सूरह 103
अल-अस्र
العَصۡرِ
Al-'Asr · मक्की · 3 आयतें
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
- 1
وَٱلْعَصْرِ
Wal' asr
अस्र के समय की क़सम!
- 2
إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَفِى خُسْرٍ
Innal insaana lafee khusr
निःसंदेह इनसान घाटे में है।[1]
[1] (1-2) 'अस्र' का अर्थ निचोड़ना है। युग तथा संध्या के समय के भाग के लिए भी इसका प्रयोग होता है। और यहाँ इसका अर्थ युग और दिन का अंतिम समय दोनों लिया जा सकता है। इस युग की गवाही इस बात पर पेश की गई है कि इनसान जब तक ईमान (सत्य विश्वास) के गुणों को नहीं अपनाता, विनाश से सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए कि इनसान के पास सबसे मूल्यवान पूँजी समय है, जो तेज़ी से गुज़रता है। इसलिए यदि वह परलोक का सामान न करे, तो अवश्य क्षति में पड़ जाएगा।
- 3
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ
Il lal lazeena aamanu wa 'amilus saali haati wa tawa saw bil haqqi wa tawa saw bis sabr
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए तथा उन्होंने सत्कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की ताकीद की और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की।[2]
[2] इसका अर्थ यह है कि परलोक की क्षति से बचने के लिए मात्र ईमान ही पर बस नहीं, इसके लिए सदाचार भी आवश्यक है और उसमें से विशेष रूप से सत्य और सहनशीलता और दूसरों को इनकी शिक्षा देते रहना भी आवश्यक है। (तर्जुमानुल क़ुरआन, मौलाना आज़ाद)
तर्जुमा: अज़ीज़ुल हक़ अल-उमरी (1.1.5) · QuranEnc.com
