सूरह 110
अन-नस्र
النَّصۡرِ
An-Nasr · मदनी · 3 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
إِذَا جَآءَ نَصْرُ ٱللَّهِ وَٱلْفَتْحُ
Iza jaa-a nas rullahi walfath
(ऐ नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाए।
- 2
وَرَأَيْتَ ٱلنَّاسَ يَدْخُلُونَ فِى دِينِ ٱللَّهِ أَفْوَاجًۭا
Wa ra-aitan naasa yadkhuloona fee deenil laahi afwajah
और आप लोगों को देखें कि वे अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश कर रहे हैं।[1]
[1] (1-2) इसमें विजय का अर्थ वह निर्णायक विजय है, जिसके बाद कोई शक्ति इस्लाम का सामना करने के योग्य नहीं रह जाएगी। और यह स्थिति सन् 8 (हिज्री) की है जब मक्का विजय हो गया। अरब के कोने-कोने से प्रतिनिधि मंडल रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सेवा में उपस्थित होकर इस्लाम लाने लगे। और सन् 10 (हिज्री) में जब आप 'ह़ज्जतुल वदाअ' (अर्थात अंतिम ह़ज्ज) के लिए गए, तो उस समय पूरा अरब इस्लाम के अधीन आ चुका था और देश में कोई मुश्रिक (मूर्तिपूजक) नहीं रह गया था।
- 3
فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَٱسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ تَوَّابًۢا
Fa sab bih bihamdi rabbika was taghfir, innahu kaana tawwaaba
तो आप अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें और उससे क्षमा माँगें, निःसंदेह वह बहुत तौबा क़बूल करने वाला है।[2]
[2] इस आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से कहा गया है कि इतना बड़ा काम आपने अल्लाह की दया से पूरा किया है, इसके लिए उसकी प्रशंसा और पवित्रता का वर्णन तथा उसकी कृतज्ञता व्यक्त करें। इसमें सभी के लिए यह शिक्षा है कि कोई पुण्य कार्य अल्लाह की दया के बिना नहीं होता। इसलिए उसपर घमंड नहीं करना चाहिए।
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
