنَآ أَعْمَٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَٰلُكُمْ سَلَٰمٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِى ٱلْجَٰهِلِينَ

    Wa izaa sami'ul laghwa a'radoo 'anhu wa qaaloo lanaaa a'maalunaa wa lakum a'maalukum salaamun 'alaikum laa nabtaghil jaahileen

    और जब वे व्यर्थ बात सुनते हैं, तो उससे किनारा करते हैं, तथा कहते हैं : हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। सलाम है तुमपर, हम जाहिलों को नहीं चाहते।

  56. 56

    إِنَّكَ لَا تَهْدِى مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ

    Innaka laa tahdee man ahbata wa laakinna laaha yahdee mai yashaaa'; wa Huwaa'lamu bilmuhtadeen

    निःसंदेह आप उसे हिदायत नहीं दे सकते जिसे आप चाहें,[18] परंतु अल्लाह हिदायत देता है जिसे चाहता है और वह हिदायत पाने वालों को अधिक जानने वाला है।

    [18] ह़दीस में वर्णित है कि जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के (काफ़िर) चाचा अबू तालिब के निधन का समय हुआ, तो आप उनके पास गए। उस समय उनके पास अबू जह्ल तथा अब्दुल्लाह बिन अबी उमय्या उपस्थित थे। आपने कहा : चाचा! ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' कह दें, ताकि मैं क़ियामत के दिन अल्लाह से आपकी क्षमा के लिए सिफ़ारिश कर सकूँ। परंतु दोनों के कहने पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया और उनका अंत कुफ़्र पर हुआ। इसी विषय में यह आयत उतरी। (सह़ीह़ बुख़ारी, ह़दीस संख्या : 4772)

  57. 57

    وَقَالُوٓا۟ إِن نَّتَّبِعِ ٱلْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَآ ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا ءَامِنًۭا يُجْبَىٰٓ إِلَيْهِ ثَمَرَٰتُ كُلِّ شَىْءٍۢ رِّزْقًۭا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

    Wa qaalooo in nattabi'il hudaa ma'aka nutakhattaf min ardinaa; awalam numakkkil lahum haraman aaminany yujbaaa ilaihi samaraatu kulli shai'ir rizqam mil ladunnaa wa laakinna aksarahum laa ya'lamoon

    तथा उन्होंने कहा : यदि हम आपके साथ इस मार्गदर्शन का अनुसरण करें, तो हम अपनी धरती से उचक[19] लिए जाएँगे। और क्या हमने उन्हें एक शांतिपूर्ण (सुरक्षित) हरम[20] में जगह नहीं दी? जिसकी ओर, हमारे पास से रोज़ी के तौर पर, सब वस्तुओं के फल खींचकर लाए जाते हैं। परंतु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।

    [19] अर्थात हमारे विरोधी हमपर आक्रमण कर देंगे।

    [20] अर्थात मक्का नगर को।

  58. 58

    وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍۭ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَٰكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّنۢ بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًۭا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ ٱلْوَٰرِثِينَ

    Wa kam ahlaknaa min qaryatim batirat ma'eeshatahaa fatilka masaainuhum lam tuskam mim ba'dihim illaa qaleelaa; wa kunnaa Nahnul waariseen

    और हमने कितनी ही बस्तियों को विनष्ट कर दिया, जो अपनी गुज़र-बसर के संसाधनों पर इतराने लगी थीं। तो ये हैं उनके घर, जो उनके बाद आबाद नहीं किए गए, परंतु बहुत कम। और हम ही हमेशा उत्तराधिकारी बनने वाले हैं।

  59. 59

    وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِىٓ أُمِّهَا رَسُولًۭا يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَٰتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِى ٱلْقُرَىٰٓ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَٰلِمُونَ

    Wa maa kaana Rabbuka muhlikal quraa hattaa yab'asa feee ummihaa Rasoolany yatloo 'alaihim aayaatina; wa maa kunnaa muhlikil quraaa illaa wa ahluhaa zaalimoon

    और आपका पालनहार कभी बस्तियों को विनष्ट करने वाला नहीं, यहाँ तक कि उनके केंद्र में एक रसूल भेजे जो उनके सामने हमारी आयतें पढ़े। तथा हम कभी बस्तियों को विनष्ट करने वाले नहीं, परंतु जबकि उसके निवासी अत्याचारी हों।

  60. 60

    وَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَىْءٍۢ فَمَتَٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ

    Wa maaa ooteetum min shai'in famataa'ul hayaatid dunyaa wa zeenatuhaa; wa maa 'indal laahi khairunw wa abqaa; afalaa ta'qiloon

    तथा जो कुछ भी तुम दिए गए हो, वह सांसारिक जीवन का सामान और उसकी शोभा है। और जो अल्लाह के पास है, वह उससे उत्तम और अधिक बाक़ी रहने वाला है, तो क्या तुम नहीं समझते?

  61. 61

    أَفَمَن وَعَدْنَٰهُ وَعْدًا حَسَنًۭا فَهُوَ لَٰقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَٰهُ مَتَٰعَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ مِنَ ٱلْمُحْضَرِينَ

    Afamanw wa'adnaahu wa'dan hasanan fahuwa laaqeehi kamam matta'naahu mataa'al hayaatid dunyaa summa huwa Yawmal Qiyaamati minal muhdareen

    तो क्या वह व्यक्ति जिसे हमने एक अच्छा वादा दिया, फिर वह उसे प्राप्त करने वाला है, उस व्यक्ति की तरह है, जिसे हमने सांसारिक जीवन का सामान दिया, फिर वह क़ियामत के दिन उपस्थित किए जाने वालों में से होगा?[21]

    [21] अर्थात दंड और यातना का अधिकारी होगा।

  62. 62

    وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ

    Wa Yawma yunaadeehim fa-yaqoolu aina shurakaaa 'iyal lazeena kuntum taz'umoon

    और जिस दिन वह[22] उन्हें पुकारेगा, तो कहेगा : कहाँ हैं मेरे वे साझी, जो तुम दावा करते थे?

    [22] अर्थात अल्लाह प्रलय के दिन पुकारेगा।

  63. 63

    قَالَ ٱلَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْقَوْلُ رَبَّنَا هَٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ أَغْوَيْنَآ أَغْوَيْنَٰهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَآ إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوٓا۟ إِيَّانَا يَعْبُدُونَ

    Qaalal lazeena haqqa 'alaihimul qawlu Rabbanaa haaa'ulaaa'il lazeena aghwainaa aghwainaahu kamaa ghawainaa tabarraanaaa ilaika maa kaanoo iyyaanaa ya'budoon

    वे लोग कहेंगे जिनपर बात[23] सिद्ध हो चुकी : ऐ हमारे पालनहार! ये वे लोग हैं जिन्हें हमने गुमराह किया, हमने उन्हें उसी तरह गुमराह किया जैसे हम गुमराह हुए। हम तेरे सामने (इनसे) अलग होने की घोषणा करते हैं। ये हमारी[24] तो पूजा नहीं करते थे।

    [23] अर्थात दंड और यातना के अधिकारी होने की।

    [24] ये हमारे नहीं बल्कि अपने मन के पुजारी थे।

  64. 64

    وَقِيلَ ٱدْعُوا۟ شُرَكَآءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَهُمْ وَرَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَهْتَدُونَ

    Wa qeelad 'oo shurakaaa'akum fada'awhum falam yastajeeboo lahum wa ra awul 'azaab; law annahum kaanoo yahtadoon

    तथा कहा जाएगा : अपने साझियों को पुकारो। तो वे उन्हें पुकारेंगे, परंतु वे उन्हें उत्तर न देंगे। तथा वे यातना को देखेंगे, (तो कामना करेंगे) काश कि उन्होंने मार्गदर्शन स्वीकार किया होता।

  65. 65

    وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ مَاذَآ أَجَبْتُمُ ٱلْمُرْسَلِينَ

    Wa Yawma yunaadeehim fa yaqoolu maazaaa ajabtumul mursaleen

    और जिस दिन वह (अल्लाह) उन्हें पुकारेगा, फिर कहेगा : तुमने रसूलों को क्या उत्तर दिया?

  66. 66

    فَعَمِيَتْ عَلَيْهِمُ ٱلْأَنۢبَآءُ يَوْمَئِذٍۢ فَهُمْ لَا يَتَسَآءَلُونَ

    Fa'amiyat 'alaihimul ambaaa'u Yawma'izin fahum laa yatasaaa'aloon

    तो उस दिन उनसे सब बातें लुप्त हो जाएँगी, इसलिए वे एक-दूसरे से (भी) नहीं पूछेंगे।

  67. 67

    فَأَمَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَٰلِحًۭا فَعَسَىٰٓ أَن يَكُونَ مِنَ ٱلْمُفْلِحِينَ

    Fa ammaa man taaba wa aamana wa 'amila saalihan fa'asaaa ai yakoona minal mufliheen

    फिर जिसने क्षमा माँग ली तथा ईमान ले आया और अच्छा कर्म किया, तो आशा है कि वह सफल होने वालों में से होगा।

  68. 68

    وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ وَيَخْتَارُ ۗ مَا كَانَ لَهُمُ ٱلْخِيَرَةُ ۚ سُبْحَٰنَ ٱللَّهِ وَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ

    Wa Rabbuka yakhuluqu maa yashaaa'u wa yakhtaar; maa kaana lahumul khiyarah; Subhannal laahi wa Ta'aalaa 'ammmaa yushrikoon

    और आपका पालनहार जो चाहता है पैदा करता है और चुन लेता है, उनके लिए कभी भी अधिकार नहीं। अल्लाह पवित्र है तथा बहुत उच्च है, उससे जो वे साझी बनाते हैं।

  69. 69

    وَرَبُّكَ يَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ

    Wa Rabbuka ya'lamu maa tukinnu sudooruhum wa maa yu'linoon

    और आपका पालनहार जानता है, जो कुछ उनके सीने छिपाते हैं और जो कुछ वे ज़ाहिर करते हैं।

  70. 70

    وَهُوَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ ٱلْحَمْدُ فِى ٱلْأُولَىٰ وَٱلْءَاخِرَةِ ۖ وَلَهُ ٱلْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ

    Wa Huwal laahu laaa ilaaha illaa Huwa lahul hamdu fil oolaa wal Aakhirati wa lahul hukmu wa ilaihi turja'oon

    तथा वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। उसी के लिए दुनिया और आख़िरत में सब प्रशंसा है। तथा उसी का हुक्म (चलता) है और उसी की ओर तुम लौटाए[25] जाओगो।

    [25] अर्थात ह़िसाब और प्रतिफल के लिए।

  71. 71

    قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمُ ٱلَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَٰمَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِضِيَآءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ

    Qul ara'aitum in ja'alal laahu 'alaikumul laila sarmadan ilaa Yawmil Qiyaamati man ilaahun ghairul laahi yaa teekum bidiyaaa'in afalaa tasma'oon

    (ऐ नबी!) आप कह दें : क्या तुमने देखा कि यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक तुमपर हमेशा के लिए रात कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हारे लिए प्रकाश ला सके? तो क्या तुम नहीं सुनते?

  72. 72

    قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمُ ٱلنَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَٰمَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِلَيْلٍۢ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ

    Qul ara'aitum in ja'alal laahu 'alaikumun nahaara sarmadan ilaa Yawmil Qiyaamati man ilaahun ghairul laahi yaateekum bilailin taskunoona feehi afalaa tubsiroon

    आप कह दें : क्या तुमने देखा कि यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक तुमपर हमेशा के लिए दिन कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हारे लिए रात ले आए, जिसमें तुम विश्राम कर सको? तो क्या तुम नहीं देखते?

  73. 73

    وَمِن رَّحْمَتِهِۦ جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

    Wa mir rahmatihee ja'ala lakumul laila wannahaara litaskunoo feehi wa litabtaghoo min fadlihee wa la'allakum tashkuroon

    तथा उसने अपनी दया ही से तुम्हारे लिए रात और दिन बनाए हैं। ताकि तुम उस (रात) में आराम करो और ताकि उसका कुछ अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम उसके कृतज्ञ बनो।

  74. 74

    وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ

    Wa Yawma yunaadeehim fa yaqoolu aina shurakaaa'iyal lazeena kuntum tazz'umoon

    और जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, तो कहेगा : कहाँ हैं मेरे वे साझी, जो तुम दावा करते थे?

  75. 75

    وَنَزَعْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍۢ شَهِيدًۭا فَقُلْنَا هَاتُوا۟ بُرْهَٰنَكُمْ فَعَلِمُوٓا۟ أَنَّ ٱلْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ

    Wa naza'naa min kulli ummatin shaheedan faqulnaa haatoo burhaanakum fa'alimooo annal haqqa lillaahi wa dalla 'anhum maa kaanoo yaftaroon

    और हम प्रत्येक समुदाय से एक गवाह निकालेंगे, फिर हम कहेंगे : लाओ अपने प्रमाण। तो वे जान लेंगे कि निःसंदेह सत्य बात अल्लाह की है, और जो कुछ वे गढ़ते थे, वह उनसे गुम हो जाएगा।

  76. 76

    ۞ إِنَّ قَٰرُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَءَاتَيْنَٰهُ مِنَ ٱلْكُنُوزِ مَآ إِنَّ مَفَاتِحَهُۥ لَتَنُوٓأُ بِٱلْعُصْبَةِ أُو۟لِى ٱلْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُۥ قَوْمُهُۥ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْفَرِحِينَ

    Inna Qaaroona kaana min qawmi Moosaa fabaghaaa 'alaihim wa aatainaahu minal kunoozi maaa inna mafaati hahoo latanooo'u bil'usbati ulil quwwati iz qaala lahoo qawmuhoo laa tafrah innal laahaa laa yuhibbul fariheen

    निःसंदेह क़ारून[26] मूसा की जाति में से था। फिर उसने उनपर सरकशी की और हमने उसे इतने ख़ज़ाने दिए कि निःसंदेह उनकी कुंजियाँ एक बलशाली गिरोह पर भारी पड़ती थीं। जब उसकी जाति ने उससे कहा : मत इतरा। निःसंदेह अल्लाह इतराने वालों से प्रेम नहीं करता।

    [26] यहाँ से धन के गर्व तथा उसके दुष्परिणाम का एक उदाहरण दिया जा रहा है कि क़ारून, मूसा (अलैहिस्सलाम) के युग का एक धनी व्यक्ति था।

  77. 77

    وَٱبْتَغِ فِيمَآ ءَاتَىٰكَ ٱللَّهُ ٱلدَّارَ ٱلْءَاخِرَةَ ۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ ٱلدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِن كَمَآ أَحْسَنَ ٱللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ ٱلْفَسَادَ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُفْسِدِينَ

    Wabtaghi feemaaa aataakal laahud Daaral Aakhirata wa laa tansa naseebaka minad dunyaa wa ahsin kamaaa ahsanal laahu ilaika wa laa tabghil fasaada fil ardi innal laaha laa yuhibbul mufsideen

    तथा जो कुछ अल्लाह ने तुझे दिया है, उसमें आख़िरत का घर तलाश कर, और दुनिया से अपना हिस्सा मत भूल और उपकार कर, जैसे अल्लाह ने तुझपर उपकार किया है, तथा धरती में बिगाड़ की तलाश मत कर। निःसंदेह अल्लाह बिगाड़ पैदा करने वालों से प्रेम नहीं करता।

  78. 78

    قَالَ إِنَّمَآ أُوتِيتُهُۥ عَلَىٰ عِلْمٍ عِندِىٓ ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِن قَبْلِهِۦ مِنَ ٱلْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةًۭ وَأَكْثَرُ جَمْعًۭا ۚ وَلَا يُسْـَٔلُ عَن ذُنُوبِهِمُ ٱلْمُجْرِمُونَ

    Qaala innamaaa ootee tuhoo 'alaa 'ilmin 'indeee; awalam ya'lam annal laaha qad ahlaka min qablihee minal qurooni man huwa ashaddu minhu quwwatanw wa aksaru jam'aa; wa laa yus'alu 'an zunoobihimul mujrimoon

    उसने कहा : ''मुझे तो यह उस ज्ञान के कारण दिया गया है जो मेरे पास है।'' और क्या उसने नहीं जाना कि निःसंदेह अल्लाह उससे पहले कई समुदायों को विनष्ट कर चुका है, जो शक्ति में उससे बढ़कर और धन-दौलत में उससे अधिक थे। और अपराधियों से उनके पापों के बारे में पूछा नहीं जाएगा।

  79. 79

    فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِۦ فِى زِينَتِهِۦ ۖ قَالَ ٱلَّذِينَ يُرِيدُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا يَٰلَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَآ أُوتِىَ قَٰرُونُ إِنَّهُۥ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍۢ

    Fakharaja 'alaa qawmihee fee zeenatih; qaalal lazeena yureedoonal hayaatad dunyaa yaalaita lanaa misla maaa ootiya Qaaroonu innahoo lazoo hazzin 'azeem

    फिर वह अपनी जाति के सामने अपनी शोभा में निकला। उन लोगों ने कहा जो दुनिया का जीवन चाहते थे : ऐ काश! हमारे लिए ऐसा ही होता जो क़ारून को दिया गया है, निःसंदेह वह निश्चय बड़ा नसीब वाला है।

  80. 80

    وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ لِّمَنْ ءَامَنَ وَعَمِلَ صَٰلِحًۭا وَلَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ٱلصَّٰبِرُونَ

    Wa qaalal lazeena ootul 'ilma wailakum sawaabul laahi khairul liman aamana wa 'amila saalihaa; wa laa yulaq qaahaaa illas saabiroon

    तथा उन लोगों ने कहा, जिनको ज्ञान दिया गया था : हाय तुम पर! अल्लाह का बदला उस व्यक्ति के लिए कहीं उत्तम है, जो ईमान लाया तथा उसने अच्छा कर्म किया। और इसका सामर्थ्य केवल उन्हीं को दिया जाता है जो सब्र करने वाले हैं।

  81. 81

    فَخَسَفْنَا بِهِۦ وَبِدَارِهِ ٱلْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُۥ مِن فِئَةٍۢ يَنصُرُونَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُنتَصِرِينَ

    Fakhasafnaa bihee wa bidaarihil arda famaa kaana laho min fi'atiny yansuroo nahoo min doonil laahi wa maa kaana minal muntasireen

    तो हमने उसे और उसके घर को ज़मीन में धँसा दिया, फिर न उसके लिए कोई गिरोह था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी मदद करता और न वह अपनी रक्षा करने वालों में से था।

  82. 82

    وَأَصْبَحَ ٱلَّذِينَ تَمَنَّوْا۟ مَكَانَهُۥ بِٱلْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ ٱللَّهَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَآ أَن مَّنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَٰفِرُونَ

    Wa asbahal lazeena tamannaw makaanahoo bil amsi yaqooloona waika annal laaha yabsutur rizqa limany ya shaaa'u min 'ibaadihee wa yaqdiru law laaa am mannal laahu 'alainaa lakhasafa binaa waika annahoo laa yuflihul kaafiroon

    और जिन लोगों ने कल उसके स्थान की कामना की थी, कहने लगे : अफ़सोस! क्या हमने नहीं जाना कि अल्लाह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, रोज़ी विस्तृत कर देता है और तंग करता है। यदि यह न होता कि अल्लाह ने हमपर उपकार किया, तो वह अवश्य हमें धँसा देता। अफ़सोस! ऐसा प्रतीत होता है कि सच्चाई यह है कि काफ़िर सफल नहीं होते।

  83. 83

    تِلْكَ ٱلدَّارُ ٱلْءَاخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّۭا فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فَسَادًۭا ۚ وَٱلْعَٰقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ

    Tilkad Daarul Aakhiratu naj'aluhaa lillazeena laa yureedoona 'uluwwan fil ardi wa laa fasaadaa; wal 'aaqibatu lilmuttaqeen

    यह आख़िरत का घर, हम इसे उन लोगों के लिए बनाते हैं, जो न ज़मीन में किसी तरह ऊँचे होने का इरादा रखते हैं और न ही किसी बिगाड़ का, और अच्छा अंजाम परहेज़गारों[27] के लिए है।

    [27] इसमें संकेत है कि धरती में गर्व तथा उपद्रव का मूलाधार अल्लाह की अवज्ञा है।

  84. 84

    مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ خَيْرٌۭ مِّنْهَا ۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى ٱلَّذِينَ عَمِلُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ إِلَّا مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ

    Man jaaa'a bilhasanati falahoo khairum minhaa wa man jaaa'a bissaiyi'ati falaa yujzal lazeena 'amilus saiyiaati illaa maa kaanoo ya'maloon

    जो व्यक्ति नेकी लेकर आएगा, उसके लिए उससे उत्तम (बदला) है और जो बुराई लेकर आएगा, तो जिन लोगों ने बुरे काम किए वे बदला नहीं दिए जाएँगे परंतु उसी का जो वे किया करते थे।

  85. 85

    إِنَّ ٱلَّذِى فَرَضَ عَلَيْكَ ٱلْقُرْءَانَ لَرَآدُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍۢ ۚ قُل رَّبِّىٓ أَعْلَمُ مَن جَآءَ بِٱلْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍۢ

    Innal azee farada 'alaikal Qur-aana laraaadduka ilaa ma'aad; qur Rabbeee a'lamu man jjaaa'a bil hudaa wa man huwa fee dalaalim mubeen

    निःसंदेह जिसने आपपर इस क़ुरआन को अनिवार्य किया है, वह अवश्य आपको एक (महान) लौटने के स्थान[28] की ओर वापस लाने वाला है। आप कह दें कि मेरा पालनहार उसे अधिक जानने वाला है, जो मार्गदर्शन लेकर आया और उसे भी जो खुली गुमराही में है।

    [28] अर्थात आप जिस शहर मक्का से निकाले गए हैं उसे विजय कर लेंगे। और यह भविष्यवाणी सन् 8 हिजरी में पूरी हुई। (सह़ीह़ बुख़ारी : 4773)

  86. 86

    وَمَا كُنتَ تَرْجُوٓا۟ أَن يُلْقَىٰٓ إِلَيْكَ ٱلْكِتَٰبُ إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرًۭا لِّلْكَٰفِرِينَ

    Wa maa kunta tarjooo ai yulqaaa ilaikal Kitaabu illaa rahmatam mir Rabbika falaa takoonanna zaheeral lilkaafireen

    और आप आशा नहीं करते थे कि आपकी ओर किताब[29] उतारी जाएगी। परंतु आपके पालनहार की दया से (वह अवतरित हुई)। अतः आप कदापि काफ़िरों के सहायक न बनें।

    [29] अर्थात क़ुरआन पाक।

  87. 87

    وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ ءَايَٰتِ ٱللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَٱدْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ

    Wa laa yasuddunnaka 'an Aayaatil laahi ba'da iz unzilat ilaika wad'u ilaa Rabbika wa laa takonanna minal mushrikeen

    और ये लोग आपको अल्लाह की आयतों से हरगिज़ रोकने न पाएँ, इसके पश्चात कि वे आपकी ओर उतारी जा चुकी हैं। और आप अपने पालनहार की ओर बुलाएँ और कदापि मुश्रिकों में से न हों।

  88. 88

    وَلَا تَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ ۘ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَىْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُۥ ۚ لَهُ ٱلْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ

    Wa laa tad'u ma'al laahi ilaahan aakhar; laaa ilaaha illaa Hoo; kullu shai'in haalikun illaa Wajhah; lahul hukkmu wa ilaihi turja'oon

    और आप अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को न पुकारें। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। सब कुछ नाश होने वाला है सिवाए उसके चेहरे के, उसी का हुक्म (चलता) है और उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।[30]

    [30] अर्थात प्रयलय के दिन ह़िसाब तथा अपने कर्मों का फल पाने के लिए।

तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com